संस्कृति / विचार
अद्वैत का मुखौटा लगाकर
सनातन पर सवाल?
लेखक: Shanky |
विषय: सनातन दर्शन एवं वैचारिक विमर्श

नाम के आगे ‘अद्वैत’ और ‘आचार्य’ का बोर्ड लगाकर सनातन संस्कृति के विरुद्ध एकतरफ़ा ज़हर उगलने वाले महाशय, आपकी वैचारिक कायरता तो आपके इस पोस्ट के पहले ही हिस्से में नंगी हो जाती है!
ऊपर कानूनी और सेक्युलर बचाव के लिए तो आपने बड़ी चालाकी से एक लाइन लिख दी कि— “कहते हैं कि बलि देवी को दी गई, या अल्लाह को दी गई”, लेकिन नीचे वीडियो सिर्फ़ और सिर्फ़ हिंदू मंदिर के सिंदूर लगे बकरों का लगाया और उस पर बड़े-बड़े पीले अक्षरों में लिखा— “देवी खुश होंगी?”
“देवी खुश होंगी?”
एक सवाल, और उसके पीछे छिपे चयनित दृष्टिकोण पर सवाल।
अगर आपकी रीढ़ की हड्डी में सच में कोई दम है, तो कभी बकरीद के दिन लाखों बेज़ुबान जानवरों के ख़ून से लाल होती सड़कों का वीडियो लगाकर दिखाइए! कभी क्रिसमस, गुड फ्राइडे या न्यू ईयर के नाम पर दुनिया भर में काटे जाने वाले करोड़ों गायों, बकरों और अन्य जीवों की तस्वीरें लगाकर उनके मज़हब का नाम लिखकर दिखाइए! पर वहाँ आपकी ज़ुबान सिल जाएगी और सारा ‘बोध’ हवा हो जाएगा, क्योंकि आपकी दुकान केवल हिंदू युवाओं को उनकी अपनी ही परंपराओं के प्रति हीन-भावना से भरकर चलती है।
चलिए, दूसरों को छोड़िए—मैं आपसे विशुद्ध रूप से सनातन दर्शन और आपके उसी ‘वेदांत’ तथा ‘गीता’ के धरातल पर बात करता हूँ, जिसका ढोल आप दिन-रात पीटते हैं:
१. गीता का त्रिगुण सिद्धांत और तामसिक उपासना
जिस गीता के नाम पर आप सेशन बेचते हैं, क्या उसके १७वें अध्याय (श्रद्धात्रयविभाग योग) को आपने कभी ईमानदारी से पढ़ा है? भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट कहते हैं—
त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा।
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु॥
— भगवद्गीता १७.२
मनुष्यों की श्रद्धा उनके स्वभाव से उत्पन्न होती है और वह सात्त्विकी, राजसी तथा तामसी—तीन प्रकार की होती है।
यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः।
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः॥
— भगवद्गीता १७.४
सात्त्विक लोग देवताओं की, राजसिक लोग यक्षों और राक्षसों की तथा अन्य तामसिक लोग प्रेतों और भूतगणों की उपासना करते हैं।
अर्थात् संसार में प्रत्येक मनुष्य की श्रद्धा, आहार, यज्ञ और उपासना उसके स्वभाव के अनुसार तीन प्रकार की होती है— सात्त्विक, राजसिक और तामसिक! सनातन संस्कृति में हर चेतना के स्तर के मनुष्य के लिए उपासना का विधान है। यह बलि प्रथा कोई आज की नहीं है, यह सदियों से चली आ रही ‘तामसिक पूजा’ का एक तांत्रिक विधान है, जो उग्र एवं तामसी देवी-देवताओं की उपासना का एक मार्ग रही है।
हमारे ऋषियों का मनोविज्ञान समझिए—जो मनुष्य तामसिक या उग्र वृत्ति का है, उसकी हिंसक और भोगवादी वृत्ति को बाज़ार में बेलगाम छोड़ने के बजाय शास्त्रों ने उसे भी मंदिर और तंत्र के कठोर नियमों से बाँधा, ताकि वह धीरे-धीरे तमस से रजस और रजस से सत्त्व की ओर उठ सके। तंत्र शास्त्र का प्रसिद्ध सिद्धांत है—
“यैरेव पतनं द्रव्यैस्तेरैव चोदिता सिद्धिः”
जिन चीज़ों से मनुष्य का पतन होता है, तंत्र उन्हीं को नियम में बाँधकर उत्थान का माध्यम बना देता है।
पर बिन पेंदी के लोटे की तरह इधर-उधर लुढ़कने वालों को यह गूढ़ मनोविज्ञान कहाँ समझ आएगा?
