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पशुु बलि….!!!!

संस्कृति / विचार

अद्वैत का मुखौटा लगाकर
सनातन पर सवाल?

लेखक: Shanky  | 
विषय: सनातन दर्शन एवं वैचारिक विमर्श

सनातन संस्कृति और वैचारिक विमर्श
चित्र: संबंधित विषय के संदर्भ में

नाम के आगे ‘अद्वैत’ और ‘आचार्य’ का बोर्ड लगाकर सनातन संस्कृति के विरुद्ध एकतरफ़ा ज़हर उगलने वाले महाशय, आपकी वैचारिक कायरता तो आपके इस पोस्ट के पहले ही हिस्से में नंगी हो जाती है!

ऊपर कानूनी और सेक्युलर बचाव के लिए तो आपने बड़ी चालाकी से एक लाइन लिख दी कि— “कहते हैं कि बलि देवी को दी गई, या अल्लाह को दी गई”, लेकिन नीचे वीडियो सिर्फ़ और सिर्फ़ हिंदू मंदिर के सिंदूर लगे बकरों का लगाया और उस पर बड़े-बड़े पीले अक्षरों में लिखा— “देवी खुश होंगी?”

“देवी खुश होंगी?”

एक सवाल, और उसके पीछे छिपे चयनित दृष्टिकोण पर सवाल।

अगर आपकी रीढ़ की हड्डी में सच में कोई दम है, तो कभी बकरीद के दिन लाखों बेज़ुबान जानवरों के ख़ून से लाल होती सड़कों का वीडियो लगाकर दिखाइए! कभी क्रिसमस, गुड फ्राइडे या न्यू ईयर के नाम पर दुनिया भर में काटे जाने वाले करोड़ों गायों, बकरों और अन्य जीवों की तस्वीरें लगाकर उनके मज़हब का नाम लिखकर दिखाइए! पर वहाँ आपकी ज़ुबान सिल जाएगी और सारा ‘बोध’ हवा हो जाएगा, क्योंकि आपकी दुकान केवल हिंदू युवाओं को उनकी अपनी ही परंपराओं के प्रति हीन-भावना से भरकर चलती है।

चलिए, दूसरों को छोड़िए—मैं आपसे विशुद्ध रूप से सनातन दर्शन और आपके उसी ‘वेदांत’ तथा ‘गीता’ के धरातल पर बात करता हूँ, जिसका ढोल आप दिन-रात पीटते हैं:

१. गीता का त्रिगुण सिद्धांत और तामसिक उपासना

जिस गीता के नाम पर आप सेशन बेचते हैं, क्या उसके १७वें अध्याय (श्रद्धात्रयविभाग योग) को आपने कभी ईमानदारी से पढ़ा है? भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट कहते हैं—

त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा।
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु॥

— भगवद्गीता १७.२

मनुष्यों की श्रद्धा उनके स्वभाव से उत्पन्न होती है और वह सात्त्विकी, राजसी तथा तामसी—तीन प्रकार की होती है।

यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः।
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः॥

— भगवद्गीता १७.४

सात्त्विक लोग देवताओं की, राजसिक लोग यक्षों और राक्षसों की तथा अन्य तामसिक लोग प्रेतों और भूतगणों की उपासना करते हैं।

अर्थात् संसार में प्रत्येक मनुष्य की श्रद्धा, आहार, यज्ञ और उपासना उसके स्वभाव के अनुसार तीन प्रकार की होती है— सात्त्विक, राजसिक और तामसिक! सनातन संस्कृति में हर चेतना के स्तर के मनुष्य के लिए उपासना का विधान है। यह बलि प्रथा कोई आज की नहीं है, यह सदियों से चली आ रही ‘तामसिक पूजा’ का एक तांत्रिक विधान है, जो उग्र एवं तामसी देवी-देवताओं की उपासना का एक मार्ग रही है।

हमारे ऋषियों का मनोविज्ञान समझिए—जो मनुष्य तामसिक या उग्र वृत्ति का है, उसकी हिंसक और भोगवादी वृत्ति को बाज़ार में बेलगाम छोड़ने के बजाय शास्त्रों ने उसे भी मंदिर और तंत्र के कठोर नियमों से बाँधा, ताकि वह धीरे-धीरे तमस से रजस और रजस से सत्त्व की ओर उठ सके। तंत्र शास्त्र का प्रसिद्ध सिद्धांत है—

“यैरेव पतनं द्रव्यैस्तेरैव चोदिता सिद्धिः”

जिन चीज़ों से मनुष्य का पतन होता है, तंत्र उन्हीं को नियम में बाँधकर उत्थान का माध्यम बना देता है।

पर बिन पेंदी के लोटे की तरह इधर-उधर लुढ़कने वालों को यह गूढ़ मनोविज्ञान कहाँ समझ आएगा?

२. अद्वैत वेदांत और विराट सृष्टि का सिद्धांत

आप हर बात में ‘वेदांत’ का नाम लेते हैं। छान्दोग्य उपनिषद् का महावाक्य है—

“सर्वं खल्विदं ब्रह्म”

यह सब कुछ ब्रह्म ही है।

— छान्दोग्य उपनिषद् ३.१४.१

और जिस गीता का आप व्यापार करते हैं, उसमें स्वयं भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—

अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः।

— भगवद्गीता १०.२०

न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्॥

— भगवद्गीता १०.३९

अर्थात् सभी भूतों में वही एक तत्त्व विद्यमान है और उसके बिना इस चराचर जगत में कुछ भी नहीं है!

जब उस एक परमात्मा के अतिरिक्त दूसरा कुछ है ही नहीं, तो यह सात्त्विक, राजसिक और तामसिक प्रकृति भी तो उसी एक तत्त्व का विभिन्न रूप है!

एक दृष्टांत समझिए

आप चाहे दुनिया का कितना भी शुद्ध, सात्त्विक और श्रेष्ठ भोजन क्यों न खा लें, शरीर की पाचन प्रक्रिया के बाद अंत में वह आपके ही शरीर से ‘मल’ और ‘मूत्र’ के रूप में बाहर निकलेगा। अब क्या इसका यह मतलब निकाला जाए कि मल और मूत्र खराब है तो आपका शरीर ही गंदा हो गया, या आपने मल-मूत्र ही खाया था? नहीं! वह उसी अन्न का एक रूपांतरित रूप है, और समय-समय पर आप अपने उसी मल को अपने ही हाथों से साफ़ भी करते हैं!

ठीक उसी प्रकार, इस विराट सृष्टि के शरीर में सात्त्विक से लेकर घोर तामसिक तक हर वृत्ति उसी एक तत्त्व की प्रक्रिया का हिस्सा है, और हमारी तांत्रिक व शाक्त परंपरा समाज के उस तामसिक अंश को नियंत्रित और साफ़ करने की ही व्यवस्था है। आप अपने स्वार्थ के लिए गीता का व्यापार भी कर रहे हैं, और उसी गीता के उपदेशक भगवान के विराट रूप में दोष भी निकाल रहे हैं!

३. बलि का आध्यात्मिक और कार्मिक दृष्टिकोण

आप बकरों के कटने पर बड़ा ज्ञानी प्रवचन देते हैं, पर कभी शास्त्रों की ‘कार्मिक दृष्टि’ से झाँककर देखा है?

बलि केवल एक बाहरी कर्मकांड नहीं, बल्कि एक बहुत बड़ा आध्यात्मिक प्रतीक है। जो जीव केवल पशु की तरह (यानी आहार, निद्रा, भय और मैथुन में) अपना पूरा जीवन बिता देता है—बिना किसी चेतना के, बिना किसी पुरुषार्थ के—उसे प्रकृति और ‘काल’ हर पल काटते ही रहते हैं। उसका जीवन ही एक सतत बलि है!

अपनी पशु-वृत्ति को मारो, अहंकार और भय की बलि दो!

साधना का लक्ष्य अपने भीतर चेतना, साहस और आत्मबोध को विकसित करना है।

इसीलिए वेदांत और तंत्र सिखाते हैं कि अपनी पशु-वृति (पशुभाव) को मारो, अपने भीतर के अहंकार और भय की बलि दो! खुद को इतना मजबूत और चैतन्य बनाओ कि तुम ‘सिंह’ बन जाओ—अरे, क्या आपने कभी किसी ‘सिंह’ की बलि दी जाती सुनी है क्या? सिंह को कोई नहीं काटता, क्योंकि वह जंगल का राजा अपनी चेतना और पराक्रम से जीता है। बकरा वही बनता है जो हर समय डर और भोग में जीता है। इसलिए अपनी पशु-वृत्ति को छोड़कर ईश्वर में मन लगाओ, साधना करो और साधना करते-करते स्वयं “अहं ब्रह्मस्मि” (मैं ही ब्रह्म हूँ) की उस अजेय स्थिति को प्राप्त हो जाओ जहाँ तुम्हें कोई ‘काल’ या परिस्थिति काट न सके! लेकिन इन आध्यात्मिक रहस्यों को छोड़कर केवल सतही रोटियाँ सेकना आपका काम रह गया है।

४. बकरा किसके पेट में जाता है?

आपने बड़ा तीखा सवाल पूछा है कि—

“कहते हैं बलि देवी को दी गई, लेकिन असल में बकरा किसके पेट में जाता है?”

तो मालिक, ज़रा आईने के सामने खड़े होकर पहले इस देश को यह बताइए कि सनातन संस्कृति और संस्कारों के नाम पर भोले-भाले युवाओं को मानसिक रूप से कमज़ोर (Demoralize) करके, उन्हें अपने ही पूर्वजों से नफ़रत करना सिखाकर, और भगवान श्रीकृष्ण की गीता के नाम पर अपनी रोटी सेककर आप जो करोड़ों का साम्राज्य चला रहे हैं— वह सारा पैसा किसके पेट में जा रहा है?

बकरा तो फिर भी किसी तामसिक साधक के पेट में जाकर पच जाता होगा, पर युवाओं की श्रद्धा और संस्कृति की बलि देकर कमाया गया यह बाज़ारू पैसा किसके पेट में जा रहा है, इसका हिसाब कौन देगा?

५. धर्म, अघोर परंपरा और चयनित आलोचना

आप लिखते हैं— “किसी भी धर्म में पशु-बलि का धर्म से कोई रिश्ता नहीं है।”

पहले तो यह अज्ञान दूर कीजिए कि जिन अन्य मतों और मज़हबों की आप बात कर रहे हैं, वे ‘धर्म’ नहीं हैं, वे केवल एक ‘पद्धति’ (मज़हब) हैं। धर्म तो इस सृष्टि में केवल और केवल ‘सनातन’ है, जिसने किसी को अछूत कहकर बाहर नहीं फेंका, बल्कि जड़ से लेकर चेतन तक और सात्त्विक से लेकर अघोर तक सबको स्वीकार किया है!

कभी अपने वातानुकूलित (AC) स्टूडियो से बाहर निकलकर भारत की महान ‘अघोर परंपरा’ को पढ़िए और जानिए। काशी के महान संत और अघोराचार्य ‘महाराजश्री बाबा कीनाराम जी’ का नाम सुना है कभी? वे साक्षात् अद्वैत वेदांत की चलती-फिरती मूर्ति थे, जिनकी दृष्टि में श्मशान की राख और राजमहल में, शिव और शव में कोई भेद नहीं था! पर वे एक अघोरी थे, और उनकी तांत्रिक व अघोर साधना की शक्ति ऐसी थी कि काशी की धरती पर आज भी डंके की चोट पर कहा जाता है—

“जो न कर सके राम,
वो कर सके कीनाराम!”

इतने महान संत और सिद्ध हमारी भारतीय परंपरा में हुए हैं! कामाख्या से लेकर कालीघाट और काशी के मणिकर्णिका से लेकर तारापीठ तक—क्या स्वामी विवेकानंद से लेकर बाबा कीनाराम तक सब अधार्मिक थे, और आज कैमरे के सामने बैठकर प्रवचन बेचने वाले आप अकेले धर्म के ठेकेदार बन गए?

भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में स्पष्ट चेतावनी दी है—

न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्।

— भगवद्गीता ३.२६

अर्थात् ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि वह कर्म और उपासना में लगे हुए लोगों की बुद्धि में भ्रम (बुद्धिभेद) पैदा न करे!

इसलिए मालिक, युवाओं के सामने यह एकतरफ़ा कचरा परोसना बंद कीजिए। अपनी आधी-अधूरी बातों से लोगों को भावनात्मक रूप से तोड़ना (Emotionally damage करना) और उनके दिमाग़ के साथ यह ‘मेंटल गेम’ खेलना छोड़ दीजिए।

याद रखिएगा मालिक,

आपको इस सनातन संस्कृति में जितनी भी बुराई दिखे और आप जैसे हज़ारों लोग इस पर कितना भी कीचड़ उछाल लें, पर कुछ तो बात है इस संस्कृति में कि आज तक कोई इसे मिटा नहीं पाया—

यूनाँ मिस्र रोमा, सब मिट गए जहाँ से,
बाकी मगर है अब तक, नामो निशां हमारा।
कुछ बात तो है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी,
सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-जहाँ हमारा।

इतिहास गवाह है—आप जैसे हज़ारों बुद्धिजीवी आए और अपनी दुकानें चलाकर ख़ुद उखड़ गए, लेकिन इस सनातन संस्कृति की एक ईंट भी नहीं हिला पाए!

🖋️

Shanky

सनातन दर्शन, भारतीय संस्कृति और समकालीन वैचारिक विमर्श पर स्वतंत्र लेखन।

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अनगिनत कड़ियाँ…..!!!!

अनगिनत कड़ियाँ - Shanky Salty

अनगिनत कड़ियाँ

‘माँ’

यह केवल एक शब्द मात्र नहीं है,
यह तो अपने आप में ही पूर्णता का प्रतीक है।
माँ ही आदि है, और माँ ही अंत है,
माँ तो साक्षात् शक्ति है,
जिसके बिना इस सृष्टि में कुछ भी संभव नहीं,
और जिससे ही यह सारा अस्तित्व है।

पर जब मैं आज के इस समाज को देखता हूँ,
तो भीतर तक स्तब्ध रह जाता हूँ!
नवरात्र के पावन दिन चल रहे हैं,
साल के 365 दिनों में से,
महज़ 9 दिन हम उस ‘माँ’ की पूजा करते हैं,
और बाकी के 356 दिन…
उसी ‘माँ’ की गाली अपनी ज़ुबान पर रखते हैं!

आज मैंने इस पतन की अनगिनत कड़ियों को अपनी आँखों से देखा है,
आज मैंने एक वृद्धाश्रम भी देखा है,
जहाँ अपनों की ठुकराई हुई, किसी न किसी की ‘माँ’ ही रहती है।
आज मैंने एक अनाथालय भी देखा है,
जहाँ भटके हुए इंसानी कर्मों का फल साफ़ नज़र आता है।

और आज… अपने एक डॉक्टर मित्र के साथ
जब मैं एक बहुत बड़े अस्पताल गया,
तो वहाँ का मंज़र देखकर मैं स्तब्ध रह गया, मेरी तबीयत बिगड़ गई!
देखा कि हवस की आग में लोग जलकर इस कदर अंधे हो चुके हैं,
कि अस्पतालों में अंधाधुंध भ्रूण-हत्याएँ कर रहे हैं।

वहाँ अपनी आँखों से देखा है मैंने,
20-22 साल की एक बच्ची को,
दुपट्टे से अपना चेहरा ढके हुए,
अस्पताल के एक कोने में डरी-सहमी सी,
समाज से छुपकर, अपने कर्मों पर पर्दा डालने के लिए,
अपने ही भीतर पल रहे अविकसित भ्रूण को गिराने के लिए
डॉक्टर से निवेदन करते हुए!

आज मैंने उस अस्पताल में एक अविकसित शिशु को भी देखा है,
जो दुनिया में आँखें खोलने से पहले ही
किसी की हवस का शिकार होकर मारा गया है!

हत्या करने वाले हत्यारों के लिए तो यहाँ न्यायालय है,
पर एक अजन्मे शिशु के इस गर्भपात के लिए… इस समाज में क्या है??

आज़ादी और आधुनिकता के भ्रम से शुरू हुई यह कड़ी,
हवस, पाप, अनाथालय और वृद्धाश्रम तक आकर कैसे जुड़ जाती है,
यह देखकर आत्मा काँप उठती है!

और इन सब कड़ियों के बीच, मुझे आज भी वो शब्द याद हैं,
जब एक नवरात्र मैं वृद्धाश्रम गया था,
और वहाँ से निकलते वक़्त एक महिला से मिला था,
वहाँ तड़पती माताओं की बेबसी देखकर,
वो महिला हाथ जोड़कर ईश्वर को धन्यवाद दे रही थी,
और कह रही थी कि अच्छा हुआ जो ईश्वर ने उसे ‘बाँझ’ ही रहने दिया!

मैं किसी को कठघरे में खड़ा करने नहीं आया,
न किसी की मजबूरी का फैसला सुनाने आया हूँ,
बस उस समाज से प्रश्न करने आया हूँ
जो माँ को पूजता तो है,
पर माँ बनने की पीड़ा को समझ नहीं पाता है।

आख़िर माँ ही तो आदि है,
माँ ही तो अनंत है,
उससे ही जीवन की शुरुआत है,
उसी से हर रिश्ता जीवंत है।

फिर भी माँ के आँचल से लेकर
उसकी अंतिम साँस तक,
कितनी ही अनकही पीड़ाएँ हैं,
कितनी ही टूटी हुई कड़ियाँ हैं।

कहीं माँ वृद्धाश्रम में है,
कहीं बचपन अनाथालय में,
कहीं स्त्री समाज से भयभीत है,
कहीं जीवन जन्म लेने से पहले ही
एक अनुत्तरित प्रश्न बन जाता है।

और मैं सोचता हूँ,
जब हर कड़ी का सिरा माँ से जुड़ता है,
तो फिर उसी माँ के सम्मान का धागा
हमारे हाथों से बार-बार क्यों छूटता है?

ये अनगिनत कड़ियाँ हैं,
इन्हें जोड़ना होगा,
माँ को केवल मंदिरों में नहीं,
अपने व्यवहार में भी स्थान देना होगा।

क्योंकि माँ केवल पूजने का नाम नहीं,
माँ को समझना भी ज़रूरी है,
और जिस दिन हम यह समझ जाएँगे,
शायद उसी दिन
इन अनगिनत कड़ियों को
फिर से जोड़ना मुमकिन होगा।


~ Shanky ❤ Salty

समाज की इसी कड़वी सच्चाई को और गहराई से जानने के लिए पढ़ें:

“Randi: हवस के बाज़ार का अनकहा सच”

नवरात्र में देवी पूजने वाला समाज कैसे एक बेटी के जिस्म को अपनी हवस का शिकार बनाता है? आशीष कुमार (Shanky) द्वारा रचित यह पुस्तक आपको सोचने पर मजबूर कर देगी।


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फूल और आकाश

फूल और आकाश

फूल और आकाश - Shanky Salty

📸 Image Credit: mazeepuran (माझे e-पुराण) – Rupali didi

इस फूल का रंग देखो,

कितना ख़ूबसूरत चेहरा है,

माटी में जन्मा है मगर

नज़र हमेशा आसमाँ पर ठहरा है।

न कोई शिकायत मौसम से,

न धूप से कोई शिकवा है,

सुख-दुःख आते-जाते रहते हैं

फूल का काम बस खिलना है।

वो देखता है उस नील गगन को,

न पाने की ज़िद, न छूने की चाह,

बस दूर खड़े होकर भी

निभाता है अपना बेपनाह।

शायद प्रेम भी ऐसा ही होता है

जहाँ अधिकार नहीं, विश्वास होता है,

जहाँ पास आने की ज़िद नहीं,

दूर रहकर भी एहसास होता है।

माटी का होकर भी

जिसकी चाहत अंबर हो जाए,

खुद जलकर भी जो

दूसरों के हिस्से ख़ुशबू कर जाए

वही तो प्रेम है,

वही समर्पण है,

जहाँ ‘मैं’ धीरे-धीरे मिटता है

और ‘तू’ ही जीवन बन जाता है।

वो इश्क़ ही क्या

जो बाँहों में बाँधकर साँसें रोक दे,

सच्चा प्रेम तो वो है

जो पंख दे और उड़ने की राह दे।

जो देह से उतरकर

रूह तक पहुँच जाए,

जो शब्दों से नहीं,

ख़ामोशी से समझ आए।

देखो इस फूल को

ज़मीन पर रहकर भी

आसमान से प्रेम करता है,

दूरी के बावजूद

दोनों का रंग एक-सा लगता है।

शायद यही प्रेम की पराकाष्ठा है

मिलना ज़रूरी नहीं,

एक-दूसरे में खिलना ज़रूरी है।

और जब प्रेम इतना पवित्र हो जाए

कि चाहत भी प्रार्थना बन जाए,

तब समझना

तुमने प्रेम नहीं,

प्रेम में छिपा हुआ रब पा लिया है।


~ Shanky ❤ Salty

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प्रेम कभी आख़िरी नहीं होता

प्रेम - Shanky Salty

मेरे दृष्टिकोण में
प्रेम कभी आख़िरी नहीं होता,
यह तो अनंत है…

प्रेम की कोई परिधि,
कोई पैमाना
भला हो भी सकता है क्या?
यह तो सदा
सीमाओं के पार से ही
प्रारंभ होता है।

बस,
इस प्रेम को
एक प्यारा-सा परिवेश चाहिए—
प्रेम को पढ़ाने वाला नहीं,
प्रेम को समझाने वाला नहीं,
बल्कि उसे
पूर्णतया पहचानने
और समझने वाला चाहिए।

प्रेम तो
‘दिने दिने नवं नवं’ की तरह
हर पहर
पल्लवित होता है,
प्रफुल्लित होता है。
वह परिस्थितियों का
मोहताज नहीं,
न ही किसी का
पराश्रित है।

प्रेम में
केवल प्रदर्शन नहीं,
एक-दूसरे की
परस्पर आवश्यकता होती है।

लोग अक्सर
प्रेम की तुलना
पानी से भरे समंदर से करते हैं,
पर भूल जाते हैं—
समंदर का खारा पानी
कभी प्यास नहीं बुझाता।
समंदर का पार
पाया जा सकता है,
पर प्रेम का
कोई पारावार नहीं।

और समंदर के
एक चुल्लू पानी से
भला प्रेम की प्याली भरकर
चाय बनाई जा सकती है क्या?

प्रेम तो
उस बीज की प्रकृति जैसा है
जो मिट्टी की गोद में
पनपने के लिए
पानी और प्रश्रय माँगता है।

सच कहूँ तो,
परस्पर विश्वास की नींव
जितनी गहरी होगी,
प्रेम उतना ही
पुष्ट होगा,
परिपक्व होगा。
वरना
जिसे प्रेम समझा था,
वह पल भर में
पस्त होकर
फुस्स हो जाएगा।

और हाँ…
प्रेम कभी
सिर्फ़ इच्छा नहीं हो सकता,
वह तो सदा
एक आवश्यकता रहा है।

और जिस भी पल
आवश्यकता का अंत हो जाता है,
उसी पल
प्रेम अपनी पराकाष्ठा को
प्राप्त हो जाता है।


~ Shanky ❤ Salty
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अचानक निग़ाहें उस पर जा ठहरीं

अचानक निग़ाहें उस पर जा ठहरीं…

~ एक अनकही कहानी ~

अचानक निग़ाहें उस पर जा ठहरीं। मुद्दतों बाद उसे यूँ सामने देखकर, जैसे वक्त वहीं जम गया। एक पल को लगा, मानो इस पूरी भीड़ में वो सिर्फ़ और सिर्फ़ मुझसे मिलने आई हो। हकीकत धुंधली पड़ने लगी और मैं स्मृतियों के उसी पुराने सरोवर में डूबता चला गया…

अमरूद की वो भीगी टहनी,

और पत्तों से छनकर माथे पर टपकती बारिश की सर्द बूंदें…

रुई के फाहों-सी गिरती वो बेतहाशा बारिश,

और बारिश से हल्का-सा झुंझलाता मैं।

पर वो… वो तो जैसे बारिश की बूंदों से इश्क़ लड़ा रही थी।

मेरे चिढ़ने पर हँसती,

और फिर अपने उन्हीं ठंडे, भीगे हाथों से मेरे गालों को छूकर उन्हें गीला कर देती।

दूर उड़ते काले, घने बादलों की ओर देखकर उसका वो मासूमियत से कहना—

“काश थोड़ी और बारिश हो, और तुम… आओ न… बस यहीं रह जाओ… जाओ मत।”

तभी अचानक, वो मेरी नज़रों से ओझल हो गई। लगा जैसे भीड़ में कोई मेरी जान ही खींचकर ले गया हो। मेरी आँखें पागलों की तरह उसे हर तरफ तलाशती रहीं, लेकिन वो फिर कहीं नज़र नहीं आई।

उस खालीपन में, उसके साथ बिताए वो शुरुआती पल ज़ेहन में फिर से गूँजने लगे। वो पहला एहसास, जब उसने बड़े प्यार से मेरी गर्दन में अपनी बाहें डाली थीं…

“तुम्हारी आँखों में आँसू क्यों आ गए?” उसने मेरी आँखों में देखकर पूछा था।

“यह देखकर कि तुम मुझसे कितनी मोहब्बत करती हो… पर रुको, अचानक तुम्हारी आँखें क्यों भर आईं?” मैंने उसकी नम आँखों को देखकर पूछा।

उसने मुस्कुराते हुए, पर हल्की कांपती आवाज़ में कहा था, “मैं सोच रही थी… तुम कहोगे कि ‘क्योंकि मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ, इसलिए’।”

उसे पहली दफ़ा देखते ही मुझे वो पहला, मुकम्मल इश्क हुआ था। लोग सच ही कहते हैं, अगर दिल से चाहो तो वो मिल ही जाती है। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ, वो मुझे मिल गई थी। लेकिन फिर एक दिन, न जाने कैसे वो अचानक मेरी लकीरों से बहुत दूर चली गई।

आज भी, जब कभी तन्हाई में पुरानी यादों का दरवाज़ा खुलता है, तो वो बारिश, वो अमरूद की टहनी और वो… सब लौट आते हैं। वो आज भी बहुत याद आती है… बिल्कुल वैसे ही।


Shanky ❤ Salty
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सुनहरा अवसर!

सुनहरा अवसर - कतरा-कतरा ज़िंदगी का

“कुछ शब्द, कुछ एहसास, कुछ अनकही कहानियाँ…
शायद यही तो ज़िंदगी है।” ❤️

📢 सुनहरा अवसर!

सभी रचनाकारों और कवियों के लिए…

हर इंसान के दिल में एक कोना ऐसा होता है, जहाँ कुछ यादें, कुछ जज़्बात और कुछ अनकही कहानियाँ छिप कर रहती हैं। हम उन्हीं एहसासों को एक किताब में पिरोने जा रहे हैं।

हमारी आगामी पुस्तक

“कतरा-कतरा ज़िंदगी का”

में अपनी कविता प्रकाशित करवाएं!

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“आइए, अपनी कलम उठाइए और अपने दिल के अनछुए कोनों को पन्नों पर उतरने दीजिए…” 🖋️❤️

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🗓️ अंतिम तिथि:
30 अक्टूबर!

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कतरा-कतरा ज़िंदगी का

कतरा-कतरा ज़िंदगी का


प्रेम के एक कतरे में ही पूरी ज़िंदगी का सार छिपा है

ज़िंदगी कभी एकमुश्त नहीं मिलती,

यह तो कतरा-कतरा ही बरसता है।

और प्रेम?

प्रेम इस बरसते हुए कतरे में छिपी वह रोशनी है,

जो क्षण भर को ही सही,
पर एक पूरे इंद्रधनुष को जन्म दे देती है।

हम अक्सर प्रेम को समंदर समझने की भूल कर बैठते हैं।

हम चाहते हैं कि वह अथाह हो,
उसकी कोई सीमा न हो,

और वह हमेशा हमारी मुट्ठी में ठहरा रहे।

पर सत्य तो यह है कि असीमित समंदर कभी प्यास नहीं बुझाता।

प्यास तो वह एक कतरा बुझाता है,
जो बिना किसी शर्त के होंठों को छू जाता है।

प्रेम को भविष्य के किसी बड़े वादे की दरकार नहीं होती।

वह कल की नींव पर आज का महल नहीं बनाता।

वह तो बस वर्तमान की हथेली पर ओस की एक बूँद की तरह ठहरता है—

‘पारदर्शी, पवित्र और अपने आप में संपूर्ण।’

क्या यह आवश्यक है कि जो साथ चले,
वह अंत तक चले?

नहीं।
कुछ यात्राएँ इसलिए नहीं होतीं कि किसी गंतव्य पर पहुँचा जाए।

कुछ यात्राएँ सिर्फ़ इसलिए होती हैं ताकि राह में बिताए गए उन चंद पलों में, हम ख़ुद से मिल सकें।

वह व्यक्ति जो आपके जीवन में केवल एक ऋतु के लिए आता है, कभी-कभी पूरी उम्र का वसंत देकर चला जाता है।

प्रेम कोई गणित नहीं कि हम यह गिनें कि किसने कितना दिया, और बदले में कितना मिला।

वह तो ‘कतरा-कतरा ज़िंदगी’ को अपनी उँगलियों से पिरोने का नाम है।

एक मुस्कान का कतरा, एक मौन का कतरा, एक अनकहे एहसास का कतरा।

जब ये कतरे मिलते हैं, तो एक ऐसी स्मृति बनती है जो समय के पार चली जाती है।

हम जानते हैं कि बूँद का स्वभाव ही वाष्प हो जाना है।

हम जानते हैं कि हर मिलन के गर्भ में एक विदाई पल रही होती है।

पर क्या वाष्प हो जाने के डर से ओस पत्तियों पर चमकना छोड़ देती है?

नहीं। वह जानती है कि उसका सौंदर्य उसके ठहरने में नहीं, उसके चमकने में है।

प्रेम भी ठीक ऐसा ही है।

वह यह नहीं पूछता कि कल क्या होगा, या समाज की शर्तें क्या हैं।

वह तो बस आज के इस कतरे में पूरा का पूरा जी लेना चाहता है।

क्योंकि वह जानता है कि जो इस एक कतरे में जी लिया गया, वही शाश्वत है।

अंत में, हम जीवन को बरसों या सदियों में नहीं नापते।

हम उसे उन कतरों में नापते हैं, जहाँ हमने बिना किसी शर्त के प्रेम किया था…

और जहाँ हमने सच में साँस ली थी।

“समंदर की चाहत में क्यों उम्र गुज़ारे,

प्रेम के एक कतरे में ही पूरी ज़िंदगी का सार छिपा है।”

✍️ ~ Shanky❤salty

✨ Modified by: Dr. Rekha Rani

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विसर्जन

Varanasi Ghat Poetry

‘मृत्यु के बाद अस्थियों को तुम गंगा में विसर्जित तो कर दोगे, पर मेरा मन जो मर चुका है… उसे मैं किधर विसर्जित करूँ?

नश्वर देह की राख को तो मोक्ष का कोई घाट मिल जाएगा, पर इन चलती साँसों के बीच जो श्मशान बस गया है… उसकी शांति के लिए, भला मैं कौन सा घाट ढूँढूँ?