२. अद्वैत वेदांत और विराट सृष्टि का सिद्धांत
आप हर बात में ‘वेदांत’ का नाम लेते हैं। छान्दोग्य उपनिषद् का महावाक्य है—
“सर्वं खल्विदं ब्रह्म”
यह सब कुछ ब्रह्म ही है।
— छान्दोग्य उपनिषद् ३.१४.१
और जिस गीता का आप व्यापार करते हैं, उसमें स्वयं भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः।
— भगवद्गीता १०.२०
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्॥
— भगवद्गीता १०.३९
अर्थात् सभी भूतों में वही एक तत्त्व विद्यमान है और उसके बिना इस चराचर जगत में कुछ भी नहीं है!
जब उस एक परमात्मा के अतिरिक्त दूसरा कुछ है ही नहीं, तो यह सात्त्विक, राजसिक और तामसिक प्रकृति भी तो उसी एक तत्त्व का विभिन्न रूप है!
एक दृष्टांत समझिए
आप चाहे दुनिया का कितना भी शुद्ध, सात्त्विक और श्रेष्ठ भोजन क्यों न खा लें, शरीर की पाचन प्रक्रिया के बाद अंत में वह आपके ही शरीर से ‘मल’ और ‘मूत्र’ के रूप में बाहर निकलेगा। अब क्या इसका यह मतलब निकाला जाए कि मल और मूत्र खराब है तो आपका शरीर ही गंदा हो गया, या आपने मल-मूत्र ही खाया था? नहीं! वह उसी अन्न का एक रूपांतरित रूप है, और समय-समय पर आप अपने उसी मल को अपने ही हाथों से साफ़ भी करते हैं!
ठीक उसी प्रकार, इस विराट सृष्टि के शरीर में सात्त्विक से लेकर घोर तामसिक तक हर वृत्ति उसी एक तत्त्व की प्रक्रिया का हिस्सा है, और हमारी तांत्रिक व शाक्त परंपरा समाज के उस तामसिक अंश को नियंत्रित और साफ़ करने की ही व्यवस्था है। आप अपने स्वार्थ के लिए गीता का व्यापार भी कर रहे हैं, और उसी गीता के उपदेशक भगवान के विराट रूप में दोष भी निकाल रहे हैं!
३. बलि का आध्यात्मिक और कार्मिक दृष्टिकोण
आप बकरों के कटने पर बड़ा ज्ञानी प्रवचन देते हैं, पर कभी शास्त्रों की ‘कार्मिक दृष्टि’ से झाँककर देखा है?
बलि केवल एक बाहरी कर्मकांड नहीं, बल्कि एक बहुत बड़ा आध्यात्मिक प्रतीक है। जो जीव केवल पशु की तरह (यानी आहार, निद्रा, भय और मैथुन में) अपना पूरा जीवन बिता देता है—बिना किसी चेतना के, बिना किसी पुरुषार्थ के—उसे प्रकृति और ‘काल’ हर पल काटते ही रहते हैं। उसका जीवन ही एक सतत बलि है!
अपनी पशु-वृत्ति को मारो, अहंकार और भय की बलि दो!
साधना का लक्ष्य अपने भीतर चेतना, साहस और आत्मबोध को विकसित करना है।
इसीलिए वेदांत और तंत्र सिखाते हैं कि अपनी पशु-वृति (पशुभाव) को मारो, अपने भीतर के अहंकार और भय की बलि दो! खुद को इतना मजबूत और चैतन्य बनाओ कि तुम ‘सिंह’ बन जाओ—अरे, क्या आपने कभी किसी ‘सिंह’ की बलि दी जाती सुनी है क्या? सिंह को कोई नहीं काटता, क्योंकि वह जंगल का राजा अपनी चेतना और पराक्रम से जीता है। बकरा वही बनता है जो हर समय डर और भोग में जीता है। इसलिए अपनी पशु-वृत्ति को छोड़कर ईश्वर में मन लगाओ, साधना करो और साधना करते-करते स्वयं “अहं ब्रह्मस्मि” (मैं ही ब्रह्म हूँ) की उस अजेय स्थिति को प्राप्त हो जाओ जहाँ तुम्हें कोई ‘काल’ या परिस्थिति काट न सके! लेकिन इन आध्यात्मिक रहस्यों को छोड़कर केवल सतही रोटियाँ सेकना आपका काम रह गया है।
४. बकरा किसके पेट में जाता है?
आपने बड़ा तीखा सवाल पूछा है कि—
“कहते हैं बलि देवी को दी गई, लेकिन असल में बकरा किसके पेट में जाता है?”