~ Shanky❤️salty

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कुछ ना कहना है

Shanky Salty Poetry

लोग अब मुझसे अपेक्षा करते हैं कि मैं कुछ कहूँ, कुछ बोलूँ। पर हकीकत तो यह है कि उन्होंने मुझे कुछ कहने की स्थिति में ही नहीं छोड़ा हैं।

अगर उनकी बात मानकर मैं कुछ कह भी दूँ, तो वे मेरी बातों को अपनी ही दृष्टि से देखकर, अपनी विचारधारा के अनुरूप उसका अर्थ निकालेंगे और उसे बाँट दिया करेंगे। वे मुझे अपनी चालाकियों में फँसाकर वापस से तोड़ देंगे।

पहले तो जानबूझकर मुझे कमजोर कर दिया गया, और अब कहते हैं कि मैं कुछ कहता नहीं, चुप रहता हूँ। अगर कुछ कह भी दूँ, तो वे ऐसे-ऐसे दृष्टांत पेश करेंगे कि मेरी दृष्टि ही खत्म कर देंगे, और मेरे कहने का कोई अर्थ ही नहीं रह जाएगा।

इसलिए मेरा शांत रहना ही सही हैं। पर यहाँ मैं स्पष्ट कर दूँ कि शांत रहने का मतलब निष्क्रिय होना बिल्कुल नहीं है, बल्कि बहुत ही सूझबूझ के साथ पर्दे के पीछे से खुद पर काम करते रहना हैं।

~ Shanky ❤️ salty

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चुभते फूल

सुकून और डायरी

कलम उठाई ही थी कि लिख दूँ…

“मुझे रुलाकर गैरों के साथ हँसने वालों,
ज़रा अपने कर्मों से तो डरो।”

पर तभी मेरे अंतर्मन से एक आवाज़ आई… हँसते हुए।

कहने लगा— “किसके लिए लिख रहे हो? किसे सुनाना है? उन्हें?”

जिनका हर काम फ़रेब की चादर में लिपटा है?
जो जीते-जी तुम्हें जलाते हैं, और तुम्हारे जाते ही घर का चूल्हा बुझा देते हैं?
जो तरह-तरह का प्रपंच रचकर, तुम्हारे जाने के ठीक बारहवें दिन…
पूरे मोहल्ले को बुंदिया-पूरी की दावत पर बुलाते हैं?

भला उनके लिए तुम अपना दिल क्यों छोटा करते हो? आँखों में ये बच्चों जैसे आँसू क्यों ले आते हो?

सारे रिश्ते झूठे हैं, साँस रुकते ही टूटते हैं। तो अगर जीते-जी कोई रिश्ता टूट रहा है, तो तुम मुस्कुराकर क्यों नहीं जीते हो? ग़म का ज़हर क्यों नहीं पी लेते हो?

याद है ना? लोग अक्सर तुम्हें काँटों से सावधान किया करते थे। पर मैंने हमेशा तुम्हें फूलों से सावधान किया।

क्योंकि काँटे अगर चुभ जाएँ, तो सिर्फ़ ऊपरी ज़ख्म देते हैं…
पर अगर कोई ‘अपना’ फूल बनकर चुभ जाए ना, तो वो सीधा अंतःकरण को चीर देता है, रूह तक ख़त्म कर देता है।

और ये तो तुम जानते ही हो…

कि हर किसी को मोतियों की चाहत होती है, पर बीज वो सिर्फ़ चने के ही बोना जानते हैं। चने बोते हैं वो, और बदले में सुंदर मोती चाहते हैं? इंसान जो बोएगा, अंत में वही तो काटेगा।

✦ ✦ ✦

इसलिए… जो टूट रहा है, उसे टूटने दो।
जो छूट रहा है, उसे छूटने दो。
अंत में जो होना है, वो आज, अभी हो रहा है…
धीरे-धीरे ही सही, बोझ तो हल्का हो रहा है।

कबीर साहब भी तो कह गए हैं—

“भला हुआ मोरी गगरी फूटी,
मैं तो पनिया भरन से छूटी।”

फिर क्या था…

मैंने आँसू पोंछ लिए, एक घूँट पानी पिया…
कलम किनारे रखी, और सुकून से सो गया।

Healing… Slowly But Happening…

Shanky

(ASHISH KUMAR)

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अथाह दाह…..!!!!

Ganga Ghat Sunset Poem

मेरे दाह-संस्कार के बाद,

मेरी अस्थियाँ

गंगा में डुबकी लगाने के लिए

चीखेंगी भी या नहीं,

मुझे नहीं पता…


🪷

पर अभी,

हृदय में जो यह

अथाह दाह जल रहा है,

वह सच में आपमें डुबकी लगाकर,

सदा के लिए

शांत हो जाना चाहता है।

~ Shanky ❤ Salty

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Rain Drop

Rain and Bhagavad Gita

“

Rain never thinks before it falls,

Whether it should fall on the drain or in the river,

Whether it should fall in the sea or on the mud

Rather, it simply falls everywhere.


✦ ❤️ ✦

Similarly, the teachings of the

Bhagavad Gita

also shower upon everyone without any discrimination.

However, it is necessary to be a


〜
Reader
〜

to receive its knowledge.

”

~ Shanky ❤️ Salty

To read my book

“The Essence of My Mother”

Please click below to read

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पुरुष भी रोता है….!!!!

Harishankar Parsai Quote by Shanky

“

”

हरिशंकर परसाई साहब कहते थे कि —

“पुरुष रोता नहीं है, पर जब वो रोता है,
रोम-रोम से रोता है।
उसकी व्यथा पत्थर में दरार
कर सकती है।”

पर मैं सोचता हूँ कि, पत्थर में दरार हो भी जाए तो क्या?
क्या उस दरार से उस पुरुष का
बीता हुआ जीवन कभी वापस लौट पाएगा?
जिस वजह से पुरुष रोया है या उसे रुलाया गया है,
क्या उसके हृदय में पड़ी दरार को कोई कभी भर पाएगा?

सच तो यह है कि पुरुष सदैव से रोता आया है,
बस उसने अपने ग़म को ख़ामोशी में छिपाया है।
पर समाज ने उसके हर छलकते अश्क को,
‘मर्द को दर्द नहीं होता’ जैसे कुवाक्यों से छुपाया है,
उसकी सिसकियों को एक झूठे आवरण में बाँधा है।

पुरुष तो उस कोमल रुई की बाती की तरह है,
जो खुद को आँसुओं से गीला करके,
सबकी तरक्की के खातिर,
अपना सर्वस्व न्योछावर कर दीपक की तरह जलता है,
दूसरों को रोशनी देकर, खुद तिल-तिल गलता है।

कभी एक बेटे के तौर पर, कभी पति के तौर पर,
तो कभी एक पिता के रूप में,
उसने हर रिश्ते को अपना कंधा दिया है।
पर अफ़सोस, जब भी छलकती हैं उसकी आँखें,
दुनिया ने पुरुषों के अनमोल आँसुओं को बेमोल ही समझा है।

– – ✧ – –

~ Shanky ♥ Salty

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मैं हूँ विधवा…..!!!!

❤❤❤

सूनी चौखट और बिखरी चूड़ियाँ

एक ऐसी चीख, जिसे समाज ने महज़ एक कविता समझ लिया…

सूनी चौखट पर बैठी स्त्री

शाम की लाली जब आसमान पर बिखरती, तो कभी उसके चेहरे पर भी एक सुकून भरी मुस्कान खिल जाती थी। लेकिन आज, आसमान लाल था और उसकी आँखें भी, बस वह मुस्कान कहीं खो गई थी। वह अपने सूने आँगन की चौखट पर बैठी थी, जहाँ सामने रखी तुलसी की पत्तियाँ सूखकर झड़ चुकी थीं। बीते कुछ महीनों में मेघ जमकर बरसे थे, सूरज भी अपनी पूरी रौनक़ से चमका था, पर उसकी तुलसी… उसकी तुलसी तो उसी दिन सूख गई थी, जिस दिन उसके जीवन का सूरज सदा के लिए अस्त हो गया।

वह एकटक उस खाली रास्ते को देख रही थी और सोच रही थी कि कागज़ पर अपनी इस हालत को क्या नाम दे? क्या लिखे वह? अपनी बेचैनी का हिसाब दे, या उस कसक को शब्दों में पिरोए, जो हर साँस के साथ उसके सीने में उठती है? उसे आज भी वह मनहूस दिन याद था। जब उसके जाने की खबर उस घर की देहरी लाँघकर अंदर आई थी, तो वह फूट-फूटकर नहीं रोई थी। रोने के लिए जो एक ठहराव चाहिए होता है, वह तो जैसे उसके भीतर से छिन ही गया था। बस आँखों से काले आँसू बहे थे। वह काजल, जो उसने बड़े चाव से सिर्फ उसके नाम का अपनी आँखों में सजाया था, उन खारे आँसुओं के साथ बहकर उसके गालों पर एक भयानक स्याही छोड़ गया था।

समाज और रस्मों के नाम पर उस दिन उसकी काँच की चूड़ियाँ बेरहमी से तोड़ दी गई थीं। खनकते हुए काँच के टुकड़े ज़मीन पर बिखरे थे, पर हक़ीक़त तो यह थी कि चूड़ियाँ नहीं, वह खुद काँच की तरह टूटकर उस आँगन के फ़र्श पर बिखर गई थी।

एक ही झटके में, राम जी ने उसके जीवन का जलता हुआ दीया बुझा दिया था। वह सुहाग, जिस पर वह इठलाती थी, एक पल में उजाड़ दिया गया। उसके वजूद से उसका नाम छीनकर उसके माथे पर एक ऐसा शब्द चिपका दिया गया, जिसने उसकी पूरी इंसानियत ही निगल ली—‘विधवा’। वह सिंदूर, जिसे वह अपने अस्तित्व का गुरूर मानती थी, एक बेदर्द हाथ ने पोंछ दिया था। अब वह रोती नहीं थी। उसके आँसू सूख चुके थे, जैसे रेगिस्तान में कोई इकलौती नदी सूख जाती है।

चौखट पर बैठे-बैठे उसकी नज़र आँगन के कोने में फुदकती दो चिड़ियों पर गई। उसे याद आया, एक बार उसने हँसते हुए उन दो चिड़ियों की तरफ़ इशारा करके उससे कहा था, “देखो, ये हम दोनों हैं। हमेशा साथ।” उसकी सूखी आँखों में एक भयानक चुभन-सी हुई। प्रकृति में वे दोनों चिड़ियाँ आज भी साथ थीं, पर उसका साथी कहाँ उड़ गया?

जिन शुभ कर्मों, पूजा-पाठ और मंगल उत्सवों में कभी उसे सबसे आगे बिठाया जाता था, आज वहाँ से उसे एक अछूत की तरह झिड़ककर बाहर कर दिया जाता। “पीछे हटो, अपशकुन हो जाएगा”—ये शब्द किसी ख़ंजर की तरह उसके सीने में उतर जाते। बीमार पड़ने पर कोई उसका हाल तक पूछने या उसके सूने कमरे में झाँकने तक नहीं आता। और उन तानों में सबसे तीखा और विषैला ताना था—“कुलक्षणी है, अपने ही पति को खा गई।”

वह उस बाग़ का एक खूबसूरत फूल थी, जो अब ज़मीन पर लावारिस बिखरा पड़ा था। और इसी बिखराव का फ़ायदा उठाने के लिए समाज के कुछ कुत्ते उस पर अपनी गंदी नज़रें डालते थे। वे आते तो थे उसका दुख बाँटने का बहाना लेकर, पर उनकी बातों में तन का सुख देने की घिनौनी पेशकश छुपी होती थी। वह जानती थी कि उनके लिए उसका यह अथाह दुख महज़ एक मौक़ा है। इंसानियत के नाम पर फैले इस पाखंड को देखकर उसका हृदय ख़ून के आँसू रोता था।

सबसे बड़ी विडंबना तो यह है कि जब वह अपने इस सीने चीर देने वाले दर्द को पन्नों पर उतारती है, तो दुनिया क्या करती है? वे लोग उसकी बहती हुई पीड़ा को महज़ ‘कविता-कहानी’ समझकर पढ़ते हैं। उसकी चीखों पर ‘वाह-वाह’ करते हैं। उसे एक ‘मार्मिक’ रचना बताकर आगे बढ़ जाते हैं। पर उस कागज़ पर गिरे उसके असली आँसुओं को, उसकी असली तड़प को पढ़ने वाला कोई नहीं है।

“हे कालों के महाकाल! मेरी तो पूरी बगिया ही उजड़ गई।”

वह महाकाल से बस एक ही भीख माँगती है—“जैसे राधा ने उस विरह को अमर कर दिया, वैसे ही यह दुनिया का ज़हर, यह मेरा अथाह दुख भी मुझमें पच जाए। मुझे वह ज्ञान, वह वैराग्य जल्दी दिला दो, ताकि इस नश्वर देह के सारे मोह और दर्द हमेशा-हमेशा के लिए शांत हो जाएँ।”

– – ✍️ – –

उसके आँसू जब बहते थे, तो पन्नों पर कुछ ऐसे रूप लेते थे…

दर्द लिखूँ या लिखूँ मैं अपने हालात,
बेचैनी लिखूँ या लिखूँ मैं वो कसक।
आँखों के काले आँसू बहे थे,
जब तुम मुझे छोड़ गए थे।
हाँ, तुम्हारे नाम का काजल लगाया था,
वो बह गया था तुम्हारे जाने की ख़बर से।
काँच की चूड़ियाँ जो पहनी थीं, वो तोड़ दी गई थीं,
हक़ीक़त में मुझे काँच की तरह तोड़ दिया गया था, तेरे जाते ही।

जलते दीये को राम जी ने बुझा दिया था,
मेरा सुहाग उजाड़ दिया था।
‘विधवा’ नाम मुझको दिया गया,
माँग से सिंदूर पोंछ दिया गया,
जो तेरे नाम का मैं लगाया करती थी।
मैं रोती नहीं, क्योंकि आँसू तो सूख गए मेरे,
तुम मुझसे रूठे थे या किस्मत मेरी फूटी थी, पता नहीं।
पता तो बस इतना है, जीवन मेरा अब बस अकेला है,
जीवनसाथी ने साथ सदा के लिए छोड़ा है।

दो चिड़ियाँ दिखाई थीं तुमने,
और कहा था, “ये हम दोनों हैं।”
पर देखो न, वो दोनों तो आज भी साथ हैं,
पर तुम क्यों नहीं हो मेरे साथ?
कहाँ उड़ गए तुम?
मेरी नींद तुम उड़ा ले गए,
जब से तुम सदा के लिए सोए।

छन-छन पायल की आवाज़ से घर गूँजा करते थे,
अब मेरी चीखों की आवाज़ से मेरा मन गूँजा करता है।
तुम्हारी जान थी न मैं,
आज बेजान हो गई हूँ मैं।

कोई झाँकने तक नहीं आता है,
न दवा देता है, न देता है ज़हर।
बस ताने ही मिलते हैं, बस तड़पता छोड़ जाता है。
तेरे जाते ही घर का चूल्हा बुझ गया था,
पर हृदय में आग लग गई थी।
कहते हैं लोग, मैं तुम्हें खा गई हूँ।

रात लंबी होती है,
पर हक़ीक़त तो यह है,
मेरी ज़िंदगी अब वीरान हो गई है।
मरुस्थल-सी हो गई है, बस काँटे ही रह गए हैं।
फूल तोड़ ले गया कोई,
ज़िंदगी मेरी विधवा हो गई।

सूरज की लाली देख मुस्कुराती थी मैं,
आँखें अब भी लाल ही रहती हैं मेरी, पर मुस्कुराती नहीं हूँ मैं।
वो तो बस कहने की बात थी,
सात जन्मों के लिए मैं तुम्हारी थी,
हक़ीक़त में तो मैं असहाय थी।
मेघ भी बरसे, सूरज भी चमके,
पर तुम्हारी तुलसी सूखी ही रह गई, तेरे जाने के बाद।

तुम्हारे बाग़ का फूल थी मैं, जो बिखरी पड़ी हूँ।
समाज के कुछ कुत्ते नज़र डालते हैं,
तन का सुख देने की बात करते हैं,
मेरे मन को कचोटते हैं।
लोग कहते थे, दुख बाँटने से कम होता है,
पर मेरा दुख तो एक बहाना है,
दरअसल उन्हें मेरे साथ बिस्तर पर सोना है।

इश्क़ मुकम्मल न हो तो लोग रोते हैं, मरने की बात करते हैं।
ज़रा मुझको भी बतलाओ न, मैं करूँ तो क्या करूँ?
हृदय तो है, पर धड़कन नहीं है,
जिस्म तो है, पर जान नहीं है।
दर्द तो इतना है कि शब्द नहीं हैं बयाँ करने को।

हे कालों के महाकाल!
बगिया मेरी उजड़ गई,
आज कंठ मेरा फिर से भर गया।
समाज की नज़रों में,
राधा को कृष्ण न मिले,
फिर भी कृष्ण राधा के ही कहलाए।
दुख मेरा भी पच जाए,
यह ज्ञान आप मुझको जल्दी दिलाएँ।

दर्द भरी कलम से,

Shanky

(ASHISH KUMAR)

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सुकून की नींद….!!!!

सुकून

सच्चाई के बोझ से बेहतर है, सुकून की नींद…

अकेलेपन का सुकून

सच्चाई के खोखले मुखौटे से कहीं बेहतर है
झूठ का ढिंढोरा पीटकर,
मुस्कुराते हुए
सच को हू-ब-हू देखना।

इस दुनिया-ए-महफ़िल में
खुद को इतना बदनाम कर लो
कि सुकून की साँस लेते हुए
हर फ़रेब को बेपर्दा देख सको।

इज़्ज़त और सच्चाई की
इस झूठी भूख से बेहतर है
बदनामी की चादर ओढ़कर
इत्मीनान की नींद सो जाना।

वो कहती थी मुझसे कि…

“मसीहा बनोगे, तो यीशु की तरह कीलों पर टाँग दिए जाओगे,

मर्यादित जियोगे, तो राम की तरह वनवास भेज दिए जाओगे।”

शायद इसीलिए
अब सिर से पाँव तक बदनाम होकर
बस दिल से आज़ाद रहना है।

अब तुम्हारी हर बात में मेरी ‘हाँ’ है
क्योंकि तुम भी जियो,
और मुझे भी जीने दो।

मुझे अब कोई संघर्ष नहीं करना।
गिनती के चार दिन की ज़िंदगी है,
तो क्यों ख़ामख़्वाह
इस भीड़ से उलझना?

सच तो ये है
जिस भीड़ को अपना माना था,
वही भीड़
जीते-जी सीने में आग लगाती है,
और साँस रुकते ही
पूरे जिस्म को।

सच कहता हूँ
सच्चाई की गठरी बहुत भारी होती है,
और सच्चाई का कोई सर्टिफ़िकेट
यहाँ काम नहीं आता।

साँस टूटते ही
सब कुछ पानी में बहा दिया जाता है।

तो बेहतर है,
एक अफ़वाह फैलाई जाए,
मेरे मरने की ख़बर
हवा में उड़ा दी जाए,
झूठ को झूठ से टकराकर
इस नंगे सच को देखा जाए।

– – ⚔️ – –

जिस्म पर ख़ुशबू लगाकर
भीड़ के ताने सुनने से
लाख बेहतर है—

खुद पर कीचड़ का लेप लगाकर
अकेले
सुकून की नींद सोया जाए।

कलम से,

-Shanky

(ASHISH KUMAR)

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रंडी

🔥 ❤ 🔥

“रंडी”
को मिला भारत सरकार से कॉपीराइट!

Government of India Copyright Certificate

भारत सरकार द्वारा आधिकारिक मान्यता 🇮🇳

आज का दिन मेरे लिए सिर्फ एक लेखक के तौर पर नहीं, बल्कि समाज की उस कड़वी सच्चाई की आवाज़ बनने के रूप में बहुत खास है। मुझे आप सभी के साथ यह साझा करते हुए बेहद गर्व हो रहा है कि मेरी किताब “रंडी” को भारत सरकार के कॉपीराइट कार्यालय से आधिकारिक रूप से मान्यता और कॉपीराइट सर्टिफिकेट मिल गया है।

यह केवल एक सरकारी सर्टिफिकेट नहीं है, बल्कि यह उस हकीकत पर मुहर है जिसे हमारा समाज अक्सर अनदेखा कर देना चाहता है।

जैसा कि मैंने अपनी किताब में लिखा है—

“कहते हैं नवरात्र में माँ की पूजा करो… घरों में कलश सजाओ… पर वही समाज नवरात्र खत्म होते ही किसी बेटी के जिस्म को अपनी हवस का प्रसाद बना देता है।”

यह किताब कोई सजावटी साहित्य नहीं है। यह उस कड़वाहट, उस कपट और उस कुरूपता की कहानी है, जहाँ एक ओर हम माँ दुर्गा को पूजते हैं, और दूसरी ओर उसी माँ के रूप में जन्मी बेटियों को अंधेरे कमरों और बाज़ार की बोली में बेच देते हैं। यह उन आवाज़ों का संग्रह है जो कोठों की दीवारों में कैद रहीं।

365 दिन में से, जहाँ 9 दिन शक्ति की स्तुति होती है और बाकी 356 दिन उसी शक्ति का शोषण
यही इस किताब का सबसे बड़ा सच है।

Randi Book Cover

आप लोग मुझे Shanky के नाम से जानते हैं। मेरी लेखनी का उद्देश्य कभी भी खोखला सम्मान कमाना नहीं रहा, बल्कि सच को बिना किसी नकाब के, सीधे चेहरे पर दे मारना रहा है। मेरी एक कविता जो आप सभी ने इंटरनेट पर बहुत साझा की है, वो इस किताब की आत्मा को दर्शाती है:

“अगर मर्दों में हवस की आग न होती,
तो खुदा क़सम हर तवायफ़ किसी बच्चे की माँ होती।”

आज जब इस किताब को सरकारी तौर पर कॉपीराइट मिल गया है, तो मुझे यह अहसास हो रहा है कि समाज के दोगलेपन पर किया गया मेरा यह प्रहार सही दिशा में जा रहा है और लोगों तक पहुँच रहा है।

– – ⚔️ – –

आप भी पढ़ें और इस सच का सामना करें!

मैं चाहता हूँ कि आप भी इस नंगी और खुरदरी सच्चाई से रूबरू हों। यह किताब आपको झकझोर देगी और सोचने पर मजबूर कर देगी।


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अंत में बस इतना ही कहूँगा, “जो भी हूँ, जैसा भी हूँ, अपने प्यारे महादेव का हूँ। धीरे-धीरे आप सब जान जाएंगे महादेव की कृपा से।”

आप सभी के प्यार, समर्थन और इस सफर में साथ खड़े रहने के लिए दिल से शुक्रिया। सच को पढ़ते रहिए, सच को साझा करते रहिए!

आपका अपना,

– Shanky

(ASHISH KUMAR)

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बाँटा ही बाँटा है…

बाँटा ही बाँटा है…

💔

जीवन के बँटवारे की एक मार्मिक रचना

एक सृष्टि है

सुंदर-सी प्यारी-सी बेहद खुबसूरत-सी,

जब उस सृष्टि को बाँटा गया

तो बहुत से ग्रह, नक्षत्र, तारे, सितारे हो गए,

उसमें हमारी पृथ्वी हो गई

अब उसे भी महाद्वीपों में बाँट दिया,

– – ✤ – –

महाद्वीपों को देशों में विभाजित कर दिया

देशों को राज्यों में बाँटा गया

राज्यों का जिला में बटवारा हुआ

जिला का अंचल में विभाजन हो गया,

अंचल से प्रखण्ड में

प्रखण्ड से गाँव, गाँव से मुह्ह्ल्ले, कसबे कर के बाँटता गया….

खैर छोड़ों,,,,

यहाँ तक तो थोड़ा ठीक था

– – ✤ – –

जब जन्म हुआ

तो कहाँ जन्म हुआ?

मतलब किस घर में, किस कुल में ,किस धर्म में, किस जात में,

हिन्दू ,मुस्लिम ,सिक्ख, ईसाई कह कर खुद को बाँटें

फिर हिन्दू में भी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र मे बाँटें

मुस्लिम होकर भी शिया ,सुन्नी में खुद को बाँटें,

चलो कोई नहीं,,,,

– – ✤ – –

घर में भी माँ, बाप, भाई, बहन, सगे-संबंधी में भी बटवारा

जमीन का टुकड़ा भी बाँटा

पैसे का बटंवारा किया

यह सोच कर कि बाँटने के बाद वह मेरा होगा

– – ✤ – –

पर हकीकत तो सामने तब आई

जब मृत्यु दरवाजे पे आई

और मुस्कुरा कर कही

“चलो वक्त हो गया है तुम्हारा ,जो है तुम्हारा सब बाँधो और साथ ले चलो”

– – ✤ – –

दो पल रूक देखा मैंने

आखिर बचा ही क्या है मेरा

शुरुआत से अंत तक तो सिर्फ बाँटा ही बाँटा है

भला बाँटने से कोई भी चीज बढ़ती थोड़ी है….?

फिर क्या था

सब कुछ छोड़ जाना पड़ा

– – ✤ – –

रंग तो बेशुमार हैं

और उन बेशुमार रंगों में

रंग सात हैं इंद्रधनुष के

पर हकीक़त तो यह है कि

उस सात रंगों में भी

रंग एक ही है

रंग-ए-सफ़ेद इश्क़ का…

मेरे मौला का…

Shanky

(ASHISH KUMAR)

यह कविता अमर उजाला काव्य (मेरे अल्फ़ाज़) पर भी प्रकाशित है।


अमर उजाला पर पढ़ें

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संघर्ष से शिखर तक…..!!!!!

संघर्ष से शिखर तक…

डॉ. कविता की शानदार सफलता (BPSC रैंक 123) के नाम

BPSC RANK 123
SDM DR. KAVITA

कुछ सफ़र किताबों में नहीं मिलते,

उन्हें जीना पड़ता है।

कुछ जीतें संयोग नहीं होतीं,

उन्हें हर दिन थोड़ा-थोड़ा सींचना पड़ता है।

– – ✤ – –

और आज,

जब बिहार लोक सेवा आयोग की सूची में

रैंक 123 के साथ तुम्हारा नाम चमका है,

तो लगता है जैसे वर्षों का संघर्ष

एक मुस्कान बनकर लौट आया हो।

– – ✤ – –

डॉ. कविता - BPSC सफलता

बिहार लोक सेवा आयोग, पटना के समक्ष गौरवमयी क्षण

– – ✤ – –

लोग कहेंगे—

भाग्य अच्छा था,

दुआएँ काम आ गईं,

समय साथ दे गया।

– – ✤ – –

पर मैं सच जानता हूँ,

उन दुआओं के पीछे कितने ताने भी थे,

कितनी सलाहों के भेष में निराशाएँ थीं,

कितने सवाल थे जो हर मोड़ पर

तुम्हारे आत्मविश्वास को परखते रहे।

– – ✤ – –

तुमने सब सुना…

पर हर बात का उत्तर शब्दों से नहीं,

अपने कर्मों से दिया।

– – ✤ – –

मुझे याद है वह समय,

जब छोटी-छोटी बातें भी तुम्हें परेशान कर देती थीं,

जब दूसरों के विचार

तुम्हारे मन में घंटों मंथन करते रहते थे,

जब दुनिया की आवाज़ें

तुम्हारी अपनी आवाज़ को दबा देती थीं।

– – ✤ – –

फिर एक दिन,

तुमने स्वयं को सुनना शुरू कर किया।

– – ✤ – –

और जिस दिन तुमने

दुनिया को समझाने की जगह

खुद को समझना शुरू किया,

उसी दिन तुम्हारी जीत लिखी जा चुकी थी।

– – ✤ – –

राँची की गलियों से,

पटना की भागदौड़ तक,

दिल्ली की दूरियों से,

अनगिनत किताबों, नोट्स,

नींदहीन रातों और अनकहे संघर्षों तक।

– – ✤ – –

यह जो मुकाम आज तुम्हारे सामने खड़ा है,

उसकी हर ईंट पर

सिर्फ तुम्हारा नाम लिखा है।

– – ✤ – –

क्योंकि कुछ सफलताएँ साझा नहीं होतीं,

उन पर केवल उस इंसान का अधिकार होता है

जिसने उन्हें पाने के लिए

अपना सब कुछ दाँव पर लगाया हो।

– – ✤ – –

और शायद इसलिए

इस सफलता का श्रेय भी

सबसे अधिक तुम्हें ही जाता है।

– – ✤ – –

डॉ. कविता - स्त्री-मन लेखिका

अपनी कृति ‘स्त्री-मन’ के साथ डॉ. कविता

– – ✤ – –

तुम “स्त्री-मन” की लेखिका हो… तुमने लिखा था:

“ख़्वाहिशों में भी दम भरना,

ग़ैर-ज़रूरी बातों का ख़याल अनसुना कर

तू बस चलती रह,

और एक दिन तू उड़ जाना।

याद रख,

स्त्री है तू,

कभी बेचारी नहीं,

समंदर है तू।”

– – ✤ – –

आज लगता है,

तुमने केवल यह कविता नहीं लिखी थी,

तुमने अपना भविष्य लिख दिया था।

– – ✤ – –

तुमने साबित कर दिया कि

स्त्री दया की पात्र नहीं,

संभावनाओं की पराकाष्ठा है।

– – ✤ – –

तुमने साबित कर दिया कि

समाज की तकियानूसी सोच से बड़ी

एक स्त्री की इच्छा-शक्ति होती है।

– – ✤ – –

तुमने साबित कर दिया कि

जब मनुष्य स्वयं पर विश्वास कर ले,

तो इतिहास उसके लिए जगह बना लेता है।

– – ✤ – –

आज वही समाज,

जो कभी तुम्हें समझ नहीं पाया,

तुम्हारी उपलब्धि पर ताली बजा रहा है,

केवल अपने स्वार्थ के लिए।

– – ✤ – –

और तुम…

अपने बड़े हृदय के साथ

सबको धन्यवाद कह रही हो。

यही तुम्हारी सबसे बड़ी सुंदरता है।

– – ✤ – –

तुम्हारे भीतर की लेखिका,

तुम्हारे भीतर की चिकित्सक,

तुम्हारे भीतर की संघर्षशील स्त्री,

और तुम्हारे भीतर की प्रशासक—

आज सब एक साथ मुस्कुरा रहे होंगे।

– – ✤ – –

डॉ. कविता - विजेता मुस्कान

“फूल की तरह खिलते रहना…”

– – ✤ – –

बस एक बात याद रखना मित्र,

अपनी आँखों में अब कोई आँसू कभी ठहरने मत देना।

फूल की तरह खिलते रहना,

अपनी खुशबू हर दिशा में बिखेरते रहना।

– – ✤ – –

क्योंकि कुछ लोग स्वभाव से बड़े होते हैं,

और तुम उन्हीं लोगों में से हो।

– – ✤ – –

पटना के हनुमान मंदिर का लड्डू हो,

या गया जी की रामदाना का लाई,

आज हर मिठास फीकी लग रही है मुझे।

– – ✤ – –

क्योंकि वर्षों की तपस्या के बाद

जो सुख मिलता है,

उसका स्वाद किसी प्रसाद,

किसी उत्सव,

किसी मिठाई में नहीं होता।

वह बस हृदय में उतरता है।

– – ✤ – –

रैंक 123 एक संख्या हो सकती है,

पर मेरी नज़रों में डॉ. कविता की एक कविता हैं।

– – ✤ – –

और यह कविता

संघर्ष से शांति तक की यात्रा है।

– – ✤ – –

ऐसी यात्रा,

जिसे समय मिटा नहीं सकता।

खैर, एक दो तीन

मुझे है डॉ. कविता पे यकीन

हार्दिक शुभकामनाएँ मेरी प्यारी मैडम सर🤪

“उड़ान अभी शुरू हुई है… आकाश अभी बाकी है और आपको हर हाल में बस मुस्कुराना है।” 🌟

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दृष्टि

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दृष्टि और दर्पण
❤


Truth and Humanity

गणेश जी के मंदिर में कितनी भीड़ रहती है,

भक्तों का ताँता ही लगा रहता है।

देखकर मन प्रसन्न हो जाता है,

क्या खूब पूजा-अर्चना होती है!

तरह-तरह के भोग-नैवेद्य लगते हैं,

मन वास्तव में प्रफुल्लित हो जाता है।

उधर जगन्नाथ जी को भी देखो तो ज़रा,

वहाँ भी भक्तों का कैसा ताँता लगा रहता है!

नाथों के नाथ ‘जगन्नाथ’ कहलाते हैं वो।

पर, मन में एक सवाल आता है…

जब नज़र मेरी उन दिव्यांगों पर पड़ती है,

जो हस्तविहीन हैं, जो पादविहीन हैं, जिनका चेहरा विकृत है,

जिन्हें यह संवेदनहीन समाज‘विकलांग’ कह देता है।

दुनिया की नज़रों में वो केवल दया के पात्र हैं,

उनसे कोई वास्तविक प्रेम नहीं कर सकता।

बस दिखावे के लिए उन्हें अपना लिया जाता,

पर उनका साथ निभाने वाला कोई नहीं होता।

मुझे नहीं लगता कि उन विक्षिप्त चेहरों और

अपाहिज हाथ-पैरों वालों से किसी को कुछ मिल सकता हो।

बस कभी-कभी दुनिया को दिखाने के लिए,

उनके प्रति दया और करुणा का ढोंग रच दिया जाता,

तस्वीरें खींचवाई जाती हैं, अपने मरुभूमि जैसे चेहरे पर

लगे ‘नेकी के मुखौटे’ को ताज़ा रखने के लिए!

पर वास्तविकता में, हर किसी को ‘सूरत’ ही भाती है,

यहाँ ‘सीरत’ का कोई मूल्य नहीं होता।

रंग-भेद और रूप-भेद की यह जड़ें इतनी गहरी हैं कि

इसे लोगों के मन से कभी खत्म नहीं किया जा सकता।

अगर मैं आज कुछ कह दूँ या सवाल पूछ दूँ,

तो लोगों की कोरी और खोखली भावनाएँ आहत हो जाती हैं।

पर इसका मतलब यह नहीं कि मैं चुप रहूँ, या न कहूँ!

मैं तो सत्य को सत्य ही कहूँगा, और हू-ब-हू लिखूँगा।

~ ✤ ~

क्या जगन्नाथ और गणेश की मूर्तियाँ दिव्यांग नहीं कहलाएंगी?

तुलसीदास जी ने भी कहा था ‘जगन्नाथ जी’के लिए,

“हस्तपादविहीन दारुमूर्ति मेरा इष्ट नहीं हो सकता”।

तो तुम भी कह दो ना मेरे से।

पर तुम “नहीं, नहीं, नहीं, नहीं!” ही कहोगे,

क्योंकि वे केवल मूर्ति नहीं, वे तो ‘मंगलमूर्ति’ हैं!

इसलिए वे पूजनीय हैं, वे हमारी इच्छाओं की पूर्ति करती हैं,

हमारी झोलियाँ भरती हैं।

इसलिए उन्हें कुछ कहना गलत होगा, उन्हें ईश्वर कहना होगा,

आदर करना होगा—ताकि कल फिर उनके सामने भीख मांग सकें!

अगर इन मूर्तियों से हमारी वासना और स्वार्थ की पूर्ति नहीं होती,

तो इन्हें भी आज उन्हीं दिव्यांगों और विकलांगों की कतार में खड़ा कर दिया जाता।

“वासुदेवम् सर्वम् इति”…

बोलने में यह श्लोक कितना खूबसूरत लगता है,

पर जब इसे सच में अपनाने की बात आती है, तो हमारी मौत आने लगती है।

हकीकत में अगर इस श्लोक का सम्मान होता,

तो आज किसी दिव्यांग की आँखों में आँसू न होते,

उनका हृदय आज तड़पता नहीं, वे तिरस्कार की चादर न ओढ़े होते।

उन्हें भी गले से लगाया जाता।

“ईश्वर सब जगह है”—लोग बस कह देते हैं,

पर वे ईश्वर को न खुद में देख पाते हैं, न दूसरों में, न कहीं और।

बस जब तक स्वार्थ रहता है, तब तक मूर्तियों और मंदिरों में झोला फैलाए भटकते रहते हैं।

मेरा उद्देश्य गणेश पूजा या जगन्नाथ जी की आरती को रोकना नहीं है,

बल्कि उन सभी प्राणियों के भीतर बैठे उस ‘वासुदेव’ की पूजा करना है,

उनसे निश्छल प्रेम करना है।

भला कब तक एक ही जगह फूल चढ़ाओगे?

अब हर दिल में एक फूल चढ़ा दो,

हर मन में प्रेम का फूल खिला दो।

शांति किसी बाहरी वार्ता या बहस से नहीं आती,

बस खुद के शांत हो जाने से, वह खुद-ब-खुद आ जाती है।

मेरा हृदय सच में बहुत रोता है,

जब किसी दिव्यांग के साथ ऐसा भेद या तिरस्कार देखता हूँ।

पर मैं कर भी क्या सकता हूँ?

जिस ढीठ संसार को बड़े-बड़े संत समझा-समझा कर थक गए,

और उँगलियों पर गिने-चुने लोगों को ही समझा पाए;

तो भला उस स्वार्थी संसार को मैं क्या सिखा पाऊँगा?

मैं तो बस यूँ ही लिख देता हूँ अपने भाव,

क्योंकि उस विक्षिप्त चेहरे के पीछे छिपे दर्द को देख कर

वास्तविकता में मेरा हृदय रोता है…

वैसे तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस में यह भी कहा था:

“बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना।

कर बिनु कर्म करइ बिधि नाना॥

आनन रहित सकल रस भोगी।

बिनु बानी बकता बड़ जोगी॥”

~ shanky❤salty

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इश्क़-ए-इबादत

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इश्क़ इबादत भी है,
इशारा भी…

Ishq aur Ibadat

इक दिल की दहलीज़ पर
इक दिल का धीरे से झुक जाना भी।
कहा तो जाता है
इश्क़ में होठों को चूम लेना ही क़िस्सा नहीं,
पर मुझे यकीन है
इशारों में जी लेना,
इक-दूसरे की ख़ामोशियों को पी लेना,
इसी में इश्क़ की रूह बसती है

जब तुम हृदय पर हाथ रखते हो
तो जैसे इबादत की कोई इमली सी मिठास
रगों में उतर जाती है
और जब मैं तुम्हारे पैरों पर सिर रख देता हूँ
तो मेरी सारी इच्छाएँ
इक सूफ़ियाना सुकून में घुल जाती हैं

इश्क़ वही है
जहाँ ईर्ष्या की इजाज़त नहीं,
जहाँ इरादे नहीं,
बस इत्तेफ़ाक़ से मिलती दो रूहें
इक-दूसरे में शामिल होती चली जाएँ

𓆸

इबादत तब होती है
जब बिना वजह, बिना उम्मीद,
इक इंसान का दिल
इक ही इंसान के लिए
इंतिहा तक धड़कता रहे

और सच तो यह है
इश्क़ जब सच्चा हो,
तो इश्क़ में इल्तिज़ा नहीं होती,
केवल इबादत
बेआवाज़, बेवजह,
पर बेहद गहरी

इश्क़ इबादत-सा है,
पर यदि इश्क़ में इच्छाएँ घिर जाते हैं,
तो वही इबादत इश्क़ का इंतेक़ाम बन जाती है

इश्क़ में होंठों को चूम लेना ही सब नहीं होता,
मुझे तो यही लगता है
हृदय पर हल्के से हाथ रख देना,
पैरों पर सिर झुका देना,
बेवजह ही साथ रह जाना
इन्हीं निश्चल लम्हों में इश्क़ दिख जाता है

क्योंकि जहाँ इश्क़ हो,
वहाँ ईर्ष्या कभी इजाज़त नहीं लेती
इच्‍छाएँ हों भी, तो भी
इम्तिहानों में इमान की तरह
इश्क़ ही जीता है

इक इंसान के लिए
इक इंसान का
इंतेहा तक साथ चल देना
यही इश्क़ की असली इबादत है

~ Shanky

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प्रेमाली

प्रेम, प्रार्थना और प्याली


Chai and Rain

आज शाम मौसम बड़ा सुहाना था।
काले बादल थे, ठंडी-ठंडी हवा थी, और सच कहूँ तो चाय-पकोड़े वाला मौसम था।
लेकिन मेरे शरीर के नसीब में शायद चाय कहाँ थी…

हम सब बैठे थे। बातों-बातों में हँसी-मज़ाक चल रहा था। तभी किसी ने अचानक उसका ज़िक्र छेड़ दिया।

“यार… उसे भी तो चाय बहुत पसंद है ना?”

मेरे होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आई। मैंने बड़े प्यार से कहा,
“हाँ… और मुझे वो बहुत पसंद है।”

लेकिन सामने वाला मेरी बात कहाँ समझने वाला था। वह हँसकर बोला,

“बड़ा आया… तू कभी उसकी मिठास बन ही नहीं पाया।

भले तू महीनों चाय की तरह उबलता रहा, अपने रंग को छोड़कर उसकी चाय बना दी, मगर वक़्त के साथ चायपत्ती की असली जगह तो छन्नी तक ही होती है। होंठों तक तो दूध और शक्कर ही पहुँचते हैं… चायपत्ती तो आखिर में फेंक ही दी जाती है।”

एक पल को लगा जैसे किसी ने हँसते-हँसते मेरे भीतर की सबसे गहरी नस पर हाथ रख दिया हो।

बस… उसके बाद मेरी आवाज़ कहीं खो गई।
मैं चुपचाप उस महफ़िल से उठकर चला आया।
अपनी उस शांत महफ़िल में, जहाँ सिर्फ़ मैं ही मैं हूँ।
क्योंकि जहाँ द्वैत होता है, वहीं चुभन होती है।

❦

मन की बात मन ही जाने तो अच्छा है। बाहर ज़िक्र करो, तो अर्थ का अनर्थ होता है, और अंत में भावनाओं की अर्थी ही सजती है।

फिर मैं अकेला बैठा बहुत देर तक सोचता रहा…
मालूम है मुझे कि चाय बहुत पसंद है तुम्हें, पर अफ़सोस… मैं उसकी मिठास न बन सका।

मैं तो उस चाय-सा रहा जिसने पानी को अपना रंग दिया, अपनी ख़ुशबू दी, अपना स्वाद दिया, मगर जब सफ़र से हमसफ़र कि बात आई, तो छन्नी ने मुझे किनारे कर दिया। मैं तलछट बनकर रह गया, और लोग स्वाद की तारीफ़ करते रहे।

फिर अचानक भीतर से एक और आवाज़ आई…
“क्या सचमुच प्रेम इतना छोटा होता है?”

नहीं…
प्रेम तो प्राप्ति नहीं, प्रार्थना होती है।
प्रेम तो अपेक्षा नहीं, उपासना होती है।
प्रेम तो समर्पण होता है, समर्पण से समरसता होती है, समरसता से शांति होती है, और शांति से परमात्मा का मार्ग खुलता है।
एक दिन प्रेम ही परमात्मा हो जाता है।

❦

फिर समझ आया…
प्रेम वह नहीं जहाँ छन्नी दिखाई दे जाए।
प्रेम वह है जहाँ अलग होकर भी चाय का स्वाद महसूस होता रहे।
प्रेम वह है जहाँ प्याली होंठों से लगे और चेहरे पर अनायास “वाह…” निकल जाए।
प्रेम वह है जहाँ सामने वाला चाहे साथ रहे या न रहे, उसकी खुशी अपनी पूजा बन जाए।

भला वह प्रेम ही कैसा जिससे मन खिन्न हो जाए?
सच्चा प्रेम तो मन को विस्तृत करता है, संकुचित नहीं।

अब मेरी बोली नहीं निकलती… और शायद अब कभी निकलेगी भी नहीं।
क्योंकि जब शब्द मौन हो जाते हैं, तब आँसुओं के साथ आशीर्वाद निकलते हैं।

हर धड़कन प्रार्थना बन जाती है।
हर साँस पूजा बन जाती है।
हर स्मृति प्रसाद बन जाती है।

❦

अब तुम्हें पाने की हसरत नहीं है।
अब तो बस तुम्हें मुस्कुराते देखने की चाह है।
जहाँ भी रहो, बेख़ौफ़ रहो, आज़ाद रहो।
अपनी हँसी की रोशनी से हर दिशा को आबाद करते रहो।
तुम्हारी आँखों में कभी उदासी का मौसम न ठहरे।
तुम्हारे हिस्से में हर सुबह उजाला आए।
मेरी दुआओँ की छाँव तुम पर बनी रहे।

और मैं…
मैं प्रेम की उस पराकाष्ठा तक पहुँचना चाहता हूँ जहाँ सिर्फ़ प्रार्थना हो।
जहाँ सब कुछ निस्वार्थ होकर निछावर कर देने में ही प्रसन्नता हो।
जहाँ “मुझे क्या मिलेगा” वाली बनिए की बुद्धि को तिलांजलि देकर सब कुछ लुटा देने का साहस हो।
जहाँ जीवन की शाम होने से पहले अपना हर कतरा अर्पित कर दिया जाए।

अगर कभी किसी बारिश भरी शाम में तुम्हारे हाथ में चाय की कोई प्याली हो…
और उसकी भाप में तुम्हें किसी अनकहे प्रेम की हल्की-सी ख़ुशबू महसूस हो…

तो समझ लेना,
किसी ने तुम्हें पाया नहीं था,
फिर भी उम्र भर तुम्हारी खुशी की दुआ करता रहा।

क्योंकि अंततः…
प्रेम प्राप्ति नहीं, प्रार्थना है।
प्रेम पराकाष्ठा नहीं, परमात्मा है।
प्रेम व्यापार नहीं, विस्तार है।
और जो प्रेम में स्वयं को खो दे, वही सच में स्वयं को पा लेता है।

~ Shanky
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प्रेमोत्सव…..!!!!

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प्रेमोत्सव

Vat Savitri Puja

अखंड सौभाग्य और प्रेम का प्रतीक

आधुनिकता के इस शोरगुल भरे दौर में, जहाँ हर रिश्ते को तराजू पर तौलने की आदत सी पड़ गई है, लोग अक्सर एक बड़े ही सतही निष्कर्ष पर पहुँच जाते हैं। कहते हैं कि भारतीय दांपत्य में अब प्रेम कहाँ बचा है? सोशल मीडिया की बहसों में यह तर्क बड़ी आसानी से परोस दिया जाता है कि भारतीय विवाह संस्था केवल एकतरफा मर्यादाओं का बोझ है। एक ऐसा ढाँचा जहाँ केवल विवशता दिखाई देती है, दबाव दिखाई देता है या फिर स्पष्ट शब्दों में कहें तो—केवल शोषण दिखाई देता है। ऐसा माना जाने लगा है कि इस व्यवस्था में स्त्री केवल एक मूक दर्शक है, जो परंपराओं की बेड़ियों में जकड़ी हुई है और उसका प्रेम केवल एक थोपी गई ज़िम्मेदारी का दूसरा नाम है।

परंतु सत्य क्या है? क्या सत्य वही है जो कुछ आधुनिक सिद्धांतों की किताबों में लिखा है, या सत्य वह है जो इस देश की मिट्टी में, इसके त्योहारों में और यहाँ के जनमानस की रग-रग में बहता है?

आज महीनों बाद, जब मैं अपनी दिनचर्या की उसी पुरानी ऊब से घबराकर सुबह-सुबह घर से बाहर निकला, तो मेरी आँखों के सामने जो दृश्य था, उसने मेरे भीतर के सारे आधुनिक संशयों को एक झटके में धो डाला। जेठ के इस महीने की सुबह भी कोई ठंडी नहीं होती। सूरज की पहली किरण के साथ ही हवाओं में एक तीखी तपिश घुलने लगती है। लेकिन आज सड़क के किनारे खड़े उस विशाल, प्राचीन वट वृक्ष के नीचे आस्था, शृंगार और प्रेम का एक ऐसा अद्भुत, जीवंत मेला लगा था कि मेरा मन असीम आह्लाद और एक अनिर्वचनीय शांति से भर गया। सच कहूँ तो, शायद कई सालों बाद मैंने इतना पवित्र, इतना वास्तविक और इतना गहरा दृश्य देखा था, जहाँ दिखावा नहीं, बल्कि आत्मा का सीधा संवाद हो रहा था।

आज वट सावित्री की पूजा थी। उस पुराने बरगद के पेड़ के चारों ओर लाल, पीली, हरी और धानी साड़ियों में सजी-धजी महिलाएँ पूरी तन्मयता से पूजा में लीन थीं। उनके माथे का सिंदूर, हाथों की खनकती चूड़ियाँ, आलता रचे पैर और चेहरों पर एक अजीब सा अलौकिक तेज—यह सब कुछ इतना सम्मोहक था कि मैं ठिठक कर वहीं रुक गया। उस दृश्य को निहारते हुए मेरे मन में सवालों की एक आँधी सी उठी। क्या यह वाकई केवल एक अंधविश्वासी कर्मकांड था? क्या ये स्त्रियाँ किसी सामाजिक दबाव में यह सब कर रही थीं? या फिर यह प्रेम का वह शाश्वत, आदिम प्रतीक था जो आज पूजा का रूप धारण करके छलक रहा था?

Bangles of Love

इस भीषण गर्मी की कल्पना कीजिए। आसमान से आग बरसने की तैयारी हो रही है। हवा में अभी से लू के थपेड़ों का अहसास है। ऐसे में कोई इंसान, भूखे-प्यासे रहकर, अपने प्रियतम के लिए ईश्वर से उसकी लंबी उम्र की प्रार्थना करे—क्या यह दुनिया की कोई भी ताक़त किसी से ज़बरदस्ती करवा सकती है? शोषण और ज़बरदस्ती की एक सीमा होती है। भय से आप किसी से पत्थर तो उठवा सकते हैं, लेकिन भय से आप किसी के हृदय में वह अटूट श्रद्धा और तपस्या का भाव नहीं जगा सकते जो आज उन स्त्रियों के चेहरों पर झलक रहा था।

आज के इस सुविधाभोगी युग में, जहाँ लोगों से सुबह जल्दी उठा तक नहीं जाता, जहाँ हल्की सी भूख या प्यास लगने पर इंसान का स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है, वहाँ ये देवियाँ सुबह नहा-धोकर, बिना अन्न का एक दाना ग्रहण किए, बिना जल की एक बूँद कंठ से उतारे, नंगे पैर और पूर्ण श्रृंगार किए हुए केवल अपने मंगलसूत्र की दीर्घायु के लिए उस वट वृक्ष की परिक्रमा कर रही थीं। यह कोई विवशता नहीं थी। विवशता इतनी सुंदर, इतनी शांत और इतनी लयबद्ध हो ही नहीं सकती। यह तो प्रेम की वह पराकाष्ठा थी, जिसके आगे दुनिया के सारे भौतिकवादी सिद्धांत बौने साबित हो जाते हैं।

हमारे प्राचीन शास्त्रों और वैदिक वांग्मय में एक अत्यंत गूढ़ और दार्शनिक प्रश्न बार-बार उभर कर आता है— “कस्मै देवाय हविषा विधेम” (अर्थात, हम किस देवता की उपासना करें? किस देवता के लिए यह आहुति है?)। और आज, उस वट वृक्ष की छाँव के नीचे, जेठ की उस तपती सुबह में बैठी हर सुहागिन के पास इस जटिल दार्शनिक प्रश्न का अत्यंत स्पष्ट, सरल और मर्मस्पर्शी उत्तर था— ‘अपने पतिदेवता के लिए।’

यह शब्द ‘पतिदेवता’ आधुनिक कानों को खटक सकता है। इसे अधीनता का प्रतीक माना जा सकता है। लेकिन भारतीय दर्शन में ‘देवता’ वह नहीं है जो आप पर राज करता है, बल्कि ‘देवता’ वह है जो ‘देता’ है, जो प्रकाश पुंज है, जो जीवन का सहयात्री है। एक स्त्री जब अपने पति में देवता का रूप देखती है, तो वह उसे अपना मालिक नहीं मान रही होती, बल्कि वह उस दांपत्य संबंध को एक आध्यात्मिक ऊँचाई प्रदान कर रही होती है। वह उस रिश्ते को शरीर और भौतिकता की सीमाओं से निकालकर आत्मा के अनंत आकाश में स्थापित कर रही होती है।

प्रेम… प्रेम आखिर है क्या?
क्या प्रेम केवल कैंडल लाइट डिनर, महंगे उपहार, या सोशल मीडिया पर लिखे गए लंबे-चौड़े स्टेटस का नाम है? प्रेम केवल दिखावे या प्रदर्शन की वस्तु नहीं है। प्रेम तो आचरण है, मौन तपस्या है, और निस्वार्थ समर्पण का दूसरा नाम है। प्रेम वह है जो बिना कुछ कहे, बिना कोई शिकायत किए, दूसरे के जीवन की हर बाधा को अपने ऊपर लेने का साहस रखता है। और आज मैंने उस निश्छल, तपस्वी प्रेम को साक्षात अपनी आँखों से उस वट वृक्ष के नीचे देखा है।

उसी मौन और अटूट प्रेम के स्पंदन को, उस दृश्य की पवित्रता को मैंने अपनी इन पंक्तियों में पिरोने का एक छोटा सा प्रयास किया है:

“जन्म-जन्म का साथ हो,
हाथों में तेरा हाथ हो,
तपते सूरज की परवाह नहीं,
बस तेरा ही विश्वास हो,
वट वृक्ष की छाँव तले,
बाँधूँ जो मैं कच्चा सूत,
प्राणों से भी प्रिय मुझे,
मेरे माथे का ये सिंदूर है,
सावित्री सी ढाल बनूँ,
हर विपदा से मैं अड़ जाऊँ,
तुझमें ही मेरा ईश्वर है,
तुझ पर ही सर्वस्व लुटाऊँ।”

अगर हम वट सावित्री के इस पावन पर्व और इसके पीछे के अनुष्ठानों को गहराई से, एक विश्लेषक की दृष्टि से देखें, तो हमें समझ में आएगा कि ये केवल सदियों से चली आ रही रूढ़िवादी विधियाँ नहीं हैं। ये दांपत्य के प्रेम, सुरक्षा और एक-दूसरे के प्रति अटूट प्रतिबद्धता को सहेजने के अत्यंत सुंदर और वैज्ञानिक प्रतीक हैं।

सबसे पहले बात करते हैं उस ‘वट वृक्ष’ यानी बरगद के पेड़ की। हमारी प्रकृति में असंख्य वृक्ष हैं, फिर वट वृक्ष ही क्यों? वट वृक्ष अपनी विशालता, अपनी गहन छाया और अपनी असाधारण दीर्घायु के लिए जाना जाता है। यह उन गिने-चुने वृक्षों में से है जो कभी मरता नहीं है। इसकी शाखाओं से जो जटाएँ (बरोह) निकलकर ज़मीन को छूती हैं, वे फिर से एक नए तने का रूप ले लेती हैं। यह निरंतरता, यह अमरत्व और यह विशालता भारतीय दांपत्य का आदर्श है। एक स्त्री जब उस वट वृक्ष की पूजा करती है, तो वह वास्तव में प्रकृति से यह प्रार्थना कर रही होती है कि उसका सुहाग, उसका परिवार और उसका वंश भी इसी वट वृक्ष की तरह विशाल, अटल और दीर्घायु हो।

और वह सूत? उस विशाल, मजबूत तने के चारों ओर जब एक नाज़ुक सी स्त्री अपने कोमल हाथों से ‘कच्चा सूत’ (कच्चा धागा) लपेटती है, तो वह दृश्य अपने आप में एक महाकाव्य है। धागा कच्चा है, ज़रा सा ज़ोर लगाने पर टूट सकता है। रिश्ते भी तो ऐसे ही होते हैं—अत्यंत नाज़ुक, अत्यंत संवेदनशील। लेकिन जब वह कच्चा धागा उस स्त्री की श्रद्धा, उसके विश्वास और उसके प्रेम के रस में भीग कर उस वट वृक्ष के चारों ओर सात बार लपेटा जाता है, तो वह लोहे की ज़ंजीर से भी अधिक मजबूत हो जाता है। वह कच्चा सूत उस अटूट विश्वास का प्रतीक है जो दिखने में कमज़ोर लग सकता है, लेकिन उसमें दो अजनबियों को, दो परिवारों को, और दो जन्मों को जीवन भर एक साथ बाँधे रखने की असीम और रहस्यमयी शक्ति होती है। धागे का हर एक फेरा, सात जन्मों के साथ का एक खामोश वादा है।

वहाँ बैठी महिलाएँ अपने हाथों में बाँस का पंखा लिए हुए थीं। उस पंखे से वे केवल ग्रीष्म ऋतु की उस बाहरी तपन को नहीं बुझा रही थीं। बाँस के पंखे से हवा करना एक अत्यंत कोमल और प्रतीकात्मक चेष्टा है। यह इस बात का प्रतीक है कि जीवन की कठिन से कठिन परिस्थितियों में, जब दुनिया के थपेड़े पति को झुलसाने का प्रयास करेंगे, जब संघर्षों की लू उसके चेहरे को मुरझाने लगेगी, तब वह स्त्री उस शीतलता, उस सुकून और सांत्वना का पंखा बनकर उसके साथ खड़ी रहेगी। वह अपने प्रेम की छाँव से उसके जीवन के हर संताप, हर दुःख और हर शारीरिक-मानसिक ताप को दूर कर देगी।

इस पूरे पर्व की आत्मा में बसी है देवी सावित्री और सत्यवान की कालजयी कथा। यह कथा केवल एक पौराणिक आख्यान नहीं है; यह भारतीय स्त्री की मेधा, उसके साहस और उसके अजेय प्रेम का सबसे बड़ा प्रमाण है। सावित्री कोई साधारण स्त्री नहीं थी। वह एक प्रतापी राजा की अत्यंत विदुषी और तेजस्वी पुत्री थी। जब उसने अपने लिए सत्यवान को चुना, तो महर्षि नारद ने चेतावनी दी थी कि सत्यवान की आयु केवल एक वर्ष शेष है। आधुनिक दृष्टिकोण से देखें तो कोई भी समझदार व्यक्ति, और विशेषकर कोई भी माता-पिता, ऐसे विवाह के लिए कभी सहमत नहीं होंगे जहाँ वैद्यव्य निश्चित हो। लेकिन सावित्री ने अपने प्रेम और अपने निर्णय पर अटल रहते हुए कहा कि कन्यादान एक ही बार होता है और मैंने मन से सत्यवान को अपना पति मान लिया है।

यह है प्रेम का वह स्वरूप जो मृत्यु के भय से भी नहीं घबराता। जब सत्यवान के प्राण पखेरू उड़ गए और स्वयं मृत्यु के देवता यमराज उसके प्राण लेकर जाने लगे, तो सावित्री रोती-बिलखती हुई कमज़ोर स्त्री की तरह ज़मीन पर नहीं गिर पड़ी। वह यमराज के पीछे-पीछे चल पड़ी। एक स्त्री का वह भयानक, अंधकारमय अरण्य (जंगल) में यमराज के पीछे जाना, उसके अदम्य साहस को दर्शाता है।

यमराज और सावित्री के बीच जो संवाद हुआ, वह भारतीय दर्शन का एक उत्कृष्ट हिस्सा है। सावित्री ने यमराज से धर्म, कर्म, मित्रता और गृहस्थ आश्रम के महत्व पर ऐसा तार्किक और दार्शनिक शास्त्रार्थ किया कि स्वयं मृत्यु के देवता को भी उस मानवीय बुद्धि और सतीत्व के तेज़ के आगे झुकना पड़ा। सावित्री ने अपने अटल निश्चय, अपनी तार्किक बुद्धिमत्ता और अपने अथाह प्रेम के बल पर यमराज से न केवल अपने पति के प्राण वापस लिए, बल्कि अपने अंधे सास-ससुर की आँखें, उनका खोया हुआ राज्य और अपने पिता के लिए सौ पुत्रों का वरदान भी प्राप्त कर लिया।

ठीक उसी प्रकार, आज के इस कठिन और संघर्षपूर्ण दौर में, हर भारतीय स्त्री अपने भीतर एक सावित्री को धारण किए हुए है। वह आज भी अपनी निष्ठा, अपनी मौन तपस्या और अपने अगाध प्रेम से अपने परिवार और अपने पति के चारों ओर एक ऐसा अजेय सुरक्षा चक्र खींचती है जिसे दुनिया की कोई बुरी नज़र, कोई विपत्ति भेद नहीं सकती। जब वह सुबह उठकर घर का कामकाज सँभालती है, जब वह अपने पति के माथे पर तिलक लगाती है, जब वह इस भीषण गर्मी में निर्जला व्रत रखती है—तो वह कोई रूढ़ि नहीं निभा रही होती, वह मृत्यु और विपत्तियों से लड़ रही होती है। वह अपने प्रेम के कवच से अपने घर को सुरक्षित कर रही होती है।

विडंबना यह है कि आज की पीढ़ी इस मौन तपस्या को समझ नहीं पाती। हम उस संस्कृति में ढलते जा रहे हैं जहाँ प्रेम को हर पल प्रमाणित करना पड़ता है। ‘आई लव यू’ कहे बिना, महंगे गुलदस्ते दिए बिना प्रेम की अभिव्यक्ति अधूरी मानी जाती है। लेकिन भारतीय दांपत्य में प्रेम बोला नहीं जाता, प्रेम ‘जीया’ जाता है। यहाँ प्रेम शब्दों का मोहताज नहीं है। यहाँ प्रेम की भाषा वह आधी खाई हुई रोटी है जो पत्नी अपने पति के लिए बचा कर रखती है। यहाँ प्रेम की भाषा वह चिंता है जब पति के घर लौटने में ज़रा सी देर हो जाती है। यहाँ प्रेम की भाषा यह वट सावित्री का व्रत है, जहाँ एक स्त्री अपने शरीर को कष्ट देकर अपने प्रियतम के लिए अदृश्य ईश्वरीय शक्तियों से सौदा कर रही होती है।

अंततः, यह सब देखकर मेरा मन इस सत्य पर आकर ठहर गया कि यह तपस्या किसी भय, किसी मजबूरी या समाज के दबाव का परिणाम कतई नहीं है। यह उस सनातन प्रेम का उद्घोष है जो आधुनिकता के शोर और सोशल मीडिया के छिछले दिखावे से बहुत दूर, इस देश की मिट्टी में, हमारी जड़ों में गहराई तक बसा हुआ है। यह वह प्रेम है जिसे किसी सर्टिफिकेट या किसी विदेशी वैचारिक मुहर की आवश्यकता नहीं है।

लोग कहते रहें कि दांपत्य में शोषण है, लेकिन जिन्होंने उस वट वृक्ष के नीचे उन स्त्रियों की आँखों में तैरते समर्पण और प्रार्थना के उन निश्छल भावों को पढ़ा है, वे जानते हैं कि सत्य क्या है। प्रेम बताया नहीं जाता, प्रेम किया जाता है, प्रेम में तपा जाता है। और आज उन सुहागिनों ने जेठ की उस तपती दोपहरी में, बिना एक भी शब्द कहे, अपने आचरण और अपनी तपस्या से प्रेम की सबसे सुंदर, सबसे पवित्र और सबसे पूर्ण परिभाषा लिख दी। यह दृश्य मेरे ज़ेहन में हमेशा के लिए एक अमिट चित्र की तरह छप गया है—

“मर्यादा के आवरण में धड़कता हुआ एक असीम, अनंत और अमर प्रेम।”

~ Shanky

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अँधेरों में लिखी रोशनी…..!!!!