तो मालिक, ज़रा आईने के सामने खड़े होकर पहले इस देश को यह बताइए कि सनातन संस्कृति और संस्कारों के नाम पर भोले-भाले युवाओं को मानसिक रूप से कमज़ोर (Demoralize) करके, उन्हें अपने ही पूर्वजों से नफ़रत करना सिखाकर, और भगवान श्रीकृष्ण की गीता के नाम पर अपनी रोटी सेककर आप जो करोड़ों का साम्राज्य चला रहे हैं— वह सारा पैसा किसके पेट में जा रहा है?
बकरा तो फिर भी किसी तामसिक साधक के पेट में जाकर पच जाता होगा, पर युवाओं की श्रद्धा और संस्कृति की बलि देकर कमाया गया यह बाज़ारू पैसा किसके पेट में जा रहा है, इसका हिसाब कौन देगा?
५. धर्म, अघोर परंपरा और चयनित आलोचना
आप लिखते हैं— “किसी भी धर्म में पशु-बलि का धर्म से कोई रिश्ता नहीं है।”
पहले तो यह अज्ञान दूर कीजिए कि जिन अन्य मतों और मज़हबों की आप बात कर रहे हैं, वे ‘धर्म’ नहीं हैं, वे केवल एक ‘पद्धति’ (मज़हब) हैं। धर्म तो इस सृष्टि में केवल और केवल ‘सनातन’ है, जिसने किसी को अछूत कहकर बाहर नहीं फेंका, बल्कि जड़ से लेकर चेतन तक और सात्त्विक से लेकर अघोर तक सबको स्वीकार किया है!
कभी अपने वातानुकूलित (AC) स्टूडियो से बाहर निकलकर भारत की महान ‘अघोर परंपरा’ को पढ़िए और जानिए। काशी के महान संत और अघोराचार्य ‘महाराजश्री बाबा कीनाराम जी’ का नाम सुना है कभी? वे साक्षात् अद्वैत वेदांत की चलती-फिरती मूर्ति थे, जिनकी दृष्टि में श्मशान की राख और राजमहल में, शिव और शव में कोई भेद नहीं था! पर वे एक अघोरी थे, और उनकी तांत्रिक व अघोर साधना की शक्ति ऐसी थी कि काशी की धरती पर आज भी डंके की चोट पर कहा जाता है—
“जो न कर सके राम,
वो कर सके कीनाराम!”
इतने महान संत और सिद्ध हमारी भारतीय परंपरा में हुए हैं! कामाख्या से लेकर कालीघाट और काशी के मणिकर्णिका से लेकर तारापीठ तक—क्या स्वामी विवेकानंद से लेकर बाबा कीनाराम तक सब अधार्मिक थे, और आज कैमरे के सामने बैठकर प्रवचन बेचने वाले आप अकेले धर्म के ठेकेदार बन गए?
भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में स्पष्ट चेतावनी दी है—
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्।
— भगवद्गीता ३.२६
अर्थात् ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि वह कर्म और उपासना में लगे हुए लोगों की बुद्धि में भ्रम (बुद्धिभेद) पैदा न करे!
इसलिए मालिक, युवाओं के सामने यह एकतरफ़ा कचरा परोसना बंद कीजिए। अपनी आधी-अधूरी बातों से लोगों को भावनात्मक रूप से तोड़ना (Emotionally damage करना) और उनके दिमाग़ के साथ यह ‘मेंटल गेम’ खेलना छोड़ दीजिए।
याद रखिएगा मालिक,
आपको इस सनातन संस्कृति में जितनी भी बुराई दिखे और आप जैसे हज़ारों लोग इस पर कितना भी कीचड़ उछाल लें, पर कुछ तो बात है इस संस्कृति में कि आज तक कोई इसे मिटा नहीं पाया—
यूनाँ मिस्र रोमा, सब मिट गए जहाँ से,
बाकी मगर है अब तक, नामो निशां हमारा।
कुछ बात तो है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी,
सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-जहाँ हमारा।
इतिहास गवाह है—आप जैसे हज़ारों बुद्धिजीवी आए और अपनी दुकानें चलाकर ख़ुद उखड़ गए, लेकिन इस सनातन संस्कृति की एक ईंट भी नहीं हिला पाए!
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Shanky
सनातन दर्शन, भारतीय संस्कृति और समकालीन वैचारिक विमर्श पर स्वतंत्र लेखन।































































