Midnight Thoughts

हर किसी को ज़िंदगी से, मुकम्मल जहान चाहिए,

उम्मीदों का भारी बोझ है, और पूरा आसमान चाहिए।

ज़रा कदम जो लड़खड़ाए, तो फ़ौरन ग़लत ठहरा दिया,

मुँह पर किसी ने कुछ न कहा, पर रूह ने सब सुन लिया।

जब बात मेरी चाह की आई, तो सारे होंठ सिल गए,

बस सब्र की एक पोटली, वो मेरे हाथों में थमा गए।

अब इस कदर बे-फ़िक्र हूँ, इन गर्दिश-ए-हालात से,

क्या सुख है और क्या दुख है, मैं गुज़र चुका जज़्बात से।

बंद कमरे के अँधेरों में, इन चार दीवारों के बीच,

मोबाइल की इस स्क्रीन पर, मैं चुपचाप कुछ लिखता हूँ।

ना अब किसी से आस है, ना कोई शिकायत है मुझे,

जो मिल गया कमाल मिला, जो मिलेगा बे-मिसाल है।

अब तो महज़ एक ‘दृष्टा’ बन, इस किनारे बैठना है,

कौन कितने रंग बदलता है, यही अंतिम वक्त में देखना है।

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मैं, मौत और मोहब्बत

मैं, मौत और मोहब्बत

Midnight Thoughts

रात के तीन बज रहे हैं और इस घुटन भरे सन्नाटे में एक अजीब सा सच चीख-चीख कर दीवारों से टकरा रहा है। हम सब कितने खोखले हो चुके हैं ना? एक तरफ हम अकेलेपन से मर रहे हैं, रात-रात भर करवटें बदलते हैं कि कोई तो हो जो हमें समझे, कोई तो हो जिसके सीने पर सर रखकर इस दुनिया की सारी जंग भूल जाएं। और दूसरी तरफ, हम इतने मगरूर हैं कि अपनी शर्तों के बिना एक कदम भी आगे नहीं बढ़ाना चाहते। हम चाहते हैं कि प्यार भी मिले, साथ भी मिले, लेकिन हमारे ‘अहंकार’ पर कोई आंच ना आए।

ये कितनी बड़ी हिपोक्रेसी है। अगर तुम्हें सिर्फ अपने ही मन की करनी है, अगर तुम्हें लगता है कि तुम हमेशा सही हो और तुम्हारे बनाए हुए उसूल ही पत्थर की लकीर हैं, तो भाई, अकेले रहना सीख लो। सच कह रहा हूँ, अकेलापन सबसे बेहतरीन, सबसे वफ़ादार साथी है। इस अकेलेपन में कम से कम किसी को तुम्हारे ‘मैं’ से चोट तो नहीं लगेगी। तुम्हारी चार दीवारें कभी तुमसे बहस नहीं करेंगी। लेकिन अगर तुमने किसी के साथ चलने का फैसला किया है, अगर तुम्हारे अंदर किसी के साथ रहने की इच्छा ने जन्म लिया है, तो याद रखना… वहाँ ‘समर्पण’ के अलावा और कोई दूसरा रास्ता है ही नहीं। कोई शॉर्टकट नहीं है।

रिश्ते आजकल चल क्यों नहीं रहे हैं? क्योंकि हमने रिश्तों को एक कॉरपोरेट डील बना दिया है। “तुम मेरे लिए ये करो, तो मैं तुम्हारे लिए वो करूँगा।” “मेरी बात मानोगे तो रिश्ता चलेगा।” जहाँ ‘मेरे मन का’ होने की जिद आ गई, वहाँ रिश्ता उसी पल अपनी मौत का इंतज़ार करने लगता है। रिश्ते में मन हमेशा सामने वाले का रखा जाता है। ये कोई हार नहीं है, ये वो आज़ादी है जिसे आज की इस ‘Self-Obsessed’ जनरेशन ने गुलामी का नाम दे दिया है। हम इतने डरे हुए हैं अपना अस्तित्व खोने से, कि हम कुछ भी दांव पर लगाने को तैयार नहीं हैं। और जो दांव पर कुछ लगा नहीं सकता, वो इश्क या रिश्ते के जुए में क्या खाक जीतेगा?

ये जो तुम खुद को बचा कर, मोहब्बत करना चाहते हो,
किनारे पर खड़े रहकर, समंदर में उतरना चाहते हो।
तुम्हें लगता है कि शर्तों पर चलेंगे ये वफ़ा के सिलसिले,
बिना मिटे ही तुम, मुकम्मल निखरना चाहते हो。
मगर सुन लो… ये जो तुम्हारे अंदर का शोर है,
ये जो ‘मैं’ और ‘मेरा’ का बँधा हुआ कठोर ज़ोर है,
इसे तोड़ोगे नहीं तो हर रिश्ता एक दिन टूट जाएगा,
जो आज तुम्हारा अपना है, कल वो भी रूठ जाएगा।

रिश्ते तो वो दरिया हैं, जो सामने वाले के रुख से बहते हैं,
ये वो मीठे ज़हर हैं, जो आशिक़ मुस्कुरा कर सहते हैं।
ज़रा देखो उस शिष्य को, जो गुरु के द्वारे पर खड़ा है,
वो जो अपने घर का राजा था, आज चरणों में पड़ा है。
वो अपना ‘मैं’, अपना ज्ञान, अपना वजूद सब भुलाता है,
एक खाली बर्तन की तरह, खुद को गुरु के सम्मुख लाता है。
तभी तो एक गुरु भी, अपना पूरा ब्रह्मांड उस पर लुटाता है,
ज्ञान की वो बहती गंगा, उस खाली बर्तन में समाता है。
पर सोचो… अगर शिष्य कहे “मैं भी ज्ञानी”, और गुरु भी अपनी अकड़ में रहे,
तो क्या कभी कोई इल्म बहेगा? क्या कोई किसी के दिल में रहे?
जहाँ दोनों अपनी-अपनी मैं की तलवारें निकाल लें,
वहाँ कल्याण नहीं होता, बस खोखले अहंकार उबाल लें।

यही हाल तो आज हर घर की चार दीवारों का है,
पति और पत्नी के बीच खिंची हुई उन अदृश्य दरारों का है。
जहाँ कभी दो रूहें एक होने की कसमें खाती थीं,
आज वहाँ बस “मेरी बात क्यों नहीं मानी” की आवाजें आती हैं。
अगर पति ये ठान ले, कि वो पत्नी के रंग में रंग जाएगा,
और पत्नी ये मान ले, कि वो पति के सांचे में ढल जाएगा。
जहाँ दोनों एक दूसरे की खुशी में, अपनी हार मान लें,
तभी तो वो घर एक मंदिर है, तभी तो रिश्ते जान लें。
वरना ये जो रोज की तकरार है, ये जो खामोश सी चीखें हैं,
ये और कुछ नहीं, बस दो ज़िद्दी इंसानों की दी गई भीखें हैं。
एक ही बिस्तर पर दो अजनबी, पीठ फेर कर सोते हैं,
और फिर दुनिया से कहते हैं, कि वो अकेलेपन में रोते हैं।

कभी देखा है उस हवन को, उस धधकती हुई आग को?
कभी महसूस किया है उस लकड़ी के जलते हुए त्याग को?
अगर वो लकड़ी ये कह दे कि “मैं अपना वजूद नहीं खोऊँगी,
तुम मुझे जलाओगे, पर मैं राख होकर नहीं सोऊँगी。
आखिर मैं क्यों जलूँ? मेरा इसमें क्या फायदा है?”
तो क्या वो यज्ञ कभी पूरा होगा? क्या यही सृष्टि का कायदा है?
जब तक आहुतियां नहीं गिरतीं, जब तक कुछ भस्म नहीं होता,
तब तक कोई भी अनुष्ठान, कोई भी कर्म पूरा नहीं होता।

वो एक छोटा सा दीपक जो अँधेरे से लड़ जाता है,
तुम्हें क्या लगता है, वो बिना दर्द सहे ही जगमगाता है?
बाती को अपनी रुई का घमंड छोड़ कर, आग में जलना पड़ता है,
और उस जमे हुए घी को भी, तपन सहकर पिघलना पड़ता है。
जब वो दोनों अपना ‘मूल स्वरूप’ खो देते हैं,
तब जाकर वो एक रोशनी के रूप में, खुद को बो देते हैं।

तो फिर तुम क्यों अपनी हस्ती को, इतने गुरूर से पकड़े हो?
क्यों इन झूठी हदों में, इन दिखावटी दायरों में जकड़े हो?
दिखावे के ये जो फूल तुमने अपने आस-पास सजा रखे हैं,
रंग तो बहुत हैं इनमें, पर तुमने इनकी खुशबू ही जला रखे हैं।

ये सब लिखते हुए मुझे कोई खुशी नहीं हो रही है, बल्कि एक अजीब सी पीड़ा हो रही है क्योंकि मैं रोज लोगों को इसी अहंकार की वजह से तिल-तिल कर मरते देख रहा हूँ। डिप्रेशन आज एक महामारी क्यों बन गया है? क्योंकि इंसान ने खुद को एक ऐसे खोल में बंद कर लिया है जहाँ से वो बाहर आना ही नहीं चाहता। हम कहते हैं “मुझे स्पेस चाहिए”, “मुझे मेरी इंडिविजुअलिटी प्यारी है”। अरे भाई, जब तुम्हारी इंडिविजुअलिटी इतनी ही प्यारी है, तो फिर रात को ये खालीपन तुम्हें क्यों काटता है?

हम इस जिंदगी में हर चीज़ को अपनी मुट्ठी में कसकर पकड़ लेना चाहते हैं। अपने उसूल, अपनी पसंद, अपनी नफरत, अपना अतीत, अपना वजूद। पर प्रकृति का नियम बहुत सीधा है। अगर तुमने अपने दोनों हाथों से अपने ही वजूद को इतनी कसकर पकड़ रखा है कि तुम्हारी उँगलियों से खून रिसने लगा है… तो तुम किसी और का हाथ कैसे थामोगे? नए रिश्ते, नई जिंदगी, नया प्यार… ये सब खाली हाथों में आता है। जब तक तुम उस पुरानी ‘मैं’ को छोड़ोगे नहीं, कुछ भी नया तुम तक पहुँच ही नहीं सकता।

समर्पण कोई हार नहीं है। समर्पण का मतलब ये नहीं कि तुम कमजोर हो या बेवकूफ हो। समर्पण का मतलब है कि तुमने ये जान लिया है कि इस रिश्ते की कीमत तुम्हारे अपने अहंकार से कहीं ज्यादा बड़ी है। जब दो लोग एक दूसरे के सामने पूरी तरह निहत्थे खड़े होते हैं, बिना किसी ढाल के, बिना किसी शर्त के… असली सुरक्षा वहीं जन्म लेती है। वरना ये जो बाकी चल रहा है दुनिया में… ये प्यार नहीं है, ये बस अपनी-अपनी जरूरतों का एक सस्ता सा सौदा है, जो किसी भी दिन खतम हो सकता है।

मुट्ठी में कैद हवाओं से, कभी तूफ़ान नहीं बनते,
जो खुद को खोने से डरें, वो किसी की जान नहीं बनते,
जब तक तुम अपने ही अस्तित्व की लाश को ढोते रहोगे…
तुम्हारे हिस्से में सिर्फ सन्नाटा आएगा,
और तुम ताउम्र बस रोते रहोगे।

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दिल और दिमाग….!!!!!

दिल और दिमाग की जंग

✦ ✧ ✦

रात की इस खामोशी में एक अजीब सी जंग है,
दिल को आज भी तेरा वो साथ पसंद है।
कहता है, “बुला ले उसे, शायद कुछ बदल गया हो,”
दिमाग हंस कर कहता है, “सच्चाई पे अब भी तु परदा डालता है?”

ये दिल आज भी तेरे साथ जज़्बातों में बहना चाहता है,
पर ये दिमाग अब इस अकेलेपन में ही रहना चाहता है।

इश्क़ तो आज भी है, पर अब उन टकरावों से डर लगता है,
कोई फिर से भावनाओं से ना खेल जाए, इस घाव से डर लगता है।

इसलिए दिल की ज़िद को रोज़ मार कर, मैंने दिमाग की बात मान ली है,


“तेरे साथ की उस उलझन से बेहतर,
मैंने अपनी तन्हाई अपना ली है।”

✦ ✧ ✦

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शून्य में समर्पण

☾ ✨ ☽

शून्यता और वैराग्य

बरसों बाद आज छत पर पानी की टंकी की ओट में अकेला बैठा रहा। न हाथ में मोबाइल था, न कोई कागज़-कलम, बस एक असीम एकांत था। दोपहर ढलकर कब शाम में बदल गई और शाम कब रात के गहरे सन्नाटे में विलीन हो गई, मुझे कुछ भान ही नहीं रहा। बिना हिले-डुले मैं बस उस टंकी का सहारा लिए बैठा रहा। क्या सुकून था, क्या दर्द था, क्या ग़म थे और क्या खुशियाँ थीं, कुछ पता नहीं था। बस एक ठहराव था। मन एक अजीब सी शून्यता में था, न उसमें कोई बेचैनी थी और न ही वह पूरी तरह से शांत था। सब कुछ जैसे थम सा गया था। फिर जैसे ही रात के आगोश में चाँद उभरा, मेरी वही पुरानी आदत लौट आई, उससे बातें करने की। शायद इस पूरी कायनात में एक वह चाँद ही तो है, जो बिना कुछ कहे सब सुन लेता है और बदले में अपनी शीतल चाँदनी से रूह को सुकून देकर चला जाता है।

मैं नहीं चाहता था कि कोई आए अब तुम्हारे सिवा,
इस भागती ज़िंदगी में बस एक ठहराव चाहता था।
ख्वाहिश थी कि तुम आओ मेरे हिस्से में मुकम्मल होकर,
पर शायद ज़िंदगी को कुछ और ही मंजूर था।
तेरे होने का एहसास तो हर पल मेरे साथ रहा,
पर हक़ीक़त यह थी कि तुम कभी हमारे थे ही नहीं,
और हम, नादानी में पूरी तरह तुम्हारे हो बैठे थे।
खैर… अब तो ये बाकी की ज़िंदगी,
तुम्हारी इन्हीं यादों के सहारे ही गुज़र जाएगी।

इस ज़िंदगी ने आज एक और कड़वा सच बड़ी गहराई से समझा दिया। अगर किसी के साथ जीवन बिताना है, तो केवल अच्छी नीयत और साफ़ स्वभाव होना ही काफ़ी नहीं है। जेब में अच्छे पैसा, अच्छी सेहत, सुंदर रूप-रंग और हर पैमाने पर खरा उतरना बहुत ज़रूरी है। जैसे थाली में हर व्यंजन का होना आवश्यक है, वैसे ही स्वाभिमान के साथ किसी रिश्ते में जीने के लिए ये तमाम सांसारिक चीज़ें ज़रूरी हैं। अन्यथा घुट-घुट कर जीना ही नियति बन जाती है। हम चाहे जितना भी निस्वार्थ होने का ढोंग कर लें, सच तो यह है कि हर रिश्ता किसी न किसी समझौते की लकीर पर ही टिका होता है। निस्वार्थ कुछ नहीं होता, और अगर हो भी, तो मन में इस ‘निस्वार्थ भाव’ का अहंकार जन्म ले लेता है और हम उसका राग अलापते हुए अपना असली स्वार्थ दिखा ही देते हैं。

मैंने रिश्ते निभाने की बहुत कोशिश की, पर मुझसे कुछ नहीं हो पाया। सब कुछ दरकता गया, फिर भी मैं अपनी कोशिशों में लगा रहा। जिसे अपना माना था, उसके मन को मैं कभी समझ ही नहीं पाया। शायद अपनेपन की चाह में मैंने ज़बरदस्ती अपनी बातें उन पर थोप दीं, उनके मन में एक अनजाना सा डर पैदा कर दिया। मेरी उन हरकतों से उनका मन घबरा गया और अंततः मैं इस रिश्ते को सहेजने में नाकामयाब रहा। सच ही है, नीयत चाहे कितनी भी साफ़ क्यों न हो, अगर सामने वाले का मन आपको स्वीकारने के लिए तैयार नहीं है, तो उसे अमृत भी पिला दो, वह ज़हर का ही काम करेगा। और इसके विपरीत, नीयत खराब भी हो और मुँह पर दस गालियाँ भी क्यों न दे दी जाएं, अगर सामने वाले का मन अच्छा है, तो उसे उसमें भी प्रेम ही नज़र आएगा। रिश्तों में सबकुछ नीयत, स्वभाव और सामने वाले की मनःस्थिति पर ही निर्भर करता है।

अथाह और अनंत प्रेम भी क्यों न कर लूँ,
अपना सर्वस्व ही क्यों न उन पर वार दूँ।
जिसे जाना होता है, वो मुँह मोड़ ही लेता है,
और जिसे रुकना हो, बिना कद्र के भी आखिरी साँस तक साथ निभाता है。

मैं कभी किसी के जीवन का महज़ ‘विकल्प’ नहीं बनना चाहता था,
हृदय में जो कुछ भी था, सब उस रिश्ते को सींचने में समर्पित कर दिया।
मैंने गणित के ‘एक और एक दो’ या ‘ग्यारह’ कभी नहीं पढ़े,
मेरी दुनिया में तो ‘एक और एक मिलकर हमेशा एक’ ही होते हैं。

टूटे हुए बिजली के तारों को ज़रा सा जोड़ो, तो वो फिर से जगमगा उठते हैं,
पर रिश्तों में… दो कड़वी बातें उस टूटे हुए दिल को हमेशा के लिए तार-तार कर जाती हैं।

॥ मेरी अंतिम यात्रा ॥

“सारे रिश्ते हैं झूठे, साँस रुकते ही टूटे।”

इसीलिए, अब हक़ीक़त से सामना कर लेना ही उचित है। इन झूठे रिश्तों और बेबुनियाद बातों में खुद को उलझाकर अपने ही अस्तित्व के साथ खिलवाड़ करने से बेहतर है कि यह मान लिया जाए—

“जो भी हूँ, जैसा भी हूँ, बस अपने नाथ जी का हूँ।”

अब चाहे बोलते-बोलते ज़ुबान लड़खड़ा जाए, किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना है। पीड़ा से रक्त की धार ही क्यों न बह निकले, किसी से कुछ नहीं कहना है। आँखों से आँसू छलक भी जाएँ, तो किसी को उन्हें पोंछने का अधिकार नहीं देना है। हृदय की धड़कनें चाहे कितनी ही तेज़ क्यों न हो जाएँ, अब उन्हें बेलगाम ही छोड़ देना है। अब तो बस चुपचाप बैठकर एक ‘दृष्टा’ (दर्शक) बनकर सब कुछ देखना है। इस ‘कुछ नहीं’ के शून्याकाश में ही ‘सब कुछ’ को घटित होने देना है। अब सवालों के जवाब नहीं ढूँढ़ने हैं, बल्कि स्वयं ही एक अनंत सवाल बन जाना है।

“जब मोह के धागे टूटते हैं, तभी वैराग्य का जन्म होता है
जो ‘कुछ नहीं’ में जीना सीख गया, उसके पास खोने के लिए शेष ही क्या बचता है।”

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प्रेम में..

Pure Love

“
प्रेम में एक पुरुष के मानस को पिता

और स्त्री के मन को माँ बनना पड़ता है…
बनना पड़ता है धूप में सघन छाया सा
और जगत के निष्ठुर ठंडे वातावरण में नर्म धूप सा..

जब कोई एक थक जाए.. दुनिया में समझदार बनते बनते..

तो रात में छोटे बच्चे के माथे की थपकी सा
भी बनना पड़ता है प्रेम में..

”

और यहाँ बात स्त्री पुरुष संबंधों की नहीं हो रही..

बात हो रही है..

शुद्ध प्रेम की..
— shreyasi —
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तुम्हारी परिणीता थी….!!!!

Parineeta

मैं तुम्हारी परिणीता थी

❧ ❦ ☙

“
मैं तुम्हारी परिणीता थी—

विवाहाग्नि की साक्षी,

सप्तपदी की शपथों में अभिषिक्त,

तुम्हारे अस्तित्व की अर्धांगिनी।
“

मांग में सिन्दूर था,

कलाई में चूड़ियों का निनाद,

और हृदय में वह अदृश्य विश्वास—

कि तुम्हारे नाम से ही

मेरा समूचा संसार प्रतिष्ठित होगा।

परन्तु नियति ने

किसी निर्मम व्यंग्य की भाँति

मेरे सुहाग को बाज़ार की देहरी पर पटक दिया।

जिस देह को तुम्हारी गरिमा का आवरण होना था,

वही देह लोलुप दृष्टियों की मुद्रा बन गई।

जिस आत्मा को गृहस्थी के मंदिर में प्रतिष्ठित होना था,

वही आत्मा व्यभिचारी इच्छाओं की नीलामी में

निर्लज्ज भीड़ के समक्ष खड़ी कर दी गई।

मैं अर्धांगिनी बनना चाहती थी—

तुम्हारे कुल की मर्यादा,

तुम्हारी वंश-दीपिका,

तुम्हारे स्वप्नों की शांत सहचरी।

किन्तु तुम्हारी कायर निस्तब्धता ने

मेरे सुहाग को

अपमान के कोलाहल में विसर्जित कर दिया।

अब लोग मुझे

निष्ठुर शब्दों में पुकारते हैं—

“वेश्या”

पर वे नहीं जानते,

कि इस कलंक के भीतर भी

एक परिणीता की चिता अब भी धधकती है।

मैं वही स्त्री हूँ जिसे तुमने

मंगलसूत्र की पवित्रता में बाँधा था।

बस अंतर इतना है—

तुम्हारी अर्धांगिनी बनने की आकांक्षा में

मैं संसार की वेश्या घोषित कर दी गई।

और आज भी

मेरे अंतर्मन की राख में

एक दग्ध प्रश्न सुलगता है—

क्या सचमुच
मैं कभी
तुम्हारी परिणीता थी?

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चला चल राही….!!!!

Must Read Book

चला चल राही

लेखक: विजय वर्मा

Chalaa Chal Raahi

क्या आपने कभी सोचा है कि एक बैंक अधिकारी की कलम जब समाज के अनुभवों को पिरोती है, तो कैसी दास्तान बनती है?

“चला चल राही” सिर्फ एक किताब नहीं, बल्कि विजय वर्मा जी के जीवन भर के अनुभवों का निचोड़ है। इसमें राजस्थान की गलियों की महक है, बनारस के घाटों का सुकून है, और कोरोना काल की वो सच्ची कहानियाँ हैं जिन्हें हम कभी भूल नहीं पाएंगे।

“यह किताब आपको जीना सिखाएगी!”

चाहे आप एक छात्र हों, प्रोफेशनल हों या घर पर रहने वाले, यह किताब हर उस इंसान के लिए है जो संघर्षों के बीच मुस्कुराना चाहता है। यह उन अनकहे रिश्तों की कहानी है जो हमें इंसान बनाए रखते हैं।

आज ही अपनी कॉपी ऑर्डर करें!

(स्टॉक खत्म होने से पहले अपना आर्डर बुक करें)

लेखक के बारे में

विजय वर्मा जी ने अपने जीवन के 32 साल बैंकिंग क्षेत्र में देश की सेवा में बिताए। सेवानिवृत्ति के बाद, उन्होंने अपनी दूसरी पारी समाज के नाम समर्पित कर दी है। उनकी लेखनी में वो सादगी और गहराई है जो आज के दौर में कम ही देखने को मिलती है। उनके विचार न केवल ज्ञान बढ़ाते हैं, बल्कि जीवन की उलझनों को सुलझाने का रास्ता भी दिखाते हैं।

आइए, हम सब मिलकर एक सच्चे लेखक की इस मेहनत का सम्मान करें और इस सफर के साथी बनें।

“चला चल राही…”

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भरोसाा…..!!!!!

❦

भरोसा..

Poem Image - Bharosa

(Shreyasi)

वह शब्द..
जो विचलित करता है अब मुझे!
जैसे जो चीज कहीं हो ही नहीं, उसको मान लेना कि वो है।

हां! भरोसा मान लेना ही तो है।
जब तुम करते हो किसी पर यकीन,
तो बस करते हो खुद पर यकीन
कि तुम इस पर यकीन कर सकते हो।

एक भ्रम का जाल है, कि लोग अपने हैं।
और जहां पर कोई भी नहीं होता,
वहां मन को भरोसा हो जाता है
कि बहुत लोग हैं जो साथ हैं।

पर जब भ्रम का तिलिस्म टूटता है, तब तुम देखोगे
कि कोई कभी तुम्हारे साथ था ही नहीं!

भरोसा करना शायद खुद को छलने का
या छले जाने की स्वीकृति देने का सबसे सस्ता- सरल उपाय मात्र है।

या भरोसा और छल एक ही नदी के दोनों किनारे से हैं..
तुम किस पार लगा दिए जाओगे
इसकी पतवार होगी उसके हाथों में, जिस पर तुम समझोगे तुम्हें भरोसा है

किंतु समंदर सी अनिश्चितताओं, भय और शंकाओं के बीच भी देखना तुम
पा लोगे सीपी के मोती की तरह कुछ विरले लोग।

जिन पर तुम्हारा भरोसा अनंत काल तक रह जाएगा
अक्षत.. रक्षित.. अटूट.. और संपूर्ण!

और तुम्हारे जीवन की ये ही सार्थक जमा पूंजी होगी!


– shreyasi (श्रेयसी)

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प्रतिज्ञान

समकालीन हिंदी साहित्य की एक नई धड़कन

मेरी नई रचना ‘अंतिम अभिलाषा’ के साथ

प्रतिज्ञान मैगज़ीन कवर

साहित्य केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि समाज का आईना और मानवीय संवेदनाओं की गूँज है। इसी सोच को धरातल पर उतारने का काम कर रहा है ‘प्रतिज्ञान प्रकाशन’। यह एक ऐसा मंच है जिसका उद्देश्य उभरते हुए हिंदी रचनाकारों को न केवल एक मंच प्रदान करना है, बल्कि उन्हें एक नई पहचान और सम्मान दिलाना भी है।

प्रतिज्ञान सिर्फ एक पत्रिका नहीं, बल्कि वर्तमान हिंदी साहित्य की नई धड़कन है। यहाँ आपको कहानियों, कविताओं, शायरी और गंभीर लेखों का एक बेहतरीन संग्रह मिलता है। इस मुहीम की सबसे खूबसूरत बात यह है कि यहाँ स्थापित लेखकों के साथ-साथ नए और मौलिक लिखने वालों को भी अपनी बात रखने का समान अवसर मिलता है।

प्रतिज्ञान की वेबसाइट, मासिक पत्रिका और किताबें निरंतर हिंदी साहित्य जगत में नई ऊर्जा भर रही हैं। इसके पहले तीन अंक ई-बुक के रूप में अमेज़न पर पहले ही धूम मचा चुके हैं, और अब यह कारवाँ आगे बढ़ चुका है।

मुझे यह साझा करते हुए अपार हर्ष हो रहा है कि प्रतिज्ञान के नवीनतम अंक (अंक 6 – प्रेम विशेषांक) में मेरी स्वरचित कविता ‘अंतिम अभिलाषा’ प्रकाशित हुई है।

यह अंक प्रेम के उन पहलुओं पर बात करता है जो अक्सर अनकहे रह जाते हैं। मेरी कविता ‘अंतिम अभिलाषा’ भी प्रेम की उसी गहराई, समर्पण और शांति की एक अभिव्यक्ति है। इस अंक का हिस्सा बनना मेरे लिए एक लेखक के तौर पर बहुत गौरव की बात है।

हमें आपके सहयोग की आवश्यकता है!

हिंदी साहित्य के इस सफर में हम सभी लेखकों को आपके साथ और प्रोत्साहन की जरूरत है। यदि आप साहित्य प्रेमी हैं और प्रेम के अनछुए आयामों को महसूस करना चाहते हैं, तो इस अंक को जरूर पढ़ें।

आपकी प्रतिक्रिया और सुझाव हमारे लिए अनमोल हैं। कृपया इसे पढ़ें, अपना समर्थन दें और साझा करें ताकि हिंदी साहित्य की यह मशाल जलती रहे।
धन्यवाद!

— आशीष कुमार

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प्रेम के मुखौटे के पीछे….!!!!

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गीत चतुर्वेदी साहब कहते हैं —

“माथा चूमना, आत्मा को स्पर्श करना होता है।”

पर समय की धूल में

स्पर्श भी संदिग्ध हो गया है।

अब प्रेम की भाषा में

शब्द कम, मुखौटे अधिक हैं।

कुछ चेहरे

इश्क़ का नाम लेकर आते हैं,

इतनी शिद्दत से बोलते हैं

कि पत्थर भी पिघल जाए,

पर उनके भीतर

वासनाएं पलती रहती हैं।

चॉकलेट की मिठास,

गुलाब की खुशबू,

सस्ते उपहारों में लिपटी

महँगी नीयत

दिल नहीं, जिस्म तक पहुँचने की सीढ़ियाँ होती हैं।

माथा चूमने की आड़ में

इज़्ज़त को लुटने की

धीमी साज़िशें चलती हैं।

वे आँखें नहीं पढ़ते,

वे देह को नोचने के फिराक में रहते हैं।

उनकी आँखों में प्रेम नहीं,

हवस का भूख रहता है

और स्पर्श में समर्पण नहीं,

अधिकार की हिंसा।

प्रेम का सप्ताह कहकर

बाज़ार सजाया जाता है,

पर स्त्रियों के लिए

यह पतन का सप्ताह बन जाता है।

सच तो यह है —

माथा चूमने से पहले

मनुष्य होना ज़रूरी है।

वरना स्पर्श,

स्पर्श नहीं रहता

सदा घाव बन जाता है।

और प्रेम…

प्रेम नहीं,

एक योजनाबद्ध बलात्कार हो जाता है।


महत्वपूर्ण डेटा और शोध: वैलेंटाइन डे का असली चेहरा

१. आर्थिक लूट (Market Trends 2024-25)

  • व्यापार: भारत में गिफ्ट्स और बाजार का टर्नओवर ₹22,000 – 30,000 करोड़ पार।
  • कंडोम बिक्री: वैलेंटाइन वीक में 1000% से 1200% की भारी वृद्धि।
  • iPill (गर्भनिरोधक): 15 फरवरी को बिक्री में 2000% का उछाल।

२. स्वास्थ्य और मानसिक परिणाम

रिपोर्ट / संस्था आंकड़े
इनोसेंटी रिपोर्ट कार्ड 12.5 लाख किशोरियाँ गर्भवती, 5 लाख गर्भपात सालाना (विकसित देश)
यौन रोग (STDs) 50% युवाओं में गोनोरिया, 33% में हर्पीस का खतरा
आत्महत्या (NCRB) लव अफेयर के कारण सुसाइड रेट में 11.8% की बढ़ोतरी

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अंतिम अभिलाषा…..!!!!

Poem Visual

Shanky❤Salty

मेरी अब कोई भी इच्छा शेष नहीं,

स्वप्नों की भीड़ में आकांक्षाओं का देश नहीं।

जीवन ने जो देना था, दे दिया मौन भाव से,

अब माँगने को कुछ भी मेरे पास नहीं।

पर हाँ,

तुम्हारा मेरे साथ होना

अब मेरी अंतिम इच्छा बन चुकी है।

जब शब्द थक जाएँ,

और प्रार्थनाएँ भी मौन ओढ़ लें,

तब तुम्हारा साथ

मेरे अस्तित्व का अंतिम सत्य हो चुका है।

न मुझे भविष्य की चिंता है,

न अतीत की कोई कसक शेष,

यदि इस जीवन की संध्या में

तुम्हारा हाथ मेरे हाथ में हो

तो वही मेरा संपूर्ण मोक्ष है।

मैं ईश्वर से अब कुछ नहीं माँगता,

न आयु, न यश, न संसार की कोई कामना,

बस इतना ही पर्याप्त है

कि अंतिम क्षणों तक

तुम्हारी उपस्थिति मेरी साँसों में बनी रहे।

क्योंकि

मेरी कोई भी इच्छा नहीं रही,

पर तुम्हारा मेरे साथ होना

मेरी अंतिम इच्छा हो चुकी है।

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समर्पण नहीं, साथ….!!!!

Romantic Theme

सुनो जी…

शरीर को प्रेम से अलग करने की बातें

मुझे किताबों की लगती हैं,

ज़िंदगी की नहीं।

अगर सच में

शरीर से प्रेम नहीं होता

तो मैं ईश्वर से हाथ जोड़कर कहूँ

आज ही मुझे अपनी गोद में सुला ले,

क्योंकि ज़िंदा रहकर

यह नौटंकी देखने की हिम्मत नहीं

जो कहते हैं

“मुझे तुम्हारे शरीर से नहीं,

बस आत्मा से प्रेम है।”

—— ❦ ——

पर अफ़सोस…

तुम अपने ही बनाए मापदंडों पर

खरे नहीं उतर पाते।

ज़रा-सी बात ऊँच-नीच हो जाए,

तो एक का हाथ छोड़

दूसरे का थाम लेते हो,

और उसी पल

सब मर्यादा तार-तार कर देते हो।

ज़्यादा बुद्धिजीवी मत बनो।

प्रेम करो तो ऐसे करो

जिसमें शरीर भी शामिल हो,

साँस भी,

काँपते हाथ भी,

और थककर कंधे पर रखा सिर भी।

—— ❦ ——

और अगर

सिर्फ आत्मा को ही प्रेम करना है

तो सीधे परमात्मा का रास्ता पकड़ो,

दो नावों में पैर रखकर

मेरे हृदय को

टुकड़े-टुकड़े मत करो।

मैंने देखा है

प्रेम के नाम पर लंबे भाषण देने वाले लोग,

थोड़ी-सी असुविधा में

सबसे पहले प्रेम को ही त्याग देते हैं।

अपनी ही बातों को

खुद से ही खंडित करते रहते हैं,

और फिर कहते हैं

“हम तो बहुत पवित्र प्रेम करते हैं।”

—— ❦ ——

सुनो, मर्यादा रखो,

पर आत्मा को मारकर नहीं।

याद रखना शरीर शाश्वत नहीं है,

इसलिए जब तक है

उससे जुड़ा प्रेम पूरी ईमानदारी से करो।

और जिस दिन शरीर साथ न दे,

उस दिन भी प्रेम किया जा सकता है

पर प्रेम से भागकर नहीं।

प्रेम कोई बंधन नहीं होता,

प्रेम तो सारे बंधन तोड़ने का नाम है।

जहाँ नियम थोपे जाएँ

वहाँ समझौता होता है, प्रेम नहीं।

प्रेम समर्पण नहीं, साथ है।

हर परिस्थिति का बाप है।

डर से बड़ा,

स्वार्थ से ऊपर।

मैं यह नहीं चाहता

कि तुम मुझे समझो,

बस इतना चाहूँगा—

मुझे गलत मत समझो।

क्योंकि

इस थोड़े-से ग़ुस्से के नीचे

बहुत प्रेम है,

बहुत भलाई है,

और सिर्फ तुम्हारे लिए है…

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Randi

The Dark Truth Exposed

“The world worships goddesses for 9 days, but exploits them for the other 356…”

Randi by Ashish Kumar Book Cover

Randi: The Untold Truth of the Lust Market

By Ashish Kumar


🚨 This dark truth won’t stay free forever!

Society hides behind masks. We claim to respect women, yet the reality on the streets tells a different story. This book peels back the layers of hypocrisy in our society. It challenges the very definition of the words we use to shame women.

“She is not the ‘Randi’. It is the society whose lust is never extinguished.”

Ashish Kumar (Shanky) doesn’t just write. He exposes the naked truth. This is a hard-hitting social commentary that questions why we worship power (Shakti) during festivals but exploit it every other day of the year.


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थकान और साथ…..!!!!!

Divine Embrace

11 · 1 · 11:11:11

आज यूँ नहीं कि बस गले मिलें हम,
आज तो दिल ने दिल को पुकारा।
यह जो काँपते हाथ हैं मेरे कंधों पर,
यह किसी एक जीवन की नहीं,
कई जन्मों की थकान का सहारा है।

रो लेने दो मुझे तुम्हारी छाती में,
ये आँसू कमज़ोरी नहीं हैं,
ये तो उन प्रार्थनाओं का जल हैं
जो हर जन्म अधूरी रह गई थीं।
तुम्हारे सीने से लगकर
मेरी रूह ने पहली बार
खुद को सुरक्षित महसूस किया है।

तसल्ली से चाहिए मुझे साथ तुम्हारा,
क्योंकि यह दिल जल्दी भरने वाला नहीं।
यह तो वह दीप है
जो युगों पहले जला था,
और आज तुम्हारी साँसों से
फिर उजाला माँग रहा है।

तुम्हारी बाँहों का घेरा
कोई साधारण आलिंगन नहीं,
यह तो मंदिर की परिक्रमा जैसा है
जहाँ मैं बार-बार गिरता हूँ
और हर बार उठाया जाता हूँ।

अगर मैं रो रहा हूँ
तो थामे रखना मुझे,
क्योंकि ये आँसू दुख के नहीं,
पहचान के हैं।
जैसे आत्मा अचानक कह उठे
“हाँ… यही तो था
जिसे मैं हर जन्म ढूँढता रहा।”

तसल्ली से चाहिए मुझे साथ तुम्हारा,
एक पल नहीं, एक वचन की तरह।
क्योंकि जन्मों की थकान
किसी एक सुबह में नहीं उतरती,
उसे उतारने के लिए
किसी अपने की बाहों में
कई साँसों का ठहराव चाहिए…

और आज,
तुम्हारी इस खामोश पकड़ में
मुझे वह ठहराव मिल गया है।

— Shanky❤Salty

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या तो शून्य, या तो पूर्ण…!!!!

Love Poetry Image
January 5, 2026
तुम मेरे जीवन की किताब के उन खूबसूरत पन्नों जैसे हो,
जिनका प्रत्येक पन्ना उस रात की रानी के पुष्प की सुगंध सा है,
जो मेरी आत्मा को भी सुगंधित और समर्पित कर देता है।

मैं अक्सर तुम्हें उस ईश्वर के समान देखता हूँ
और वैसा ही व्यवहार करता हूँ,
जहाँ मैं केवल स्वार्थवश तुम्हारे समीप आता हूँ।
हाँ, सही सुना—स्वार्थवश ही।

क्योंकि मैं उस जिद्दी बच्चे की तरह हूँ
जिसमें स्वार्थ तो है, पर छल नहीं है;
जिसमें गलती तो है, पर वह गलत नहीं है;
जिसे तुम्हारी चाहत भी है
और ज़रूरत भी।

तुम मुझ पर नज़र रखो,
पर नज़रअंदाज़ मत करो।
हाँ, मेरी हर गलती को नज़रअंदाज़ कर देना,
पर मुझे नहीं।

मैं अगर बोझ हूँ
तो थोड़ा ढो लो मुझे।
कौन सा इस संसार में कोई स्थायी खुशी रखी है!
आए दिन नई-नई परेशानियाँ तो आती ही रहती हैं।

हो सके तो तुम मेरे साथ आ जाओ ना।
हम अपना ही एक संसार बनाएँगे,
जहाँ बस हम दोनों ही रहेंगे।
और अगर ग़म भी आया,
तो उसमें भी बस हम ही रहेंगे।

मेरे जीवन का प्रत्येक क्षण
प्रेम में तुम्हें समर्पित है।
पर सुनो—शर्त ये है
कि तुम्हारे संग प्रेम बेशर्त हो।

मैं रोऊँ
तो तुम कारण मत पूछना,
बस तुम मुझे लाड़ करना।

जैसे बच्चा सोकर उठे
और माँ को न देखे
तो कैसे चिड़चिड़ा हो जाता है,
ठीक वैसी ही हालत मेरी हो गई है।

पर ये सब बातें तुमसे कहना
मुझे ऐसा लगता है
जैसे प्रेम के लिए भिक्षुक बन जाना।
फिर भी…
तुम्हारी चाहत है।

तुम दया भी दिखाओ,
पर दृष्टि मत हटाओ।

मुझे कुछ नहीं सुनना है—
कोई परिस्थिति नहीं,
कोई मजबूरी नहीं,
कोई हालात नहीं,
कोई बहलाना-फुसलाना नहीं।

सच कहूँ तो
मुझे तुम चाहिए
तो पूरी की पूरी,
शत-प्रतिशत चाहिए।
थोड़ा भी उन्नीस-बीस नहीं।

और अगर नहीं…
तो फिर कोई बात नहीं।
मुझे तुम थोड़ी भी नहीं चाहिए।

या तो शून्य,
या तो पूर्ण…!

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नए साल की चकाचौंध…..!!!!

नए साल पर बुजुर्गों का अकेलापन और उदासी

नए साल की चकाचौंध में डूबी दुनिया, और वो बूढ़ी आंखें जो अंधेरे में हैं…


आज रात जब पूरा शहर नए साल के जश्न में डूबा होगा, आतिशबाजियों से आसमान चमक रहा होगा, ठीक उसी वक्त किसी वृद्धाश्रम की खिड़की से कुछ बूढ़ी आंखें उसी आसमान को निहार रही होंगी—अकेली और नम।

हम सब “Happy New Year” चिल्लाएंगे, लेकिन उस शोर में उन सिसकियों को भूल जाएंगे जो हमारे अपने घर के किसी कोने में, या हमसे दूर किसी आश्रम में दबी हुई हैं। जिस घर को उन्होंने अपनी मेहनत से बनाया, आज हम अपना “नया आशियाना” और “मॉडर्न लाइफस्टाइल” बनाने की होड़ में, उन्हीं को बेघर कर रहे हैं।

“हर रिश्ते में स्वार्थ देखा है हमने,
एक माँ-बाप ही हैं जिन्हें निस्वार्थ देखा है।
वो बचपन में ही खुशियों के रास्ते खोल देते हैं,
हम बड़े हो कर उनके लिए ना जाने क्यों
वृद्धा आश्रम के रास्ते खोल देते हैं।”

ये पंक्तियाँ मेरी किताब “निस्वार्थ प्रेम” से हैं, जो आज के समाज की उस कड़वी सच्चाई को बयां करती हैं जिसे हम अक्सर अपनी तरक्की की चमक में अनदेखा कर देते हैं।

क्या यही है हमारी तरक्की?

जिसने हमें उंगली पकड़कर चलना सिखाया, जिसने हमें अपनी खुशबू देकर फूल बनाया, आज हमने उन्हें ही कांटों की तरह चुभने वाला बना दिया है। हम नए साल पर मंदिरों में भीड़ लगाते हैं, तीर्थ यात्राओं की योजना बनाते हैं, लेकिन भूल जाते हैं कि:

“घर में ही कुंभ है,
माँ-बाप की सेवा ही शाही स्नान है।”

अगर जड़ों को ही काट दोगे, तो फलों की उम्मीद कैसे करोगे? नए साल का असली जश्न तब है जब हम अपने बुजुर्गों के चेहरे पर मुस्कान ला सकें, न कि उन्हें अकेलेपन के अंधेरे में धकेल दें।

पूरी किताब मुफ्त में पढ़ें

अगर इन बातों ने आपके दिल को छुआ है, तो मेरी किताब “निस्वार्थ प्रेम” (वृद्धा आश्रम से अनाथ आश्रम तक) जरूर पढ़ें। यह सिर्फ एक किताब नहीं, बल्कि एक आईना है।


Google Play Books पर पढ़ें (Free)

लेखक: आशीष कुमार

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पीड़ा नहीं, प्रतिरोध की गर्जना है…..!!!!

Randi written on dusty seat

मनुष्य होने का दावा करने वाली यह दुनिया औरत को कभी पूर्ण मनुष्य के रूप में देख ही नहीं पाई। वह या तो देवी बनी या “रण्डी” कहकर धिक्कारी गई। बीच का कोई स्थान आज तक न मिला, न दिया गया।

“रण्डी” — यह शब्द समाज ने गढ़ा नहीं, यह शब्द समाज की सोच ने थूका है।

एक आईना, जो समाज का दोहरा चरित्र दिखाता है

इस पुस्तक में लिखे शब्द किसी कल्पना या अतिशयोक्ति का परिणाम नहीं हैं। ये वही खुरदरे सच हैं जो कोठों की दरारों में, बाजारों की गंदगी में और समाज की आँखों में बरसों से पलते आए हैं। यह पुस्तक एक स्त्री की कथा नहीं, पूरी सभ्यता का दर्पण है जिसमें पुरुष की हवस भी दिखती है और समाज का दोहरा चरित्र भी।

लेखन का उद्देश्य किसी को नीचा दिखाना नहीं, बल्कि उन चीखों को शब्द देना है जो सदियों से बंद कमरों में दम तोड़ती रहीं। इस पुस्तक की भूमिका लिखते हुए मुझे यह स्वीकार करना पड़ता है कि इस कहानी की नायिका दरअसल कोई एक स्त्री नहीं है, वह हर स्त्री है जो पुरुष के हवस का बोझ ढोती है, जो अपनी अस्मिता की राख सँभालती है और फिर भी जीती रहती है, टूटते हुए भी दुनिया को हँसी देती है।

यह कहानी किसी प्रेम, नीति या सामाजिक सुधार की कथा नहीं। यह कहानी उसी ज़हर की है जो समाज अपने भीतर लिए घूमता है और हर उस स्त्री पर उगल देता है जिसे वह समाज “कमजोर” समझता है। यह पुस्तक स्त्री की पीड़ा का गीत नहीं, स्त्री की प्रतिरोध की गर्जना है।

“स्त्री देह नहीं, स्त्री संसार है। और जो संसार को देह समझ ले, वह स्वयं नामर्द बन जाता है।”

इस रचना का उ‌द्देश्य न किसी वर्ग को दोष देना है, न किसी समुदाय को। इस पुस्तक का उद्देश्य सिर्फ इतना है कि दुनिया समझ सके कि जिस औरत को समाज “रण्डी” कहता है, वह असल में उस समाज की सबसे बड़ी शिकार है। उसके ज़ख्मों में उस पुरुष की हवस है, उसके गले में उसकी मजबूरी है और उसके जीवन में उस व्यवस्था का अंधेरा है जिसने उसे विकल्प नहीं दिया।

पढ़ने वाले को चेतावनी है कि इन पन्नों में न सुकून मिलेगा, न राहत। क्योंकि यह पन्ने सिर्फ पढ़ने के लिए नहीं अपितु समझने के लिए हैं। यदि इन पन्नों को पढ़ते समय आपको दर्द हो, घुटन महसूस हो, या क्रोध आए तो समझिए यह पुस्तक अपने उद्देश्य में सफल है।

अंत में, यह पुस्तक उन सभी लड़कियों की ओर से एक प्रश्न है—

“अगर हम सच में ‘लक्ष्मी’ हैं, तो हमें कोठों पर क्यों बेचा गया?”

और इसी प्रश्न से यह कहानी शुरू होती है। इसी प्रश्न से यह कहानी अपना अंत पाती है। और शायद इसी प्रश्न से कभी कोई परिवर्तन जन्म लेगा।


(“Randi: Havas ke Bazaar ka Ankaha Sach” पढ़ने और लेखक से जुड़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक्स पर क्लिक करें।)

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रण्डी…..!!!!

December 27, 2025

Shanky❤Salty

“कहते हैं नवरात्र में माँ की पूजा करो…
घरों में कलश सजाओ….
महिषासुर मर्दिनी को याद को-
पर वही समाज नवरात्र खत्म होते ही किसी बेटी के जिस्म को अपनी हवस का प्रसाद बना देता है।”


यही इस पुस्तक का सबसे बड़ा सच है।


यह किताब उस कड़वाहट, उस कपट और उस कुरूपता की कहानी है। जहाँ एक ओर लोग माँ दुर्गा को सिंह पर सवार रूप में पूजते हैं, और दूसरी ओर उसी माँ के रूप में जन्मी बेटियों को सड़क के मोड़ पर, अँधेरे कमरों में, बाज़ार की बोली में बेचते हैं।

ये वही दुनिया है जहाँ लड़की को घर में लक्ष्मी कहा जाता है पर शादी आते ही वही लोग लक्ष्मी नहीं, लाभ गिनने लगते हैं।

जहाँ ‘बेटी घर की शान’ कहा जाता है पर बाहर निकलते ही उसके कपड़े, उसके कदम, उसकी साँसें सब हवस की नजरों से नापी जाती हैं।


365 दिन में से, जहाँ पूजा के नौ दिन शक्ति की स्तुति होती है और बाकी 356 दिन उसी शक्ति का शोषण।


यह पुस्तक उन आवाज़ों का संग्रह है जो कोठों की दीवारों में कैद रहीं, उन घृणाओं का प्रतिवाद है जो पुरुषों के मुँह से रोज़ गिरती हैं, और उन कटाक्षों का प्रतिशोध है जो समाज ने स्त्री की आत्मा पर चुभोए।

यह किताब सिर्फ़ “रण्डी” शब्द का अर्थ नहीं खोलती यह वह भी दिखाती है कि
रण्डी वह स्त्री नहीं,
वह समाज है जिसकी हवस कभी नहीं बुझती।

एक कड़क, खुरदरी, नंगी सच्चाइयों से भरी कथा जो आपको झकझोर देगी, लगा देगी कि आप भी इस पाप के हिस्सेदार रहे हैं और शायद पहली बार में ही आपको यह समझ आ जाएगा।


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From Rejection to Recognition

December 26, 2025

Shanky❤Salty

Rejected by 6 publishers due to bold and raw language.
Rejected twice by the Ministry because of the book title.

After submitting clarification and the entire manuscript,
the Ministry approved the book and assigned an ISBN without any single change.

I will not step back from calling truth, truth.
I will definitely show society a mirror for its double standards.


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मेरी भस्म से आरती…..!!!!

December 24, 2025

Shanky❤Salty

हे माँ! तूने ही तो भेजा था मुझे इस संसार के मेले में,
पर यहाँ हर किसी ने बस ‘बोझ’ समझा मुझे अकेले में।
ताने मिले, धिक्कार मिला, जैसे मैं कोई लावारिस हूँ,
इस भीड़ में रहकर भी, माँ मैं कितना अस्तित्वहीन हूँ।

अब थक गया हूँ, हार गया हूँ, साँसें भारी लगती हैं,
अक्सर जीवन की डोर काटने की इच्छा जगती है।
पर तेरा सिखाया ‘धैर्य’ ही मेरे पाँव थाम लेता है,
वरना ये मन तो कबका, मुक्ति का नाम लेता है।

पर अब और नहीं माँ, अब बस तेरा ही सहारा है,
इस थके हुए बालक ने, तुझे ही पुकारा है।
मेरी बस कुछ इच्छाएँ हैं, इन्हें तू स्वीकार कर,
मुझे अपने भय से भी निहाल कर, अपने प्यार से अमर कर।

मेरा सिर सदा पड़ा रहे, तेरे चरणों की धूल में,
मेरे नयन देखें तुझे ही, तेरे उस रौद्र रूप के शूल में।
तूने जो पहन रखी है, उन नर-मुंडों की माला में,
एक मुंडी मेरी भी गुँथी हो, उस भीषण ज्वाला में।

जब तेरा अभिषेक हो माँ, तो पानी न कोई लाए,
मेरी नसों का तप्त रक्त ही, तेरे चरणों को नहलाए।
मुझे मणिकर्णिका का घाट ही प्यारा, जहाँ सत्य का वास है,
गंगा की कल-कल ध्वनि में, मिलता सुखद आभास है।

वहाँ चित्त लेटा रहूँ मैं, हर वेदना शांत हो जाए,
मेरी नश्वर देह की राख, शिव के काम आए।
जब जलकर खाक बनूँ, तो यही वरदान मिले माँ,
मेरी ही भस्म से बाबा विश्वनाथ की आरती खिले माँ।

मेरा कतरा-कतरा अब तुझे ही समर्पित हो जाए,
तेरा ये बालक, तेरे ही अनंत अँधेरे में खो जाए।
हे काली माँ! मेरे अंत में भी तेरा ही सम्मान हो,
तुझमें विलीन होना ही, अब मेरा अभिमान हो।


Writing from pain, faith, and surrender — follow my journey here.


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गर्भपात करवा दो…..!!!!

December 20, 2025

Shanky❤Salty

आज एक मंज़र ने मेरी रूह को झकझोर दिया,
जहाँ एक अमीर ने थाली में झूठन छोड़ दिया।
उसी झूठन में, उसी फेंकी हुई थाली में,
मैंने एक बच्चे को ‘जीवन’ खोजते देखा।

बात गहरी है, मगर बहुत सीधी है साहब,
पेट भरते ही मैंने इंसानों को औक़ात भूलते देखा।

मौत तो रहमदिल है, एक पल में किस्सा तमाम करती है,
मगर ये पेट की भूख, मौत से भी बदतर काम करती है।
ये तिल-तिल कर जीवन को नोचती है,
एक-एक दाने के लिए इंसान को तरसा देती है।

आज मैंने ‘अन्न’ में ‘ब्रह्म’ को देखा है,
जो तुम्हारे लिए महज़ पेट भरने का साधन है,
वो किसी और के लिए साँसें, किसी के लिए जीवनदान है।

क्या गज़ब का तमाशा है इस दुनिया के बाज़ार में,
गरीब मेहनत करता है, दो वक़्त की रोटी ‘पाने’ के लिए,
और अमीर पसीना बहाता है, उसी रोटी को ‘पचाने’ के लिए।
किसी के पास वक्त नहीं कि ताजी रोटी खा सके,
और किसी के मुकद्दर में बासी रोटी तक नहीं कि भूख मिटा सके।

रिश्तों को भी इस भूख की तराजू पर तुलते देखा है,
कुछ को अपनों की खातिर, अपने मुँह का निवाला छोड़ते देखा है,
तो कुछ बदनसीबों को, रोटी की खातिर अपनों को ही छोड़ते देखा है।
हम जिसे महज़ ‘आटा’ या ‘रोटी’ कहते हैं,
गरीब की सूखी जुबान वाले उसे अपनी ‘ज़िंदगी’ कहते हैं।

वो कचरे में फेंकी रोटियाँ, रोज़ ये गवाही देती हैं,
कि पेट भरते ही इंसान की इंसानियत दम तोड़ देती है।
मेरे दोस्त शौक अधूरे रहने पर खुद को ‘गरीब’ कहते हैं,
अरे यारों, गरीब वो है जिसे दो वक़्त का निवाला नसीब नहीं।

मैंने देखा है उस बच्चे को कोयले की खदान में,
वो कालिख नहीं थी, वो समाज के माथे पर लगा दाग था।
खदान में आग लगी थी या उसके पेट में, ये कौन जाने?
सरकार इसे ‘चोरी’ कहती है, और अपने वादे भूल जाती है।
पगड़ी से चाय वाला आ गया, सियासत बदल गई,
मगर भूख और गरीबी के खिलाफ कभी कोई गठबंधन नहीं हुआ।
इन्हें वादों से झोली भरना आता है, पर भूखे का पेट भरना नहीं।

गाँव से गुजरा तो कच्ची झोपड़ी पे ‘सुस्वागतम्’ लिखा था,
शहर के आलीशान मकान पे ‘कुत्ते से सावधान’ लिखा था।
देख लो अमीरी और गरीबी का ये फर्क भी,
वहाँ धन की दरिद्रता थी, पर यहाँ तो ‘ह्रदय’ ही दरिद्र था।

और अंत में…
उस लाचार की आँखों ने, आसमान की तरफ देखकर
एक ऐसी बात कही, जिसने मेरा कलेजा चीर दिया…

किसी गरीब ने सच ही कहा था

“मेरी ये भूख भी पेट से है मालिक,
हो सके तो इसका भी गर्भपात करवा दो।”

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हत्या का दूसरा नाम…..!!!

December 14, 2025

Shanky❤Salty

मैं लिखना नहीं चाहता था,
पर जब ये आँसू रुकते ही नहीं,
तो उन्हें यूँ ही बह जाने देने से अच्छा लगा
कि शब्दों का रूप दे दूँ।
शायद काग़ज़ मेरी बात समझ ले,
क्योंकि इंसान तो कब का अनसुना कर चुका है।

अक्सर मुझे लगता है कि जिसे दुनिया आत्महत्या कहती है,
वह असल में आत्महत्या नहीं होती।
वह हमेशा से ही हत्या होती है।
बस समाज अपनी गलतियों पर पर्दा डालने के लिए
उस हत्या को आत्महत्या का नाम दे देता है।

जब किसी की भावनाओं के साथ खेला जाता है,
जब मानसिक पीड़ा को नज़रअंदाज़ किया जाता है,
जब किसी के आत्मसम्मान को रोज़ थोड़ा-थोड़ा तोड़ा जाता है,
तो बताओ
फिर जीने का कौन-सा रास्ता बचता है?

शारीरिक पीड़ा तो समय के साथ ठीक हो जाती है,
लेकिन मानसिक पीड़ा
समय के साथ और गहरी होती चली जाती है।
रातों को जागता हुआ मन,
दिन में मुस्कुराता हुआ चेहरा
यही तो सबसे बड़ी विडंबना है।

समाज को मेरी ज़रूरत होती है
अपने दुख-दर्द बाँटने के लिए।
हर कोई अपना बोझ मुझे सौंपकर
हल्का होकर चला जाता है।
पर जब मुझे किसी सहारे की ज़रूरत होती है,
तो दूर-दूर तक कोई दिखाई नहीं देता।
भीड़ होती है,
पर वह भीड़ मेरी नहीं होती।

हर समय बातों से मुझे दोषी ठहराया जाता है,
और अपनी कमज़ोरी के पलों में
मैं खुद को ही अपराधी मान लेता हूँ।
इतनी उलझन भर गई है मन में
कि अब हर छोटी-सी बात पर संदेह होने लगा है
दूसरों पर भी,
और खुद पर भी।

शायद मैं ज़िंदा हूँ,
पर जीने जैसा कुछ महसूस नहीं होता।
इसीलिए लिख रहा हूँ
क्योंकि अगर लिखना भी छोड़ दिया,
तो शायद मैं खुद से ही खो जाऊँ।


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सादगी-ए-इश्क़….!!!!

December 11, 2025

Shanky❤Salty

मुझे इश्क है सादगी से तेरे,
तू सजे या न सजे फिर भी खूबसूरत लगे मुझे…

तुम जैसे हो, बस वैसे ही मन को भाती हो,
बिना कोशिश के ही दिल में उतर जाती हो।
ना गहनों की चमक चाहिए, ना रंगों की चमक,
अपने मुस्कान से ही मेरे दिल की दुनिया सजाती हो।

तेरे आने से घर में नहीं,
मेरी रूह में उजाला होता है,
तेरी हर छोटी-छोटी आदत से
मुझे जीने का सहारा होता है।

तू खामोश रहे तो भी संगीत बहता है,
तू बोले तो जैसे मौसम बदलता है।
तेरे बिना ज़िन्दगी ठहरी हुई नदी,
तेरे साथ हर लम्हा बहता है।

मेरी चाहत ना मांग है, ना कोई उम्मीद,
ये तो श्रद्धा है… जो तुम तक झुकती है।
मैं तुम्हें पाने की आरज़ू नहीं करता,
मैं तो बस तुम्हारे होने पर ही खूब जीता हूँ।

समर्पण का ये रिश्ता बहुत गहरा है,
इश्क़ की ये राह बहुत पवित्र है।
तू चाहे दूर रहे या पास,
दिल को तू हर हाल में प्रियतम, प्रियतम, प्रियतम सी लगती है।

कसम से…
मुझे इश्क है सादगी से तेरे,
तू सजे या न सजे फिर भी खूबसूरत लगे मुझे…


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इबादत-ए-इश्क़…..!!!!

December 10, 2025

Shanky❤Salty


तुम्हें चाहना मेरी ज़रूरत नहीं, सच कहूँ तो मेरी श्रद्धा है… और श्रद्धा कभी शर्तों पर नहीं टिकी होती। जबसे मेरे मन में ऐसी निष्ठा जन्म ले ली है, तबसे चाहे-अनचाहे हर साँस में तुम घुलने लगे हो, और तब चाहत किसी मांग या अपेक्षा का रूप नहीं लेती, बल्कि एक मौन उपस्थिति बन जाती है—अटूट, अबाध, और अडिग। श्रद्धा का अर्थ ही है आत्मा का झुक जाना, बिना किसी प्रतिदान की कल्पना किए। और जब मन इस चरण पर पहुँचता है, तो वह किसी सम्बन्ध को पकड़कर नहीं रखता, केवल उसे महसूस करता है, जीता है, और उसी में अपनी शांति ढूँढ लेता है।


कभी-कभी लोग समझ नहीं पाते कि प्रेम और श्रद्धा में कितना महीन किन्तु गहरा अंतर होता है। प्रेम में चाह हो सकती है, उम्मीदें हो सकती हैं, मन की कोई आकांक्षा भी छिपी हो सकती है पर श्रद्धा में केवल समर्पण होता है। वहाँ मन बार-बार यह नहीं पूछता कि सामने वाला क्या देगा, क्या बदले में महसूस करेगा, या क्या वह भी उतना ही लौटाएगा। श्रद्धा बस बहती है—एक पवित्र सरिता की तरह—जिसका अर्थ उसके प्रवाह में है, उसके गंतव्य में नहीं।


चाहे डुबो दो, या तैरा दो
मुझे तो बस अपने साथ रख लो


तुम्हारी ओर उठती मेरी भावनाएँ भी उसी सरिता की तरह हैं। मैंने कभी तुम्हें पाने की इच्छा से तुम्हें नहीं चाहा, न ही किसी परिणाम के आधार पर अपने मन को परखा। तुम हो, बस इतना जानना ही मेरे लिए बहुत है। तुम्हारा होना, तुम्हारी उपस्थिति, तुम्हारी मुस्कान, तुम्हारी ख़ामोशी—ये सब मेरे भीतर एक अलग ही जगत बना देते हैं, जहाँ मैं बिना किसी शर्त के अपने भावों को जी सकता हूँ।
जानता हूँ कि जीवन में हर चीज़ का कोई सुनिश्चित प्रतिफल नहीं होता। कभी-कभी आत्मा किसी ऐसे व्यक्ति से जुड़ जाती है, जिसके साथ कोई परिभाषित सम्बन्ध संभव भी नहीं होता, फिर भी वह बंधन टूटता नहीं। वह बंधन इच्छाओं से नहीं, बल्कि संवेदनाओं से उपजा होता है। ऐसे बंधन को शब्दों में बाँधना आसान नहीं, और शायद ज़रूरी भी नहीं।


मैंने तुम्हें चाहना इसलिए नहीं चुना कि तुम मेरी ज़िन्दगी में कुछ जोड़ सको, बल्कि इसलिए कि तुम्हें चाहने में ही मेरे अस्तित्व को अर्थ मिला। मेरे मन ने तुम्हें पूजा की वस्तु नहीं बनाया, पर तुम्हारे प्रति जो भाव है, वह उपासना जैसा निर्मल और शांत है—जहाँ हृदय शिकायत नहीं करता, केवल स्वीकार करना जानता है।
और हाँ, इतना अवश्य कहूँगा कि प्रेम तब तक पवित्र रहता है जब तक उसमें कोई आग्रह नहीं आ जाता। जैसे ही प्रेम किसी विकल्प, किसी दबाव या किसी अपेक्षा में ढलने लगे, उसकी पवित्रता क्षीण होने लगती है। इसलिए मैं अपने भावों को आग्रह नहीं, आशीर्वाद की तरह तुम्हारी ओर भेजता हूँ—अनकहे, अनसुने, पर सत्य भाव से।


इश्क़ इबादत होता है,
पर उस इबादत-ए-इश्क़ में इच्छा आ जाए
तो वही इश्क़ का इंतक़ाल हो जाता है।


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कल्‍पना…..!!!!

Shanky❤Salty

कल्‍पना अच्‍छी भी है,
जब वो मन के आँगन में
ठंडी हवा की तरह उतरती है,
और बिना माँगे ही
दिल की खाली झोली में
खुशियों के दीप जला देती है।

पर यही कल्‍पना
जब चाहत का आकार ले लेती है,
तो उम्मीदों की नाज़ुक शाखों पर
भारी सपनों का बोझ रख देती है,
और फिर
इन टूटती शाखों से
आँसुओं का अथाह समंदर गिरता है।

मन कभी-कभी
आसमान का दरवाज़ा खोलकर पूछता है
“क्यों रचती हो ऐसा जादू,
जिसमें सुख भी है,
और उसी में गहरे दुःख का स्वाद भी?”
कल्‍पना बस मुस्कुराती है,
जैसे कह रही हो
“मैं आईना हूँ…
तुम जैसा सोचोगे,
वैसा ही दिखाऊँगी।”

फिर भी नादान दिल
हर बार एक नई तस्वीर गढ़ता है
बादलों में महल,
चाँद में साथी,
और हवाओं में संदेश…
मानो दुनिया
इच्छाओं की बुनावट से ही चलती हो।

और इसी मोह में डूबकर
कई बार मैं
खुद को ही भूल जाता हूँ।


मैं भी मूर्ख था,
चाँद को देखकर उसे पाने की कोशिश में लगा था…


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बस थोड़ी सी……!!!

November 20, 2025

Shanky❤Salty

कभी-कभी ज़िंदगी में कुछ बिछड़ाव ऐसे होते हैं जो सिर्फ साथ नहीं ले जाते, बल्कि अपने साथ पूरा वजूद ही उठा ले जाते हैं। कुछ लोग हमारे जीवन में आते नहीं—हमारे भीतर बस जाते हैं। और जब वे चले जाते हैं, तो दुनिया वही रहती है, पर हम पहले जैसे नहीं रहते।

तुम्हारा जाना मेरे जीवन की सबसे बड़ी पीड़ादायक दुर्घटना थी—एक ऐसी घटना जिसने मेरे समय को तुम्हारे साथ और तुम्हारे बिना दो हिस्सों में बाँट दिया। आज भी जब मैं साँस लेता हूँ, तो लगता है जैसे हवा में तुम्हारी कमी घुली हुई है।

आज भी अक्सर रातों में, नींद की गहराई में कुछ ऐसा दिख जाता है कि मेरी चीख निकल जाती है… फिर आवाज़ बंद हो जाती है। आँखों से आँसू भले न बहें, पर पसीने से बदन तर-बतर हो जाता है—इस ठंड में भी।
माना कि मौत एक पल में मारती है, लेकिन कुछ यादें हर पल मारती हैं… और जिंदगी को मौत से भी बदतर बना देती हैं।

लोग कहते हैं कि समय हर घाव भर देता है, और मैं भी कभी इस बात को कुछ हद तक मानता था। पर घाव भरने के लिए या तो मरहम चाहिए या फिर किसी का सच्चा साथ। मेरे जीवन में भीड़ तो बहुत है—इतनी कि अगर सबसे मिलना-बातें करना शुरू कर दूँ तो समय कम पड़ जाए… लेकिन दिल पर हाथ रखकर कहता हूँ—उनमें से कोई भी अपना नहीं है। हाँ, कोई भी अपना नहीं है।
इस दुनिया में चाहने वालों की नहीं, समझने वालों की कमी है।
फूलों को माली समझता है… और बाकी सब उसे कौड़ी के भाव खरीदना चाहते हैं।

मैं क्या कहूँ, किससे कहूँ, कितना कहूँ—समझ नहीं आता…

एक दिन सीने के दर्द की वजह से थोड़ी देर सो जाऊँ, तो शिकायतों का अंबार लग जाता है। पर उन्हें यह भी नहीं पता कि मुझे अपने घाव दिखाना नहीं आता।
हर कोई किसी को मैं ‘मौजूद’ चाहिए, पर कोई यह नहीं सोचता—क्या मुझे भी किसी की मौजूदगी चाहिए?

मुझे सच में किसी से कुछ नहीं चाहिए… बस थोड़ी शांति चाहिए—अपााारररर शांति।
जहाँ कोई शोर न हो… या फिर कुछ भी न हो।
अगर कुछ होना भी हो, तो बस मणिकर्णिका का घाट हो और मैं चित् लेटा रहूँ—एकदम मौन, हमेशा के लिए।

क्योंकि सच में… मैं थक चुका हूँ।
मुझे जो चाहिए, वह मिल नहीं सकता, इसलिए कुछ कहना व्यर्थ है।
और जो दे सकता है, उसे बताने की क्या ज़रूरत—जो अपना होगा, वह खुद समझ जाएगा और चुपके से दे जाएगा।
नहीं तो… एक दिन मैं भी खोल मुट्ठी हमेशा के लिए चला जाऊँगा।


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दो नयनों की मुलाक़ात…..!!!

November 18, 2025

Shanky❤Salty

हम मिले…
जबकि हम एक-दूसरे को ढूँढ भी नहीं रहे थे,
शायद ईश्वर को पहले से पता था
कि हमें एक-दूसरे की ज़रूरत है।

एक तरफ़ वो था—
जिसकी दुनिया किसी को खो देने से
अचानक अंधेरी हो गई थी।
वो रोया इतना…
कि आँसू भी उसकी आँखों से थककर
दूर चले गए थे।
वो जी रहा था,
पर ज़िंदगी जैसे उसके लिए
बस एक सज़ा बन गई थी।

दूसरी तरफ़ वो थी—
जिसका दिल किसी ने जानबूझकर
धरती पर पटक दिया था।
वो भी बिखरी हुई थी,
धड़कनों में अब जान नहीं
बस चुभन बची थी।

दोनों टूटे हुए…
दोनों अधूरे…
दोनों ऐसे जैसे दुनिया से
एक आख़िरी धक्का खाने को तैयार।
पर जाने कैसी वह घड़ी थी,
कैसा वह मोड़ था—
दो अनजान लोग
एक-दूसरे के साहिल बन गए।
पहली बातें हुईं,
और दर्द ऐसे बहने लगा
जैसे किसी ने बरसों बाद
दिल का धड़कन दिया हो।
एक ने कहा—
“मुझे लगने लगा था कि मैं अकेला लड़ रहा हूँ…”
दूसरे ने धीरे से जवाब दिया—
“मैं भी…”
और वहीं से
दो टूटी हुई कहानियाँ
एक होनी शुरू हो गईं।
वो उसके ज़ख़्मों को पढ़ती रही,
जैसे हर दर्द को
अपनी बाँहों में समेट लेगी।
वो उसके टूटे विश्वास को
धीरे-धीरे जोड़ता रहा,
जैसे कोई बिखरा हुआ शीशा
नर्म उँगलियों से संभाल लिया हो।
उनका रिश्ता
प्यार से शुरू नहीं हुआ—
ज़रूरत से भी नहीं।
वो शुरू हुआ एक
समझ,
एक सन्नाटा,
एक गहरी चुप्पी से…
जिसमें दोनों को
अपना घर मिल गया।
अब…
जब वो साथ होते हैं
तो ऐसा लगता है
जैसे दर्द ने हार मान ली हो,
जैसे मोहब्बत ने
देर से ही सही,
मगर सही जगह पहुंचकर
दस्तक दे दी हो।
ना वादे हैं,
ना कसमें—
बस एक अपनापन है
जो बिना बोले भी
दिल को यक़ीन दिला देता है—
कि दो टूटे हुए लोग भी
मिलकर कभी-कभी
एक पूरा इन्सान बन जाते हैं।
और शायद
यही किस्मत की
सबसे खूबसूरत मेहरबानी होती है—
जब वो दो बिखरी रूहों को
एक बना देती है।


वो कहते है ना
दो और दो चार होता है
और
दो में से एक गया तो एक बचता है
पर ये कोई मैथेमैटिक्स की बात है,
लेकिन मैं मोहब्बत की बात कर रहा हूँ
जहाँ पे
दो में से एक जाता है तो कुछ नहीं बचता है
पर
दो नयन तेरे और दो नयन मेरे मिले तो मिलकर एक हुए


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एक आलिंगन की यात्रा…..!!!!

November 17, 2025

Shanky❤Salty

रातों में जब तुम अकेली सिमटकर सोती थीं,
चुप-चाप, गुम-सुम, बिलकुल निःशब्द,
तुम्हारी पलकों पर एक थकान सी ठहरी रहती थी,
मानो दिल अपना ही आहिस्ता-आहिस्ता रोता हो।

मैं दूर था… पर तुम्हारी तन्हाई का
हर काँपता पल मुझे महसूस होता था।
कितनी बार मन ने कहा—
उस समय ही तुम्हारा सिर अपनी बाँहों पर रख दूँ,
ताकि तुम्हारी उस ठहरी उदासी को
थोड़ा-सा सहला सकूँ, थोड़ा-सा बाँट सकूँ।

फिर एक दिन जब पहली बार तुम्हें सीने से लगाया,
तो सच कहूँ—
जैसे दुनिया की सारी धड़कनें एक साथ थम गईं।
तुम वही थीं, पर कुछ बदल गया था…
तुम्हारी साँसों में अब हल्कापन था,
तुम्हारी आँखों में एक नयी चमक थी,
और तुम्हारे भीतर की वो खोई-खोई उदासी
धीरे-धीरे पिघलकर बह गई।

अब जिस जगह कभी दर्द रहता था,
वहीं आज सुकून खिलता है।
अब तुम्हारी रातें रोती नहीं…
मेरी बाँहों में आकर मुस्कुराती हैं।

और मेरी जान, बस इतना ही कहना है—
तुम्हारा हर दर्द मेरा है,
तुम्हारा हर सुकून मेरा है।
और अगर तुम्हें एक आलिंगन से
ठीक होने का रास्ता मिलता है,
तो मैं तुम्हें हर रात नहीं…
हर धड़कन में हजार बार बाँहों में भर लूँ।


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ठीक है…!!!!!

November 16, 2025

Shanky❤Salty

किसी से कुछ न बोलना ही ठीक है शायद,
बोल कर भी कौन-सा दर्द हल्का होता है।
लोग आते हैं, जाते हैं,
किसी का होना या ना होना भी
आजकल एक-सा ही लगता है।
अंत में मैं भी न रहूँ…
तो क्या फर्क पड़ता है,
ये सोच कर डर तो लगता है,
पर मन कहता है
चलो, ठीक है…
क्योंकि शायद सबको भूल जाना ही ठीक है,
और खुद को सबसे ज़्यादा।
थोड़ी देर को सो जाऊँ,
दुनिया की हलचल से दूर,
ये भी ठीक है…
पर दिल का दर्द रुलाता है—
“हां… मेरा सो जाना ही ठीक है…
पर बस आराम के लिए,
भागने के लिए नहीं।”

कभी-कभी लगता है
कि मेरा हमेशा-हमेशा के लिए सो जाना ही ठीक है…

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सिर्फ़-और-सिर्फ़ मेरी मौजूदगी है

November 15, 2025

Shanky❤Salty

तुम्हारी मुस्कान की वज़ह
सिर्फ़-और-सिर्फ़ मेरी मौजूदगी है,
ये बात तुम्हें पता होनी चाहिए
क्योंकि जब भी तुम हँसती हो,
मेरे दिल का कोई एक कोना
और भी रौशन हो जाता है।

तुम्हारी आँखों की चमक में
मेरा ही नाम झिलमिलाता है,
और तुम्हारे होंठों की हल्की सी मुस्कान
मुझे ये एहसास दिलाती है
कि दुनिया में किसी एक दिल का
कारण मैं भी हूँ।

तुम जब दूर होती हो,
तो लगता है जैसे हवा ने
अपनी नरमी खो दी हो।
पर जैसे ही तुम मुस्कुराती हो,
ज़िन्दगी फिर से मीठी लगने लगती है
जैसे मेरे लिए ही कोई
खुशियों की धुन बज उठती है।

‘जान’,
अगर कभी दुनिया ने तुम्हें रुलाया,
तो याद रखना
तुम्हारे आँसू मेरे बस में हैं,
और तुम्हारी मुस्कान मेरी ज़िम्मेदारी।
तुम्हारी हर हँसी
मेरे होने की गवाही देती है,
जैसे तुम कहना चाहती हो
“हाँ, मेरी खुशी की वजह तुम ही हो।”

और मैं भी यहीं खड़ा हूँ,
तुम्हारे नाम से बंधा हूँ,
तुम्हारी हर साँस में अपनी रूह का
एक टुकड़ा रखकर।

क्योंकि, जान
तुम्हारी मुस्कान में
मेरा घर बसता है,
और मेरा सर सिर्फ तुम्हारा सज़दा करता है।

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Silent Discrimination…..!!!

September 16, 2025

Shanky❤Salty

So the Supreme Court of India says  “Go and pray to your deity”   when a devotee pleads to restore the beheaded idol of Lord Vishnu at the Javari Temple in Khajuraho.

I think this is totally Strange. When cases related to the Waqf Board or minority religious sites come up, the same Court rushes hearings, grants urgent relief, and bends over backwards to protect their “sentiments”.

But when it’s about Hindu heritage, suddenly it’s “We can’t do anything. Go pray.”
Why this double standard? Is Hindu faith considered second-class in its own country?

If protecting temples and idols is “not the Court’s job,” then why does the Court actively intervene to protect every other faith’s places and symbols? Justice cannot become selective sympathy.

Our deities are treated as “just stones” while every other faith’s structures are treated as “living heritage.” This is not secularism — this is silent discrimination.

Either protect everyone’s faith equally, or stop pretending this is justice.


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चाय और तुम……!!!!

August 30, 2025

Shanky❤Salty

तुम्हें चाय पसन्द है और मुझे तुम पसन्द हो, इसीलिए तो आज तुम्हारी पसन्द की चाय ले आया हूँ मैं, ख़ुद के लिये। तुम्हें पता है न, मुझे बोलना पसन्द नहीं है और सुनना भी पसन्द नहीं है ज़्यादा। बस इसी लक्षण के चलते हमारी पटरी किसी से बैठती नहीं है। हाँ, मुझे बस पसन्द है तो सिर्फ़-और-सिर्फ़ तुम्हारे ख़यालों में खोना पसन्द है।

यक़ीनन मेरी बातें तुम्हें चुभती होंगी, हाँ, तुम्हारी बातें भी मुझे चुभती हैं। पर इस चुभन की वजह मेरी नज़रों में सिर्फ़ दूरियाँ हैं। पर ऐसा नहीं है कि शब्दों की क़ीमत अपने आप में कुछ भी नहीं होती। कहने को मैं मर सकता हूँ, मेरी भावनाएँ मर सकती हैं, पर याद रखना वो एहसास कभी नहीं मर सकते, क्योंकि मैंने उन सभी एहसासों को एक बीज के रूप में तुम्हारे हृदय के वक्षस्थल में अपने हाथों से बो दिया है, जो वक़्त के साथ-साथ एक वटवृक्ष का रूप एक न एक दिन ले ही लेगा।

वो वटवृक्ष जिसकी अनन्त शाखाएँ उत्पन्न होंगी – कोई प्रेम की, तो कोई माधुर्य की, तो कोई वात्सल्य की, तो कोई हास्य की, तो कोई रुदन की, तो कोई पीड़ा की। पर एक दिन जब हम मिलेंगे तो हम बाँहें फैलाये हुए उन तमाम शाखाओं को समेट कर केवल एक हो जाएँगे।

माना कि थोड़ा ढीठ हूँ मैं, पर विश्वास है मुझे कि जो चाय अच्छी बना सकती  है, वो मेरी महफ़िल तो अच्छी सजा ही सकती है। अच्छी चाय बनने में थोड़ा वक़्त तो लगता है और अन्त में उसकी महक से मुस्कुराहट छा जाती है। इसीलिए आँसू पोंछ कर भूत की गोद से उतर आओ और मेरे भी भविष्य की दौड़ पर अपने हाथों से रोक लगाकर वर्तमान में जीना शुरू करवा दो।

ख़ैर, चाय ठंडी हो जाएगी मेरी अगर बातें ज़्यादा लम्बी हुईं तो… इसीलिए तुम्हारी ख़ुशबू फिर कभी, अभी तो चाय की ख़ुशबू में खो जाने दो।


सच कहूँ तो, चाय तो बस एक बहाना है, हक़ीक़त में तो अपनी खट्टी-मीठी बातों से बस तुम्हें अपना बनाना है।


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तुम, सिर्फ तुम……!!!!!

August 26, 2025

Shanky❤Salty


तुम्हारा मेरे जीवन में आना
मेरे अस्तित्व की इस जीवन यात्रा की
सबसे सुंदर घटना है

जैसे सूनी धरती पर पहली बार बरसने वाली बूंदें,
वैसे ही तुम मेरे जीवन में उतरे।
तुम्हारे आने से पहले
मेरे दिन किताब के सूखे पन्नों जैसे थे,
जिन्हें हवा पलट तो देती थी
पर उनमें कोई कहानी नहीं थी।

तुम आए तो
हर पन्ने पर कविता उतरने लगी,
हर खामोशी में संगीत घुलने लगा,
और हर साँस में तुम्हारा नाम बसने लगा।

तुम्हारे बिना ये जीवन
सिर्फ समय का बहाव होता,
पर तुम्हारे साथ यह यात्रा
एक उत्सव बन गई है।

तुम्हारे हाथों की ऊष्मा,
तुम्हारी आँखों की गहराई,
और तुम्हारी मुस्कान की रौशनी ने
मेरे अस्तित्व को नया अर्थ दिया है।

अगर कोई मुझसे पूछे
“जीवन की सबसे बड़ी प्राप्ति क्या है?”
तो मैं बिना सोचे कह दूँगा
“तुम, सिर्फ तुम।”


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बिहार और झारखंड के स्वाद की रेसिपी का आमंत्रण

🌾✨ बिहार और झारखंड के स्वाद की खोज में!📚 एक सांस्कृतिक कुकबुक के लिए रेसिपी आमंत्रण क्या आपको बिहार या झारखंड की कोई पारंपरिक, विशिष्ट और प्रामाणिक रेसिपी आती है, जिसे आपने अपने घर में पीढ़ियों से बनते देखा और सीखा है? अब समय आ गया है उस अमूल्य स्वाद और विरासत को दुनिया तक […]

Recipebj@gmail.com

बिहार और झारखंड के स्वाद की रेसिपी का आमंत्रण
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आत्महत्या हत्या ही होती है

July 8, 2025

Shanky❤Salty

मेरे मरने के बाद मेरी तस्वीर के आगे आँसू बहाना…
फिर कहना — “भगवान शैंकी की आत्मा को शांति दे…”

कितना आसान होता है ना,
मरने के बाद पाखंड करना, श्रद्धांजलि देना,
और फिर अपने-अपने जीवन में लौट जाना।

पर क्या तुमने कभी कोशिश की थी
मेरी ज़िन्दा आत्मा को शांति देने की?

कभी पूछा था कि मैं रोज़ क्यों टूटा हुआ सा दिखता हूँ?
कभी समझा था उन हँसी के पीछे छुपे रूदन  को?

काश!
तस्वीर पर फूल चढ़ाने की नौबत ही न आती
अगर जीते-जी मेरी आत्मा को थोड़ा सुकून दे देते तुम लोग…

मैं कोई शिकायत लेकर नहीं जा रहा,
बस थक गया हूँ ये साबित करते-करते
कि मैं भी एक इंसान हूँ
जिसे महसूस होता है, टूटता है, और दर्द में रोता है।

अब जब मैं न रहूँ,
तब मत कहना — “काश हम समझ पाते उसे…”
क्योंकि मेरी ख़ामोशी तुम्हारे अफ़सोस से कहीं गहरी होगी।


मरने के बाद मेरी तस्वीर पे आँसू बहाने की क्या ज़रूरत,
ज़िंदा रहते अगर मेरी रूह को सुकून दे देते,
तो ‘ऊँ शांति’ कि नौटंकी न होती खुदा के दरबार में……

याद रखना,
हर आत्महत्या, हत्या ही होती है……


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A 24-Hour Hug

April 30, 2025

Shanky❤Salty

I need a 24-hour hug from that one person—
The one whose silence speaks louder than words,
Whose heartbeat is home,
Whose presence feels like poetry written on skin.

Not just a hug with arms—
But one that wraps around the soul,
That breathes warmth into my coldest corners,
That says, “I’m here,” without a single syllable.

The kind of hug that still lingers
Long after the bodies part,
Like a scent, like a memory,
Like the trace of a dream you don’t want to wake from.

Let me rest my ache in that one embrace,
The one that doesn’t ask me to explain,
That sees my chaos and chooses to stay,
That softens my storms with a single squeeze.

I don’t want to count the hours,
I want time to forget how to move,
I want the clock to pause
Inside the circle of those arms.

Let me melt into that closeness,
Let me breathe in the safety I once knew,
Let me be the silence between two heartbeats,
Held not just in body, but in truth.

I need a 24-hour hug from that one person—
The only one who knows
That sometimes,
A hug is not just comfort—
It’s survival.


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प्रेम या भ्रम……!!!!!

April 24, 2025

Shanky❤Salty


हमने प्रेम को अक्सर त्याग, समर्पण और सहनशीलता से जोड़ा है।
परंतु कहीं न कहीं इस परिभाषा में एक धोखा छुपा होता है—एक ऐसा धोखा, जिसमें प्रेम के नाम पर व्यक्ति स्वयं को खो देता है।
क्या वाकई प्रेम वो है जो आपको अपने अस्तित्व, अपने स्वभाव, अपने आत्मसम्मान से दूर ले जाए?

“वह प्रेम जो अपने अस्तित्व और आदर्श को नष्ट करने के लिए बाध्य करे,
वो प्रेम प्रेम नहीं, बल्कि प्रेम के नाम पर हृदय की तुच्छ दुर्बलता है,
कोरी भावना है, शूद्र प्रेम है।”

सच्चा प्रेम आपको संकुचित नहीं करता,
बल्कि विस्तार देता है—
वो आपको मिटाता नहीं, बल्कि संवारता है।


वो कहता रहा —
“अगर तुम मुझसे प्रेम करती हो,
तो खुद को छोड़ दो,
अपनी पहचान भूल जाओ,
मेरे रंग में रंग जाओ।”

और मैं…
मैं सोचती रही —
क्या यही प्रेम है?

मैंने अपनी इच्छाएँ त्याग दीं,
अपने स्वप्नों को अलमारी के किसी कोने में रख दिया,
अपने मन की बातें,
अपनी परिभाषाएं
एक-एक करके चुप कर दीं।

पर धीरे-धीरे…
मुझे एहसास हुआ,
मैं तो अब मैं रही ही नहीं।

वो प्रेम नहीं था—
वो एक आग्रह था
जो मेरी आत्मा को बाँध रहा था।

प्रेम में विलय हो सकता है,
पर विस्मरण नहीं।

प्रेम में सामंजस्य होता है,
पर समर्पण का अर्थ आत्महत्या नहीं।


हमें यह समझना होगा कि प्रेम और आत्मविलय एक नहीं होते।
जिस प्रेम में आपके विचारों की कद्र न हो,
जहाँ आपको सिर्फ ‘अनुकूल’ बनने की उम्मीद हो,
वह प्रेम नहीं, एक मुखौटा है।

सच्चा प्रेम आपकी आत्मा को पहचानता है,
उसे सहलाता है,
उसे और अधिक प्रकट करता है।
वह आपको मुक्त करता है—स्वतंत्र, निर्भीक, और सम्पूर्ण।

प्रेम का मूल भाव ‘स्वीकार’ है—
ना कि परिवर्तन की मांग।
यदि आपको किसी के प्रेम के लिए
अपना मूल स्वभाव त्यागना पड़े,
तो वह प्रेम नहीं, एक मानसिक बंधन है।


इसलिए जब अगली बार कोई आपको प्रेम का नाम लेकर अपने भीतर सिकोड़े,
तो याद रखिए—
प्रेम वह नहीं जो आपको मिटाए,
प्रेम वह है जो आपके भीतर एक नया संसार रचे।

प्रेम को मत दोष दो,
दोष उस नाम का है
जिसे प्रेम कह कर,
लोग स्वार्थ और नियंत्रण के लिए पहनते हैं।


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मैं चाहता हूँ तुम दर्पण देखो

April 19, 2025

Shanky❤Salty

सुनो ना,
मैं चाहता हूँ तुम दर्पण देखो—
हाँ, वही दर्पण…
पर ये मत कहना कि रोज़ देखती तो हूँ ही
क्योंकि मैं उस दर्पण की बात नहीं कर रहा
जो तुम्हारी आँखों की नींद पर,
बालों की लटों पर,
या होंठों की लाली पर रुक जाता है।

मैं उस दर्पण की बात कर रहा हूँ
जिसमें तुम्हारा समर्पण दिखे।
जिसमें तुम्हारे माथे की बिंदी से पहले
हाथों में एक डिब्बी दिखे।
सुर्ख लास हो
सिंदूर की एक पवित्र लकीर हो—
और तुम उसे देखो…
निहारो…
जैसे पहली बार किसी ने तुम्हें तुम्हारी ही नज़रों से देखा हो।

हाँ, वही दर्पण,
जब तुम्हारे हाथों में हो वो छोटी-सी डिब्बी,
सिंदूर की डिब्बी—
जो कोई और नहीं,
तुम खुद अपने हाथों से अपनी माँग में भरो।
एक अघोषित वचन सा—
कि तुमने चुन लिया है,
अब वो मन सिर्फ तुम्हारा नहीं रहा।

तुम जब उस दर्पण के सामने खड़ी हो,
हथेलियों में डिब्बी लिये,
और आँखों में चमकती एक गुप्त मुस्कान—
तो वो पल सिर्फ तुम्हारा नहीं होगा,
वो मेरा भी होगा।

मैं चाहता हूँ,
तुम उस क्षण को महसूस करो
जब कोई स्त्री केवल प्रेमिका नहीं रहती,
बल्कि प्रेम का प्रतीक बन जाती है—
श्रद्धा में लिपटी,
संवेदना में भीगी,
और आँखों में समर्पण लिए।

जब तुम दर्पण देखो,
तो खुद को निहारो मेरे लिए।
जैसे तुम्हारे सिन्दूरी स्पर्श में
मैं अपना अस्तित्व ढूँढ रहा हूँ।

क्योंकि,
प्रेम सिर्फ साथ जीने का नाम नहीं होता,
प्रेम वो दृश्य होता है—
जहाँ एक स्त्री अपने रूप को नहीं,
बल्कि अपने निर्णय को देखती है।

तुम्हारी वो मुस्कराहट—
हल्की सी, संकोची,
जैसे प्रेम ने तुम्हारे होठों को छू लिया हो,
वो मेरे लिए सबसे बड़ी कविता है।

मैं चाहता हूँ,
तुम उस दर्पण को देखो
जिसमें सिर्फ चेहरा नहीं,
बल्कि तुम्हारे मन का प्रेम झलकता हो।
जहाँ तुम अपने प्रेम को,
अपने विश्वास को,
और मुझे—
एक साथ देख सको।

तुम्हारे माथे की वो सिन्दूरी रेखा,
मेरे जीवन की सबसे सुंदर लकीर होगी—
जो ना किसी रेखाचित्र में होगी,
ना किसी भाग्यरेखा में।

बस तुम देखो—
एक बार उस दर्पण को
जिसमें मैं हूँ,
तुम हो,
और हमारा होना है।



क्योंकि तुम्हारा वो दर्पण,
मेरे लिए सिर्फ आईना नहीं,
पूरे ब्रह्मांड का प्रतिबिंब है—
जिसमें प्रेम, श्रद्धा और समर्पण—सब एक साथ मुस्कराता हैं।



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प्रेम एक अनुभव है

April 14, 2025

Shanky❤Salty

प्रेम संभावनाएँ नहीं खोजता।
प्रेम गणनाओं में नहीं उलझता।
प्रेम किसी पूर्व योजना का हिस्सा नहीं होता। वह तो बस… बस जाता है।
जैसे किसी सूखे हुए, बंजर धरती पर पहली वर्षा की हल्की-सी नमी पड़ते ही कोई बीज अनायास अंकुरित हो उठे, वैसा ही प्रेम है—निमित्त क्षीण हो सकते हैं, पर उसकी उपस्थिति पूर्ण होती है।

किसी का हृदय चाहे पत्थर हो या पिघलती मिट्टी, प्रेम अपनी राह स्वयं बना लेता है।
वह भूमि की उर्वरता नहीं देखता, वह इतिहास नहीं पूछता।
वह भविष्य की शर्तों पर कोई समझौता नहीं करता।
वह केवल वर्तमान में सांस लेता है।

प्रेम को तर्क की आवश्यकता नहीं, वह अनुभव से जन्मता है।
कई बार हमें प्रेम होता है उन व्यक्तियों से जिनसे मिलना भी नियति में नहीं लिखा होता, और फिर भी वह मिलन हमारे जीवन का सबसे उज्ज्वल क्षण बन जाता है।
हम जानते हैं—“मैं अंत तक रह नहीं सकता।”
यह जानना सत्य है,
यह मानना भी आवश्यक है,
पर इस सत्य से प्रेम को रोका नहीं जा सकता।

प्रेम को समय का ज्ञान नहीं होता।
वह घड़ी देखकर नहीं आता, न ही विदा की घंटी बजाकर जाता है।
वह जब आता है, तो पूरी तीव्रता के साथ, और जब चला जाता है, तो एक जीवन भर की गहराई छोड़ जाता है।

प्रेम परिणाम नहीं देखता।
वह यह नहीं सोचता कि क्या यह रिश्ता टिकेगा, क्या यह साथ बनेगा, क्या समाज मानेगा, या क्या समय देगा अवसर।
वह तो बस जीता है—संपूर्ण समर्पण के साथ।
वह मुस्कराहटों में, आंसुओं में, चुप्पियों में, और अधूरी बातों में भी सम्पूर्ण होता है।

हम प्रेम को अक्सर भ्रम समझ लेते हैं, क्योंकि वह हमें बदल देता है।
वह हमारी सीमाएं, हमारे डर, हमारे स्वार्थ—सब ध्वस्त।
हमें वह बना देता है जो हम कभी थे ही नहीं—या शायद वही जो हम सदा से थे।

कभी-कभी प्रेम कुछ नहीं मांगता—न साथ, न वादा, न भविष्य।
वह बस अपना होना चाहता है।
और वह होना भी इतना पूर्ण होता है कि जीवन की सारी रिक्तताएं भर जाती हैं।

प्रेम यदि अल्पायु हो, तो भी उसका स्पर्श अमरता दे सकता है।
कुछ पल का प्रेम भी सम्पूर्ण जीवन को अर्थ दे सकता है।

क्योंकि प्रेम जीवन नहीं मांगता, वह जीवन बन जाता है।
उसका कोई उद्देश्य नहीं होता, पर वह सारे उद्देश्य विस्मृत कर देता है।
वह कोई उत्तर नहीं देता, पर सभी प्रश्नों को मौन में डुबो देता है।

प्रेम तब भी प्रेम है, जब वह अधूरा है।
प्रेम तब भी प्रेम है, जब वह एकतरफा है।
प्रेम तब भी प्रेम है, जब वह अंतिम नहीं है।

क्योंकि प्रेम का सौंदर्य उसके पूर्ण होने में नहीं,
बल्कि उसके होने में है।


“प्रेम एक अनुभव है, जिसमें तर्क मौन हो जाता है और आत्मा बोल उठती है…”


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कब तक तसल्ली दोगे तुम?

April 5, 2025

Shanky❤Salty

ना जाने क्यों वो मुझसे झूठ कहते हैं। 
हर बार मुझे बहला-फुसलाकर चुप करा देते हैं। 
ना जाने कब तक बस तसल्ली देते रहेंगे, 
कब मुझे हकीकत में वो गले लगाएँगे?

अक्सर वो कह देते हैं— “मैं पास ही हूँ, तुम्हारे साथ ही हूँ…”
पर मैंने देखा है… 
हर तरफ अलट कर, पलट कर, ऊपर-नीचे, आगे-पीछे तक, 
पर नज़र तो कहीं आते नहीं वो।

हाँ… झूठ कहते हैं वो मुझसे, 
बस दिल बहलाने को कहते हैं वो, 
मुझे फुसलाने को कहते हैं वो,
“मन की आँखों से देखो, मैं यहीं हूँ, हर पल तुम्हारे साथ…”

पर अब भला मैं कैसे समझाऊँ उन्हें? 
कि “मन” को “मन” में ही रहने दो, 
क्योकि अगर सब कुछ मन से होने लगा तो… 
क्या मन से खाना शुरू कर दूँ मैं? 
मन से पानी पी लूं मैं? 
दवाइयाँ भी मन से खा लूं मैं? 
सो भी मन से ही जाऊँ ना मैं?

नहीं ना… 
अगर मैंने सब कुछ “मन” से करना शुरू कर दिया, 
तो शायद तुम ही मुझे बदमाश कहोगे, बेईमान कहोगे। 
क्योंकि सब कुछ मन से नहीं चलता। 

कभी-कभी ठीक है… दिल को तसल्ली देना, 
पर हर पल तसल्ली? 

भला उस दिल को कैसे समझाऊँ 
जो सिर्फ तुम्हारे लिए धड़क रहा है… 
जो सिर्फ तुम्हारे लिए ठीक हो रहा है।

खैर… छोड़ो ये सब। 
मेरी एक ही गुज़ारिश है तुमसे— 
हर बात को हकीकत बना दो ना तुम। 

अब किसी की बातों पर यकीन नहीं होता, 
अगर यकीन है… तो सिर्फ तुम पर। 
इसलिए आ जाओ ना… 
गले से लगा लो ना, अपना बना लो ना। 

हाँ, आते हो तुम— 
मेरे ख्वाबों में, मेरी बंद आँखों में, 
इसलिए तो सो नहीं पाते हम ठीक से। 
और जब आँखें खोलते है, 
तो तुम्हारी खुशबू तक महसूस होती है, 
इसलिए तो ठीक से जाग भी नहीं पाते है।

तुम्हारे इंतज़ार में बाल भी सफेद हो चले हैं, 
चेहरे पर झुर्रियाँ भी आने लगी हैं। 
ज़िंदगी की आधी उम्र तो सही-ग़लत में कट गई, 
अब जो बची है, 
वो बस तुम्हारे साथ गुज़रनी है।

अपने अंतिम वक़्त में बस तुम्हारी बाँहों में रहना है। 
अवशेष बनने से पहले 
जो शेष बचा है, उसे विशेष बना दो ना…. 
सब कुछ छोड़-छाड़कर, 
बस तुम मुझे अपना बना लो ना।


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मैं हूँ ना…!!!!

March 22, 2024

Shanky❤Salty

सुंदरता के मापदंड क्या हैं, पता नहीं समाज ने और दुनिया ने किस आधार पर तय किए हैं।
पर जब तुम मुस्कुराती हो न,
तो उसी दुनिया का सबसे खूबसूरत कमल मेरे हृदय में खिल जाता है।

मुझे पता है कि दुनिया ने, समाज ने तुम्हें बहुत मापा है।
तरह-तरह के मापदंड तुम्हारे मन में स्थापित कर दिए हैं।
पर तुम जानती हो?
मैंने तुम्हें देखा है…
तुम्हें तब देखा है, जब तुम परेशान होती हो,
हैरान होती हो, मुश्किलों में होती हो…
और मैंने देखा है, कि जब भी मैं बस इतना कहता हूँ—
“मैं हूँ ना…”
तो न जाने कहाँ वो तमाम परेशानियाँ, वो मुश्किलें
छू-मंतर हो जाती हैं।

तुम्हारे चेहरे पर जो हल्की-सी राहत की मुस्कान आती है न,
वो मेरे लिए किसी वरदान से कम नहीं।
और मैं तुमसे आज सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ…

तक़दीर और मुक़द्दर की चिंता छोड़ दो।
हम तुम्हारे प्यार से,
हम अपने परिश्रम से
सब कुछ हासिल कर सकते हैं।
बस तुम्हें एक ही चीज़ करनी है—

ठहर जाओ…
मेरे साथ।
हम मिलकर इस सफर को खूबसूरत बनाएंगे।
हर मुश्किल को हरा देंगे, हर दर्द को भुला देंगे।
बस तुम्हारी मुस्कान चाहिए मुझे… और कुछ नहीं।

जिंदगी चाहे कितनी भी कठोर हो,
तुम्हारे मुस्कुराने से इसे जीने की वजह मिल जाती है।


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माँ रोते छोड़ गई…..!!!!

January 19, 2025

माँ रोते छोड़ गई, बच्चे रोते रह गए,
माँ कहाँ गई, जवाब नहीं होता सही।

माँ उठ क्यों नहीं रही, ये सवाल जगाते हैं बच्चे,
माँ छुप क्यों है, बात नहीं करते सही।

माँ के मुँह पे कपड़ा क्यों, सवाल उठाते हैं बच्चे,
आँसू के साथ दर्द उठाते हैं सही।

माँ कहाँ गई, सोचते हैं सभी,
बच्चों की आँखों में तारे बुझ गए सही।

वो सुनहरा हाथ था, जिसने हमेशा समेटा,
वो गले की गर्मी थी, जिसने हमेशा गले लगाया।

माँ, तुम कहाँ चली गई, बच्चे आँसू बहाते हैं,
ये दर्द बहरे शब्दों में नहीं समाते हैं।

तेरे बिना ये दुनिया सुनी हो गई,
पर तेरी यादों से दिल भरा रह गया।

अपनी गोदी का आगा था जिसने हमेशा संभाला,
वो माँ, अपनी बेटों की तरह खिलखिलाती रही।

बच्चे रोते रह गए, माँ रोते छोड़ गई,
पर तेरा आशीर्वाद हमेशा हमारे साथ रहेगा।

अपने दर्द भरे शब्दों में बस इतना ही कह सकता हूं,
माँ, तू हमेशा हमारी दुआओं में है।

तेरी ख्वाहिशों की चमक जगमगाती रहेगी,
हम तेरे लिए खुद को सजाते रहेंगे।

जिंदगी के रास्ते पर भी तू हमारी साथ रहेगी,
माँ, तेरी ममता हमेशा याद आती रहेगी।

हर दिन तेरी यादों से हमें शक्ति मिलेगी,
जब भी हम हार मानेंगे, तू हमें जीता रहेगी।

माँ की ममता बेहद पवित्र होती है,
हर एक बच्चे के दिल को छू जाती है।

माँ, तेरे बिना दुनिया सुनी हो गई,
पर तू हमारी आँखों में हमेशा बसी रहेगी।

अपनी गोदी का आश्रय था हमेशा हमारे लिए,
तेरी मामता को भीगा हुआ सपना रहेगी।

माँ, तेरी खुशबू सदैव हमारे पास रहेगी,
तेरी यादें हमेशा दिल में बसी रहेंगी।

तेरे बच्चों की आँखों में हमेशा तू ही नज़र आएगी,
माँ, तू हमारे दिल की जगह कभी खाली नहीं जाएगी।


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मधुशाला

January 7, 2025

Shanky❤Salty

सुनो न जान, 
चाय की प्याली लिए तुम बैठी रहो, 
हाँ अदरक वाली, इलायची भी उसमें, 
और एकदम कड़क हो। 
हर एक घूँट में जज़्बात भरे हों। 

साथ में ग़ालिब की शेर-ओ-शायरी नहीं चाहिए, 
चाहिए मुझे बस तुम्हारी गुनगुनाती हुई धुन, 
जिसमें जीवन के साज़ हों, 
हाँ, गहरे राज़ हों, 
हर एक अल्फाज़ में कुछ खास बात हो। 

जब अपने होंठों से तुम्हें चूमूँ, 
मतलब तुम्हारे बनाए चाय को जब मैं चूमूँ, 
उसकी हल्की-सी मीठी एहसास में मैं सिमट जाऊँ। 

यक़ीनन, मालूम है तुम्हें, 
दिल जब टूट जाता है, 
तो सब कुछ छूट जाता है। 
दुनिया ही रूठी-रूठी सी लगती है। 

बस कोई आए और हाथ थाम ले, 
बिना कुछ पूछे, 
बिना कुछ कहे, 
बस धीमे से कह दे— 
“मैं हूँ न।” 

वो एहसास, 
जो किसी मधुशाला में नहीं, 
जिसे तलाशता ये जग है, 
मेरे लिए वो मधुशाला तुम हो। 

मतलब कि वो चाय ही मेरी अद्भुत मधुशाला है, 
जिसे तुमने बनाया हो।

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Why All Eyes Close on Hindus of India

December 9, 2024

Shanky❤Salty

कुछ दिनों से सभी की नज़रें बांग्लादेश पर हैं।
वहाँ हिंदुओं पर अत्याचार हो रहा है। 
मंदिर तोड़े जा रहे हैं। 
बहू-बेटियों के साथ गलत हो रहा है। 
साधु-संतों को गिरफ्तार किया जा रहा है। 
जो बात नहीं मानते, उन्हें मार दिया जा रहा है। 
बांग्लादेश में हिंदुओं की हालत देखकर हर कोई चिंतित है। 
और ये चिंता सही भी है, होनी भी चाहिए। 

लेकिन मैं अपने भारत देश पर भी कुछ कहना चाहता हूँ, क्योंकि ये हमारा अपना देश है, और बहुत प्यारा है।
दूसरों के घरों में देखने से पहले, क्या हमें अपने घर में झांकना नहीं चाहिए? 
ये वही भारत है, जहाँ विकास के नाम पर हजारों मंदिरों को तोड़ा जा रहा है। 
कई प्राचीन मंदिर बिना किसी हिचकिचाहट के नष्ट कर दिए गए। 
चाहे अयोध्या का प्राचीन मंदिर हो, 
काशी की गलियों का अद्भुत मंदिर हो, 
या गुजरात में सौंदर्यीकरण के नाम पर सैकड़ों मंदिर तोड़े गए हों। 
सरकारें कहती हैं कि ये मंदिर अतिक्रमण कर रहे थे। 
लेकिन मैं कहता हूँ, सरकारें आध्यात्मिक क्षेत्र पर अतिक्रमण कर रही हैं। 

उड़ीसा में भी वही हाल है। 
हजारों मंदिरों को खत्म किया जा रहा है। 
पूरे-के-पूरे गाँव में धर्मांतरण हो रहा है। 
हिंदुओं को काटा तो नहीं जा रहा, 
लेकिन उनकी जड़ों को उखाड़ा जा रहा है। 
मुगलों और अंग्रेजों ने भी शायद इतना अत्याचार नहीं किया होगा, 
जितना हमारी अपनी ही सरकारें कर रही हैं। 

लोग कहते हैं, “सभी की नज़रें बांग्लादेश के हिंदुओं पर हैं।” 
लेकिन मैं कहता हूँ, “सभी की नज़रें भारत के हिंदुओं पर क्यों बंद हैं?” 
ये वही भारत है, जहाँ हिंदुओं को नसीहत दी जाती है कि 
हिंसा से बचना है तो मुसलमानों के इलाकों में मत जाओ। 
पश्चिम बंगाल में दस हजार से ज्यादा हिंदुओं के मारे जाने के आँकड़े आते हैं, 
फिर भी सभी चुप हैं। 

क्यों?
भारत सहिष्णु है, इसलिए? 
या सत्ता की कुर्सी पर बैठकर हिंदुओं के नाम पर मलाई खानी है, इसलिए? 

दिल पर हाथ रखकर कहता हूँ, 
ये सब सत्ता का खेल है। 
हिंदुओं को बर्बाद करने की चाल है। 
आखिर भारत में हिंदुओं पर अत्याचार पर सब मौन क्यों हैं? 

साधु-संतों पर हो रहे अत्याचार पर एक नज़र डालिए:
– स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती और उनके चार शिष्यों की 23 अगस्त 2008 को उड़ीसा के कंधमाल में हत्या कर दी गई। 
– साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, जिन्हें मालेगांव ब्लास्ट के झूठे आरोप में 9 साल जेल में रखा गया। उन्हें “हिंदू आतंकवाद” का नाम दे दिया गया। 
– शंकराचार्य श्री जयेन्द्र सरस्वती, जिन पर हत्या का आरोप लगा। नवंबर 2004 में हिरासत में लिया गया। परिणाम – आरोप निराधार निकला। 
– स्वामी केशवानंद जी महाराज, जिन पर बलात्कार का आरोप लगा। 12 साल की सजा में से 7 साल भोगे। बाद में निर्दोष साबित हुए। 
– स्वामी नित्यानंद जी महाराज, जिन पर अभिनेत्री के साथ अश्लील सीडी का आरोप लगा। परिणाम – कथित सीडी फर्जी निकली। 
– जगद्गुरु कृपालु जी महाराज, जिन पर 85 वर्ष की उम्र में बलात्कार का आरोप लगा। परिणाम – आरोप झूठा निकला। 
– पूज्य संत श्री आशाराम जी बापू, जिन पर आश्रम में तांत्रिक प्रयोग का आरोप लगा। परिणाम – सर्वोच्च न्यायालय द्वारा क्लीन चिट मिली। 

पालघर में साधुओं की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई।
स्वामी अमृतानंद जी महाराज, स्वामी असीमानंद जी, सत्य साईं बाबा।

पर क्या किसी ने इनके बारे में कुछ कहा? 
शायद इसे पढ़ने वालों को इन साधु-संतों के नाम भी नहीं पता होंगे। 
आपमें से कई लोग शायद पहली बार इनका नाम सुन रहे होंगे। 
इन पर हो रहे अत्याचारों के बारे में क्या कोई बोलेगा? 
क्या इनकी आवाज़ कोई सुनेगा? 
या हमेशा की तरह इन पर ही प्रहार होता रहेगा?

मुझे खुशी है कि सभी की नज़रें बांग्लादेश के हिंदुओं पर हैं। 
लेकिन भारत के हिंदुओं पर सभी की नज़रें बंद क्यों हैं? 
ये दोहरा चेहरा क्यों? 
सत्ता की मलाई खाने के लिए, या हिंदुओं के नाम पर राजनीति की रोटियां सेंकने के लिए? 

अब भी समय है, अपनी जड़ों को काटना छोड़ दीजिए। 
वरना आपको जड़ से सुधार दिया जाएगा। 


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दरिंदों के साए में मासूमियत

December 7, 2024

Shanky❤Salty

नवजात की चीखें, सुनाई नहीं देती, 
मासूमियत के आंचल में, दरिंदे छिपे बैठे। 
सात महीने की कली, जो खिली भी नहीं, 
उस पर समाज की नीयत, कैसी ये सड़न है। 

जिन्स पहना, दोष तुम्हारा हुआ, 
हिजाब ओढ़ा, फिर भी क्यों रोका नहीं गया। 
मंदिर-मस्जिद, जो शांति के स्थल थे, 
अब इनकी दीवारें भी गुनाहों से सनी पड़ी हैं। 

रात का अंधेरा, दिन का उजाला, 
हर घड़ी में खतरा, ये कैसा हवाला? 
लड़की होने का जुर्म, लड़के का शोषण, 
हर रिश्ते में दरिंदों का ही वर्चस्व। 

मासूम का खेलना, अब अपराध बन गया, 
माँ की गोद से, रूह भी छिन गया। 
भारत की गलियां, रोती हैं आज, 
उस सात महीने की कली का क्या कसूर था? 

हम चुप हैं, क्योंकि चीखें मौन हो गईं, 
हर चीख दबाई गई, हर दहशत जी गई। 
ये कैसा समाज, ये कैसी सभ्यता, 
जहां इंसानियत की लाश हर गली में बिछी पड़ी। 

अब कब तक सहेगा ये जग, बताओ, 
दरिंदों का सच और कितना छिपाओ? 


जागो, चीखो, हर दीवार तोड़ दो, 
नवजात की रूह को इंसाफ दे दो।


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गड़े मुर्दे और नई लाशें……!!!!

November 28, 2024

Shanky❤Salty

गड़े मुर्दे, जो दफ़न थे सदीयों से, 
जिनके घाव भर चुके थे वक्त के मरहम से। 
आज उन्हें उखाड़ा जा रहा है, 
नई लाशें बिछाने की साजिश रची जा रही है। 

जो राख़ हो चुके थे, धुएं में खो चुके थे, 
उनकी चिंगारियों से आग जलाने की कोशिश हो रही है। 
जिन कहानियों का अंत हो चुका था, 
उन्हें फिर से लिखने की क़लम उठाई जा रही है। 

पुराने खंजरों की धार पर खून नया है, 
भूतकाल के जहर से वर्तमान को घायल किया जा रहा है। 
बेबुनियाद बातें, खोखले इल्ज़ाम, 
सच को झूठ में और झूठ को सच में बदला जा रहा है। 

क्यों? 
क्योंकि डर है कि शांति साँस लेने लगेगी। 
क्योंकि आशंका है कि इंसानियत फिर से जाग जाएगी। 
इसलिए नई लाशें बिछाने के लिए 
गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं। 

लेकिन ये खेल ज्यादा लंबा नहीं चलेगा, 
हर आग का पानी होता है। 
हर जख्म का मरहम भी होता है, 
और हर साज़िश का अंत भी होता है। 

गड़े मुर्दों को सोने दो, 
नई सुबह को आने दो। 
वरना ये राख़ और धुआं 
तुम्हारी सांसों को भी घुटन दे देगा।


अब अजमेर दरगाह शरीफ का होगा सर्वे!


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A Journey Through Emotions

November 21, 2024

Shanky❤Salty

A Journey Through Emotions: Exploring My Heart’s Journey by Mystery Girl

Some books touch the mind, while others leave an indelible mark on the soul. My Heart’s Journey: Based on Imagination by Mystery Girl is one such gem—a poetic masterpiece that invites readers into a world of unspoken emotions and heartfelt revelations. 

This debut book is not just a collection of poetry and prose; it is a window into the author’s soul. Mystery Girl weaves her words like a painter strokes a canvas, creating vivid, emotional landscapes that evoke both joy and melancholy. Her storytelling is raw and genuine, balancing the art of revealing just enough to draw readers closer while leaving an alluring veil of mystery intact. 

At its core, the book is an exploration of emotions we often leave unspoken. Each chapter resonates with a universal truth—love, longing, hope, and self-discovery. Mystery Girl writes with an authenticity that allows readers to find pieces of themselves within her words, making the journey deeply personal for anyone who picks up this book. 

What sets My Heart’s Journey apart is its poetic rhythm. The language flows effortlessly, carrying readers through the highs and lows of the author’s imagination. Each word feels intentional, each sentence a step further into her beautifully crafted world. Her ability to balance vulnerability with restraint is a testament to her skill as a writer, and her unique perspective ensures this book stands out among its contemporaries. 

Mystery Girl’s identity adds another layer of intrigue. Writing under a pen name, she invites readers to explore her story while keeping parts of herself hidden—a symbolic gesture that mirrors the delicate themes of revelation and mystery explored in her work. 

My Heart’s Journey is more than just a book, it’s an experience. It speaks to the dreamers, the thinkers, and anyone who has ever felt the weight of emotions they couldn’t quite put into words. It’s a testament to the power of imagination and the healing nature of storytelling. 

This is not a book you simply read—it’s a journey you embark on. Whether you’re a poetry enthusiast or someone seeking solace in heartfelt words, My Heart’s Journey is a must-read. With this stunning debut, Mystery Girl establishes herself as a voice that is as captivating as it is enigmatic, leaving readers eagerly awaiting her next work. 

Discover the beauty of unspoken emotions and take this journey—it’s one you won’t forget. 

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प्रेम समर्पण और रिश्तों का सच

November 4, 2024

Shanky❤Salty

एक वक्त था जब प्रेम में पड़ी स्त्री अपने प्रियतम के वियोग में सती हो जाती थी, 
अपना सब कुछ त्याग देती थी, यहाँ तक कि देह को भी जलती अग्नि में विसर्जित कर देती थी। 
मेरी नज़रों में वो प्रेम था। 
मैंने अपनी आँखों से देखा है उन स्त्रियों को जो आज भी अपना श्रृंगार अपने पति के लिए करती हैं। 

बिंदी की चमक से, खिलता हर चेहरा, श्रृंगार की ये रस्म, नारी का गहना। 
माथे पर सजी जो, लाली की एक बूँद, कुंवारी की शोभा, बन जाती अनमोल। 
बिंदी वो कहानी, जो बिन कहे कह जाए, आँखों की भाषा, दिल की बात सुनाए। 

माँग में सिंदूर देखकर मन करता है माथा चूम लूँ उनका, 
पैरों में पायल देखकर मन करता है पाँव चूम लूँ उनका। 
प्रेम और समर्पण देखकर, हृदय द्रवीभूत हो जाता है। 
पर रुके तो, अभी तो प्रेम की पराकाष्ठा बाकी है। 
धैर्य भी शर्मा जाए उन स्त्रियों के प्रेम को देखकर। 
हाँ, हाँ, मैं उन विधवा स्त्रियों की बात कर रहा हूँ 
जिन्होंने अपने प्रियतम पति के जाने के बाद भी उनसे प्रेम नहीं छोड़ा। 
देह त्याग के बाद भी, रूह से रिश्ता नहीं तोड़ा। 

माँग का सिंदूर धुल गया, आँखों से काले आँसू बह गए। 
काँच की चूड़ियाँ पहनाकर, उसे ही काँच की तरह तोड़ दिया गया। 
एक वक्त था, जब उसके पायल की आवाज़ गूँजती थी, 
पर अब उसकी खामोशी चीखों का रूप ले चुकी है। 
न दवा देता है कोई, न जहर कोई, 
छोड़ो दुआ की बातें, यहाँ तड़पता छोड़ देता है हर कोई। 
विधवा है वो, तिरस्कार का घूँट पीती है वो, 
फिर भी अपने प्रियतम के लिए जीती है वो। 
उसके जलते दीये को विधाता ने बुझा दिया था, 
हाँ, राम जी ने उसका सुहाग उजाड़ दिया था। 
समाज ने उसको विधवा करार दिया था, 
पर सलाम है उसके प्रेम और समर्पण को। 
जी करता है सजदा कर दूँ उनका। 

धैर्य भी शर्मा जाए उनके प्रेम को देखकर, 
इतनी कठिनाइयों के बाद भी कभी गैरों पे नज़र नहीं डाली। 
परायों का नज़र भले ही पड़ा, पर कभी नज़रें नहीं उठाई। 
दुनिया के ताने बहुत पड़े, पर कभी ऊँची आवाज़ नहीं निकली। 
सारी सजावट उसकी बिखर गई, 
पर प्रेम के लिए खुद को समेटे रखी वो। 
पतिव्रता क्या होती है, उसकी परिभाषा सिखाती है वो। 

पति के साथ भी और पति के बाद भी। 
लोग ज़रूर कहते हैं, उसकी किस्मत फूटी है। 
पर मेरी नज़रों में उसका धैर्य कभी नहीं टूटा। 
तन के सुख को भी त्यागा है उसने, 
मन के दुख को भी समेटा है उसने। 
लोकलाज की मर्यादा को बाँध कर, अद्भुत रिश्ता निभाया है उसने। 

हूँ दंडवत मैं उनके चरणों में, 
पर सुन हो जाता हूँ उनके बच्चों को देखकर। 
आज के नवजवानों को देखकर, 
रिश्तों को गुड्डे-गुड़िया का खेल बनाते देखकर। 
आज इससे दिल लगाया तो कल उससे लगाया। 
आज इसे गले लगा रहे हैं तो शाम ढलते किसी और को जिस्म सौंप रहे हैं। 
एक से दिल टूटा तो पलभर में ही दूसरे से जोड़ लिया। 
भावनाओं के साथ खेलना इनका शौक हो गया है। 

एक ‘बाबू’ को सुलाया, तो दूसरे ‘शोना’ को जगा रहे हैं। 
कुत्ते भी एक मौसम में ही जिस्म का खेल खेलते हैं, 
वो भी अपने आगे के वंश बढ़ाने के लिए। 
परन्तु उन नवयुवकों की हवस मिटती ही नहीं, 
और ना ही भावनाओं के साथ खेलने की चाह छूटती है। 
दिन-ब-दिन जिस्म की आग बढ़ती ही जाती है। 
सारे रिश्तों को जला कर तार-तार करते जा रहे हैं। 
मुखौटा लगा कर जी रहे हैं, 
खुद को ही ठगे जा रहे हैं। 

मैं क्या कहूँ और क्या लिखूँ, 
मेरा तो हृदय फट जाता है दर्द से जब ये सब देखता हूँ। 
बात संस्कारों की नहीं, अपने-अपने कर्मों की होती है। 
सुअर को कितना भी अच्छे से रख लो, पर थोड़ी सी ढील देते ही वो वही गंदगी खाएगा। 

यक़ीनन, तुमसे बेहतर तो वो वेश्याएँ हैं, 
जो पेट की आग को शांत करने के लिए दूसरों के हवस की आग को मिटाती हैं, 
पर भूल कर भी किसी की भावनाओं के साथ नहीं खेलती हैं। 

इसलिए विनती है मेरी— 
हो सके तो समझ जाओ। 

रिश्तों की असली खूबसूरती तब झलकती है, 
जब कोई हमें इज्जत और सम्मान दे। 
सिर्फ मतलब की भीड़ में खो जाना, 
दिल की गहराइयों में असली रिश्तों को बिसराना होता है। 
खुद को पहचानो, और पहचानो अपने आसपास के लोगों को, 
जो सच्चे दिल से आपकी कदर करें। 
वो हैं आपके सच्चे साथी, 
मतलब की भीड़ में तो बस जश्न मनाने वाले हैं। 
सच्चा रिश्ता वही है, जो सच्चे मन से जुड़ता है। 
जो इज्जत और सम्मान से सजा हो, 
वो ही रिश्ते जिंदगी के सफर में रंग भरते हैं। 

इसलिए, अपनी ज़िंदगी में ऐसे रिश्तों को संजोओ, 
जो आपको सच्चा सुख और सुकून दें। 
मतलब की भीड़ से निकलकर, 
सच्चे रिश्तों की महक में खो जाने का वक्त है। 

माना कि रिश्ते कच्चे धागों से बने होते हैं, 
पर उसे पक्का बनाने के लिए प्रेम, समर्पण, धैर्य, सम्मान और वफ़ादारी की गर्मी देनी होती है। 
देखा है मैंने, एक बार रिश्ते अगर पक जाएँ तो अनंत कोशिशों के बाद भी नहीं टूटते। 

ख़ैर, जो अपने माँ-बाप के हालात देखकर नहीं सुधरे, वो मेरे कहने से क्या सुधरेंगे। 
पर कोई नहीं, जैसा करोगे वैसा ही पाओगे। 
ये मेरी नहीं, मेरे विधाता की वाणी है। 
मर्ज़ी आपकी होगी, अर्ज़ी मेरी थी। 

यक़ीनन मेरी बातों से भावनाएँ आहत होंगी, 
पर यक़ीन मानो, अगर तुम सब सुधर गए तो दुनिया आबाद होगी।


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हाँ, मैं हिंदू हूँ….!!!!

October 29, 2024

Shanky❤Salty

हाँ, मैं हिंदू हूँ। 
मेरे खून सूख गए हैं, पर क्या हुआ… मैं तो हिंदू हूँ। 
मौन रहने वाला हिंदू हूँ, सब कुछ सहन करने वाला हिंदू हूँ मैं। 
अपने धर्म का विनाश होते हुए देखने वाला सहिष्णु हिंदू हूँ मैं। 
संतों पर अत्याचार होते हुए देखने वाला हिंदू हूँ मैं। 
सर्व धर्म समान का गीत गाने वाला हिंदू हूँ मैं। 
“रसगुल्ले की दुकान में जाकर चप्पल मांगने वाला हिंदू हूँ मैं। 
सच कहूँ तो चप्पल से मार खाने वाला हिंदू हूँ मैं।” 

मेरी भावनाएँ आहत करेंगी तुम्हें, पर तुम क्या कर लोगे हमारा? 
खून तो सूख गया है तुम्हारा, ज़मीर तो मर चुका है तुम्हारा। 
शास्त्रों को पढ़ते हो नहीं तुम, शस्त्रों को उठाने की औकात है नहीं तुम्हारी। 
धर्म तो भ्रष्ट हो चुका है तुम्हारा, केवल नाम के हिंदू का चमड़ा बचा है तुम्हारा। 
कोई तुम्हें कितना भी जगाए, पर तुम तो जाग कर फिर से सोने वाले हिंदू हो। 

कहने के हिंदू यार… 
तुम्हारा घी नकली है, तुम्हारा दूध नकली है। 
तुम्हारी मिठाई नकली है, तुम्हारी सोच में ही मिलावट है। 
फिर असली की उम्मीद ही क्यों करनी चाहिए? 
तुम कहने के हिंदू हो यार! 

इस दीवाली माँ लक्ष्मी की पूजा करना, 
दीवाली के अगले दिन अपनी माँ को ताने देना, 
उसके अगले दिन दूसरों की माँ को माँ की गाली देना। 
स्वार्थ में लिप्त हो तो हाँ, हिंदू हो तुम— 
बस कहने के हिंदू हो, खून सूख चुका है तुम्हारा। 
लहू रहा नहीं है तुम्हारा। 
भाई को लूटना है तुमको, 
बहन को पराया ही समझना है तुमको। 
ऑनलाइन रिश्ते बना कर दिखावे की जिंदगी जीना है तुमको। 

कहूँ तो कहाँ तक कहूँ मैं? 
सब कुछ जान कर, सब कुछ सुन कर, 
सब कुछ समझ कर भी जो चुप रहे— 
वो हिंदू हूँ मैं। 
गर्व से कहो, हिंदू हूँ मैं। 
जिसका खून सूख गया हो और जो सहिष्णु है, 
वो हिंदू हूँ मैं।


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बहुत तारीफ़ करता था मैं

October 25, 2024

Shanky❤Salty

बहुत तारीफ़ करता था मैं उसके कलावे की, 
जैसे धागों में कोई रूहानी दुआ बसी हो। 
पर जब उसने झुमके पहन मुस्कुरा के देखा, 
दिल में जैसे इक मीठी सी हलचल उठी हो। 

उसकी नजरों की चमक ने यूं घेरा मुझे, 
जैसे हर लफ्ज़ में उसका ही नाम हो। 
अब तो हर झुमका उसकी एक ख़ास कहानी कहता है,
और मानो उसने मुझे अपनी कहानी का एक हिस्सा बना लिया हो।


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तू ही तू

September 28, 2024

Shanky❤Salty

तेरी आँखों में बसा है, वो अनंत का जहां,
जहाँ रूहें मिलती हैं, और खो जाता है गुमां।
तेरी बाहों में सिमटी, ये ज़िंदगी की राहें,
जैसे कृष्ण का मुरलीधार, राधा की बाँहें।

हर सांस में तेरा नाम है, हर धड़कन तुझसे है,
तू ही साकार हुआ मेरा आराध्य, मेरा ईश्वर।
तेरे होने में मेरी सृष्टि है, तेरा प्रेम है अनमोल,
तू ही मेरा मंदिर, तू ही मेरा सोलह श्रृंगार का बोल।

तू मेरे दिल की आवाज़ है, तू मेरी प्रार्थना है,
तेरी कृपा से ही जीवन में ये अमृत धारा है।
मंदिरों के घंटों सी तेरी बातें बजती हैं,
रूहानी गीतों की तरह, तू मुझमें रचती है।

ये प्रेम नहीं, पूजा है, आत्मा की आवाज़ है,
तू मेरे भीतर बसता है, तू ही मेरा संसार है।
कृष्ण-राधा सा अटूट ये बंधन है,
तू रूह का मालिक, मैं बस तेरा दर्पण हूँ।

तू हर पल मेरे साथ है, जैसे साया साथ छाया का,
तेरे बिना ये जीवन अधूरा, जैसे बिन धड़कन काया का।
तू प्रेम की परिभाषा, तू भक्ति की मूरत है,
तेरे चरणों में ही सारा जीवन समर्पित है।


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Shanky & Saturday

September 14, 2024

Shanky❤Salty

Saturday’s sun softly shines,
Shanky’s spirit, still, reclines.
Sinking slowly in sweet sleep,
Silence surrounds, serene and deep.

Sitting snug, no sense of rush,
Soft sighs in Saturday’s hush.
Savoring sloth, no stress to seek,
Stretched out still, the week feels weak.

Saturdays spent in silent grace,
Sleep and sit, my sacred space.


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Stop Politics on Rape

August 18, 2024

Shanky❤Salty

The nation has united in outrage over the tragic Kolkata rape case, and rightly so. However, it’s deeply concerning that similar, if not worse, incidents in other parts of the country are being grossly overlooked by the media.

Consider the horrific incident in Bihar, where a young girl from the Mahadalit community was brutally gang-raped and mutilated. Her private parts were stabbed hundreds of times, her breast was cut off, and her lifeless body was discovered near a pond—a chilling testament to the unspeakable cruelty she endured. Despite the severity of this crime, it has barely made a ripple in the national media. You can read more about this harrowing case here.

In another horrifying case, a nurse in Uttarakhand’s Rudrapur was raped, murdered, and her body discarded in a vacant plot near the Uttar Pradesh border. This incident, too, has been largely ignored by the mainstream media, overshadowed by the relentless coverage of the Kolkata case. The details of this tragedy can be found here.

It’s alarming to see that the national news channels are fixated on the Kolkata rape case, using it as a tool for political gains rather than standing in solidarity with the victim. Instead of providing unbiased coverage and holding all perpetrators equally accountable, they seem to be more interested in boosting their TRP, pushing propaganda, and perpetuating a divisive narrative that serves their agendas rather than the cause of justice.

What’s even more dangerous is the rise of kangaroo courts on these platforms. These so-called debates, broadcasted as a form of public justice, are nothing more than sensationalized trials designed to manipulate public opinion. They bypass the legal process, creating a narrative that suits their financial backers or political affiliations. The media, once a pillar of democracy, has transformed into a tool for psychological manipulation, playing with the emotions and perceptions of millions.

This trend is not just unethical, it’s a direct threat to the foundation of our justice system. When media houses take on the role of judge, jury, and executioner, they undermine the very essence of due process. The accused are tried and convicted in the court of public opinion long before they ever see the inside of a courtroom. This not only violates their rights but also jeopardizes the integrity of real judicial proceedings, where impartiality is supposed to reign supreme.

The dangers of such paid media practices cannot be overstated. By turning sensitive cases into a spectacle, they erode public trust in the justice system and promote a culture of vigilante justice. This trend is a ticking time bomb, with the potential to explode into widespread injustice and societal chaos if not curbed. If these media-driven kangaroo courts are allowed to continue unchecked, they will set a dangerous precedent where truth and justice are sacrificed at the altar of profit and power.

We must demand accountability from these media houses. We must insist that they report all crimes with the seriousness they deserve, without bias or ulterior motives. Only when the media returns to its rightful role as the watchdog of democracy, rather than its exploiter, can we hope to create a society where justice is not just a word, but a lived reality for every victim, regardless of where they are from.

It’s time to stand up against this dangerous trend. We must call out this selective outrage and demand fair, unbiased coverage for every victim. Justice should not be selective; it should be universal and impartial. Only then can we hope to create a society where the law truly stands above all else, and where every victim receives the justice they deserve.


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Letter from Adv Kirti Ahuja

August 10, 2024

Shanky❤Salty

“Legacy of Injustice”….This is an enlightening book authored by Ashish Kumar as it gives deep insights into the true facts of Asaram Bapu’s case. An unfortunate troublesome case of the decade, which was sensationalised by the media & actual facts were brushed under the carpet. As an advocate I can put it very straight that the case was not dealt properly, the media got swayed away by the high profile nature of the case & no one bothered for the real facts. The entire events which unfolded raises serious doubts & queries. Even I had gone through the case papers a year back and spoken in detail about how the case story it itself absurd and improbable on my Youtube Channel – “Fight for your Right by Shri R.M.Mishra & Adv Kirti”. I have also spoken in my videos that this injustice which has been done in Asaram Bapu Case by the trial courts, if not set aside by higher courts, will become an authority/citation in future and any friend of yours will appear after 20 years and claim that I have been sexually assaulted by this person 20 years back! Therefore, not only people who are connected with Asaram Bapu should challenge the judgements of Asaram Bapu in Higher Courts, but all lawyers and jurists connected with the justice dispension system should speak up about the strange judgements of jodhpur and ahmedabad trial courts in asaram bapu case. The author in this book has done an incredible job by answering various unfilled gaps and queries which were never touched by any media. I recommend everyone to read this book.

Kirti

KIRTI AHUJA

Advocate Supreme Court of India, Manager (Fight for your right)


Letter

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Letter from Suvrat Tripathi, DG, IPS

July 24, 2024

Shanky❤Salty

Very pleased to have a glimpse of the wonderful book by Ashish Kumar entitled Legacy of Injustice, which comprises the untold story of the inhuman, unbelievable acts of citizen Honourable Asharam Bapuji, revered sant. It is a surprise and an eye-opener for all the people in the world that not even a remand is granted to the great sant, on whose feet many prostrate. Sometimes in his career, even great personalities like Bharat Ratna Atal Bihari Vajpayee Ji, Bharat Ratna Lal Krishna Advani Ji, R.S.S. Chief, numerous Cabinet Ministers, and many National Presidents have paid respects. Yet, in the hard waters that followed, no one is there even to consider a genuine grievance. Not even a single day’s parole was granted to him. Meanwhile, murderers of honorable Prime Minister Mr. Rajeev Gandhi are roaming freely on the roads. Even though the Supreme Court passed death sentences and life imprisonments on the culprits, they are not behind bars or on parole, they are freely moving around. But this facility is not available for Asharam Bapuji. What a joke it is! It is surprising. Where are we heading? Are we heading towards Ram Raj or Rome Raj? All these conspiracies were caused because he was a barrier to the large-scale conversion of Hindu core beliefs. However, my blessings are for Ashish Kumar, who ventured to cover this truly untold story, which deserves to be filmed, similar to the Kashmir stories & Kerala Stories – what is happening and how it is happening? Are terrorists involved in the murder of former Prime Minister Rajiv Gandhi less harmful? And is Asharam Bapu more harmful? What a world we are living in, revealing these shocking affairs! Ashish Kumar has done a tremendous service to Sanatan Dharma, to the Indian nation, and to all those who respect revered sants. I’m highly hopeful for a bright career for him in the field of reading and writing.



Suvrat Tripathi, DG (Retired) IPS-RR 1977


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न्याय के नाम पर अत्याचार

Shanky❤Salty


Legacy of Injustice: The Untold Story of Asharam Bapu

जीवन की अन्याय की दास्तान

इस लाइव चर्चा में, मेरी लिखी पुस्तक के अनुभवों को साझा किया और बताया कि कैसे आध्यात्मिक गुरु आशाराम बापू के साथ न्याय के नाम पर अत्याचार किया जा रहा है और कैसे हमारी सनातन संस्कृति को बदनाम किया जा रहा है।

यूट्यूब लिंक: https://www.youtube.com/live/1W1P_9kjGJ4?si=YtXXyDyypXDM-8LP


आप भी इस चर्चा के बारे में अपनी राय साझा करें। क्या आपके अनुभवों में भी ऐसी कोई घटना हुई है? कृपया अपनी टिप्पणियाँ नीचे जरूर करें।


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राजनीतिक षड्यंत्र और निर्दोष संतों पर अत्याचार: एक गंभीर चिंतन

Shanky❤Salty


यह एक दुखद और चिंताजनक सच्चाई है कि हमारे समाज में कई महान संतों को राजनीतिक षड्यंत्रों का शिकार बनाया गया है। किसी भी राजनीतिक षड्यंत्र में कानूनी टीम की सफलता कठिन होती है, क्योंकि उसमें अक्सर सरकार की पूरी भागीदारी होती है। कानूनी प्रक्रिया का केवल दिखावा किया जाता है, जबकि निर्णय पहले से ही तय होता है।

हिंदू संतों को बदनाम करने के लिए अनेक षड्यंत्र रचे गए हैं। स्वामी नित्यानंद, कृपालु महाराज, स्वामी श्यामानंद, स्वामी असीमानंद जैसे महान संत इन षड्यंत्रों के शिकार हुए हैं। क्या उनकी लीगल टीम कमजोर थी? नहीं। बल्कि, यह स्पष्ट है कि स्वामी नित्यानंद को अपनी सुरक्षा के लिए भारत छोड़कर दूसरे देश में जाना पड़ा क्योंकि षड्यंत्र बहुत गहरे थे। “आशारामजी बापू को झूठे केस में फंसाया गया था। यह कानूनी कार्यवाही नहीं थी, यह अत्याचार था।”

इन घटनाओं से यह साफ होता है कि हमारे समाज में संतों के प्रति घृणा और द्वेष फैलाने के लिए सुनियोजित षड्यंत्र किए गए। ऐसे षड्यंत्रों का उद्देश्य न केवल संतों को बदनाम करना है बल्कि उनकी आध्यात्मिक शक्ति और सामाजिक प्रभाव को कमजोर करना भी है। जब एक संत, जो समाज में आध्यात्मिक जागरूकता फैलाता है, षड्यंत्र का शिकार होता है, तो इससे समाज की नैतिकता पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है।

इसी प्रकार के षड्यंत्रों का उदाहरण अन्य देशों में भी देखा जा सकता है, जहां लीगल टीम कुछ नहीं कर सकी। उदाहरण के लिए, 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक इंदिरा गांधी ने भारत में इमरजेंसी लागू की थी। तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने सरकार की सिफारिश पर जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, जॉर्ज फर्नाडीस जैसे बड़े नेताओं को जेल में डाल दिया था। इन बड़े नेताओं की लीगल टीम भी उनके लिए कुछ नहीं कर सकी। यह दृष्टांत यह समझने के लिए पर्याप्त है कि लोकतंत्र में भी प्रधान मंत्री कानून का दुरुपयोग कर सकते हैं और निर्दोष नागरिकों और संतों पर अत्याचार कर सकते हैं।

यह तथ्य स्थापित करता है कि कोई भी आश्रमवासी षड्यंत्रकारी नहीं है। जो लोग उन्हें षड्यंत्रकारी बताने का प्रयास करते हैं, वे ही असली षड्यंत्रकारी हैं। हमें यह समझना होगा कि निर्दोष संतों और नागरिकों पर अत्याचार करना हमारे समाज और देश के लिए अत्यंत हानिकारक है।

हमारे महान संतों को न्याय दिलाने और सच्चाई को उजागर करने के लिए हमें एकजुट होकर खड़ा होना होगा। हमें उनके प्रति आदर और समर्थन दिखाना चाहिए, ताकि भविष्य में कोई भी निर्दोष संत इस प्रकार के अत्याचार का शिकार न बने। हमें अपने समाज को शिक्षित करना होगा कि सच्चाई की पहचान कैसे की जाए और कैसे षड्यंत्रों से बचा जाए।

संतों का सम्मान और उनकी सुरक्षा हमारी जिम्मेदारी है। हमें एकजुट होकर इन षड्यंत्रों का मुकाबला करना होगा और सच्चाई को सामने लाना होगा। हमारे संत समाज के पथप्रदर्शक हैं और उन्हें सम्मान और सुरक्षा प्रदान करना हमारा कर्तव्य है।


Legacy of Injustice: The Untold Story of Asharam Bapu


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Live Session on Legacy of Injustice

Shanky❤Salty

Exciting Announcement: Live Session on JM News for My Book “Legacy of Injustice”

I am thrilled to share that I had an amazing live session today on YouTube with JM News discussing my latest book, “Legacy of Injustice: The Untold Story of Asharam Bapu.” It was an enlightening experience to delve into the various facets of this compelling narrative and share insights with a broader audience.

For those who couldn’t join the live session, you can watch the full video here:

https://www.youtube.com/live/NhYNLznA7rw?feature=shared

In this session, we explored the intricate details and untold stories surrounding Sant Asharam Bapu, shedding light on the lesser-known aspects of his life and the challenges he faced. The book aims to provide a comprehensive account of his journey, emphasizing the enduring impact of his teachings and the injustices he encountered.

I encourage you all to watch the full video and engage with the content. Your support and feedback are invaluable to me.

Thank you for your continued support!


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Legacy of Injustice: Available on Flipkart

June 09, 2024

Shanky❤Salty

Discover the profound journey of Asaram Bapu in “Legacy of Injustice: The Untold Story of Asharam Bapu” by Ashish Kumar. Now available on Flipkart, this book offers an in-depth look into the spiritual leader’s life, his contributions, and the controversies that surround him. Get your copy today and delve into a narrative that promises to challenge and enlighten. 📖✨


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Legacy of Injustice Book Live

June 5, 2024

Shanky❤Salty

“Legacy of Injustice: The Untold Story of Asharam Bapu” by Ashish Kumar

Ashish Kumar’s “Legacy of Injustice: The Untold Story of Asharam Bapu” is a profound exploration of the life and trials of Asharam Bapu. This book serves as a beacon of truth, shedding light on the complexities of a figure who is both deeply revered and controversially debated.

A Journey of Spirituality and Controversy
Asharam Bapu’s life is a tapestry woven with threads of simplicity, spirituality, and the stark realities of legal scrutiny. Kumar’s narrative captures the essence of Bapu’s early life, his transformative spiritual experiences, and his unwavering commitment to Sanatan Dharma.

The Satguru Encounter and Shaktipaat
The book delves into Bapuji’s pivotal encounter with a Satguru and his profound study of Shaktipaat, which propelled him to become a guiding light for many. His missionary endeavors are documented with meticulous detail, highlighting his impact on global spiritual unity and awakening.

The Asharam Bapu Case: A Legal Labyrinth
At the heart of Kumar’s work is a critical examination of the Asharam Bapu case. Through the perspectives of chief counsels, the book scrutinizes the legal proceedings and the upholding of human rights, while advocating for the protection of Indian culture and the sanctity of sants.

Voices of the Masses and Media’s Role
Chapters like “Millions of Voices, One Question” and “Media Manipulation” bring to the forefront the public’s quest for fairness and the influential role of the media in shaping perceptions. The narrative honors Bapuji’s legacy of integrity, juxtaposed against the rallying cry of “Enough Is Enough” against perceived injustices.

Philosophical Insights and Judicial Reformation
The book offers a window into the philosophical teachings of Sant Asharam, particularly the concept of ‘Vasudhaiva Kutumbakam’ (the world is one family). It also captures significant moments, such as a High Court Chief Justice seeking blessings, while advocating for judicial reformation in light of the misuse of legal acts.

A Confluence of Personal and Collective Narratives
“Legacy of Injustice” weaves together personal letters and narratives to present a compelling discourse on the dichotomy between a revered spiritual legacy and the stark realities of legal battles. It is a narrative that not only tells a story but also ignites a conversation about the values we uphold in our society.

Ashish Kumar’s “Legacy of Injustice” is more than a book; it is a movement that calls for introspection and dialogue. It is a must-read for those who seek to understand the delicate balance between reverence and justice.






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Legacy of Injustice: The Untold Story of Asharam Bapu

June 02, 2024

Shanky❤Salty

Book Pre-Order
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We are excited to announce the pre-order for our upcoming book “Legacy of Injustice: The Untold Story of Asharam Bapu”. Take advantage of this exclusive offer and secure your copy at a special discounted price!




“Legacy of Injustice: The Untold Story of Asharam Bapu” is a groundbreaking and deeply researched work by renowned author Ashish Kumar. This book meticulously unravels the life, spiritual journey, and the profound contributions of Asharam Bapu, while bringing to light the unprecedented injustices he has faced in one of the most controversial legal cases of the 21st century.

The narrative begins with an exploration of Asharam Bapu’s early life, his spiritual awakening, and his dedication to selfless service. From his formative years to his transformative encounter with his Satguru, the book paints a vivid picture of his journey towards enlightenment and his study of Shaktipaat. Kumar’s detailed account highlights Asharam Bapu’s efforts in fostering global spiritual unity and his significant contributions towards societal welfare.

At the core of this book is a critical examination of the legal case against Asharam Bapu, which stands as a stark example of human rights violations and judicial misuse. “The Asharam Bapu Case: Unravelling The Truth” is a pivotal chapter that scrutinizes the fabricated charges and the orchestrated conspiracy designed to tarnish his reputation. Despite overwhelming evidence of his innocence, the relentless pursuit of false accusations has led to his prolonged incarceration, making this case an unparalleled travesty of justice.

The author delves into the roles played by various elements in perpetuating this injustice. The chapters “Media Manipulation,” “Fabricated Justice,” and “Justice In Peril: Misuse Of IPC Sections” expose how biased media coverage and the sensationalism of kangaroo journalism have significantly influenced public perception and judicial outcomes. Kumar argues that the misuse of the POCSO Act and the IPC sections in this case highlight a critical need for judicial reform and media accountability in India.

“Legacy of Injustice” also features compelling insights from notable personalities, including the former DGP of Uttar Pradesh, several Supreme Court advocates, the Retired Chief Justice of Sikkim, and prominent figures like Subramanian Swamy. Contributions from Supreme Court advocate Kirti Ahuja, Psychologist Dr. Shilpa Agarwal, Counselor and Writer Dr. Rekha Rani, and Dr. Vasudha at Amity University, enrich the narrative with diverse perspectives supporting Asharam Bapu.

This book is not just a biography but a powerful call to action. It emphasizes the urgent need for judicial reformation and the safeguarding of human rights in the face of institutional failures. Kumar’s writing serves as a clarion call to ensure justice prevails, to prevent the miscarriage of justice due to false allegations, and to hold the media accountable for their role in shaping public opinion and influencing legal proceedings.

In “Legacy of Injustice,” Ashish Kumar presents a compelling argument for why this case should be viewed as one of the most significant human rights violations in recent history. He contends that the egregious nature of the injustice faced by Asharam Bapu makes this case a modern-day anomaly, comparable to the world’s eighth wonder due to its sheer scale and impact.

By shedding light on these critical issues, Kumar’s book aims to inspire a movement towards a fair and just judicial system. It is a must-read for anyone interested in the intersection of law, media, and human rights, and serves as a poignant reminder of the need to uphold the principles of justice and integrity in our society.


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मणिकर्णिका घाट का एक कोना मिल जाए बस

May 21, 2024

Shanky❤Salty

जिंदगी ना सही, मणिकर्णिका घाट का एक कोना मिल जाए बस,

दर्द और दुःख से भरी, खोयी हुई आशाओं की राह मिल जाए बस ।

रात के अंधेरों में, दिल की तरफ बढ़ते क़दम, जीने की आस छोड़कर, आत्महत्या की गहराइयों में खो जाए बस ।

खुद को खोकर ही पाए, वो शांति की राहत, जीवन के अनकहे दर्दों से परे, आत्मा शान्ति की तलाश मिल जाए बस ।

हर दर्द की छायाओं में, बसे हैं अनगिनत ख्वाब, आत्महत्या की गहराइयों में खोने का एक आखिरी रास्ता मिल जाए बस ।

बिना बताए किसी को, हार जाए अपनी हालत से, दर्द और दुःख की जिंदगी से मुक्ति का एक मात्र सफ़र मिल जाए बस ।

मन की गहराइयों में छुपा है दर्दों का समुंदर, जीवन की कठिनाइयों से तंग होकर, आत्महत्या की राह मिल जाए बस।

आंखों की भीगी हुई रातों में, छुपा है अदूरी मोहब्बत, खुद को खोकर बस जाए, वो खुशियों से वंचित आत्महत्या की आवश्यकता।

खुद को खोकर, बस जाए, उस चुपके से गहराइयों में, आत्म-हत्या के आगे हार गए, जीने की ज़िंदगी से बेहाल आत्मा मिल जाए बस ।

आंखों की बरसात में छुपा है दिल का अदूरा गम, खुद को खोकर बस जाए, वो अनबोली बेबाक आत्महत्या की राह मिल जाए बस ।

जिंदगी के क़रीबी लम्हों की यादों में छुपी है अदूरी खुशियाँ,

खुद को खोकर बस जाए, वो आख़िरी शांति की राह मिल जाए बस ।

हार्दिक दुखों में बसी है उसकी रातों की तन्हाई, जीने की उम्मीद हार गई, आत्महत्या की माँग में खो जाए बस।

आसमान के तारों के साथ खो गई वो सपनों की यात्रा, दर्द और दुःख से भरी हर रोज़ जिन्दगी की बातें दबाए बस।

हर दिन बदलते ख़्वाबों में खो गई वो सपनों की खिलती फूलों की बागियाँ,

जीने की आस में खो गई, खुद की खोज में खो जाए बस । दर्द और दुःख की भरी हर सुबह, हर शाम,

खुद को खोकर बस जाए, वो अनजानी आत्महत्या की राह मिल जाए बस ।


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The Misuse of the POCSO Act and Its Impact on Justice

May 06, 2024

Shanky❤Salty

In the wake of a 2023 report revealing a dismal 3% conviction rate in POCSO cases from 2022, the glaring reality of justice eluding countless victims of sexual abuse comes to light. The Protection of Children from Sexual Offences (POCSO) Act, enacted with the noble intention of safeguarding children from sexual exploitation, has unfortunately become a tool for misuse and injustice.

One of the primary issues plaguing the implementation of the POCSO Act is the misinterpretation and misapplication of its provisions. While the law was designed to provide swift and stringent punishment for perpetrators of child sexual abuse, it is often manipulated to falsely implicate innocent individuals. Cases of false accusations and wrongful arrests have become alarmingly common, leading to the wrongful persecution of individuals who are unjustly branded as offenders.

Furthermore, the lack of proper investigation and due process exacerbates the problem, as law enforcement agencies often prioritize securing convictions over ensuring the integrity of the legal proceedings. In their zeal to show progress in combating sexual crimes against children, authorities sometimes overlook crucial evidence and fail to conduct thorough investigations, resulting in miscarriages of justice.

Moreover, the societal stigma surrounding allegations of child sexual abuse creates a hostile environment for the accused, making it difficult for them to defend themselves against false accusations. The presumption of guilt, fueled by sensationalist media coverage and public outrage, further undermines the principles of justice and fairness.

In addition, the overburdened judicial system contributes to the prolonged delay and denial of justice for victims of sexual abuse. Cases languish in courts for years, subjecting survivors to further trauma and depriving them of closure and redress. The backlog of cases, coupled with inadequate support services for survivors, perpetuates a cycle of impunity and re-victimization.

The misuse of the POCSO Act not only undermines the credibility of the legal system but also erodes public trust in the efficacy of child protection laws. It is imperative that urgent measures be taken to address the systemic flaws and loopholes within the implementation of the act. Strengthening safeguards against false accusations, improving investigative procedures, and enhancing support services for survivors are essential steps towards ensuring that justice is served equitably and effectively.

In last, the misuse of the POCSO Act represents a grave miscarriage of justice, where innocent individuals are unjustly persecuted while true perpetrators escape accountability. It is incumbent upon lawmakers, law enforcement agencies, and society as a whole to work together to rectify these injustices and uphold the principles of fairness, integrity, and compassion in the pursuit of justice for victims of sexual abuse.


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Appeal for Judicial Intervention in Media Trials

April 8, 2024

Shanky❤Salty

Ashish Kumar
Ramgarh, Jharkhand
ashish05shanky@gmail.com

April 8, 2024

To
The Honorable Chief Justice of India
Supreme Court of India
New Delhi

Subject: Appeal for Judicial Intervention in Media Trials

Respected Chief Justice,

I pen this letter with a profound sense of urgency and a deep respect for the esteemed office you hold—a bastion of justice in our great democracy. It is with a humble heart and a citizen’s concern for the future of our society that I seek to draw your attention to a matter of grave importance—the phenomenon of media trials in India.

In recent years, we have witnessed an alarming trend where the media has assumed the role of a quasi-judicial entity, conducting what are popularly known as ‘media trials.’ This practice, where cases and individuals are tried and judged in the court of public opinion, has become a ticking time bomb, threatening to erode the very pillars of democracy and the sanctity of our society.

The media, revered as the fourth pillar of democracy, holds the power to shape narratives and influence public perception. However, when this power is wielded without restraint, it can disrupt the balance of justice. Media trials have the potential to prejudice the minds of the public and the jurors alike, casting a shadow of bias even before the judiciary has had an opportunity to deliberate on the facts of the case.

The impact of such trials is not merely confined to the distortion of public opinion but extends to the undermining of the judiciary’s authority¹². When verdicts are pronounced in news studios, the subliminal pressure on the judicial process can be immense. The constant scrutiny and updates on sub judice matters create a clouded environment, leaving the case and the lives of those involved in a perilous state³.

Moreover, the sensationalism that often accompanies media trials infringes upon the rights of individuals, violating the principle of ‘innocent until proven guilty’ and denying them the right to a fair trial. The media’s narrative, driven by the pursuit of ratings, often overlooks the nuanced understanding of the law, leading to a trial by spectacle rather than a trial by evidence.

As a concerned citizen, I humbly request your intervention in this critical issue. It is imperative that the judiciary takes cognizance of the repercussions of media trials and considers implementing stringent guidelines to safeguard the administration of justice. The need of the hour is to ensure that the media refrains from encroaching upon the domain of the judiciary and respects the due process of law.

The future of our democracy and the faith of our citizens in the judicial system are at stake. We must act swiftly to prevent the erosion of these foundational elements that uphold our society. I trust that under your esteemed leadership, the judiciary will rise to address this challenge and preserve the sanctity of justice.

With the highest regard and anticipation for your judicious responses.

Yours faithfully,
Ashish Kumar

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The Fourth Pillar’s Tilt

April 01, 2024

Shanky❤Salty

The Fourth Pillar’s Tilt: Decoding the Dilemma of Kangaroo Journalism

Introduction

India’s media landscape, often hailed as the “fourth pillar” of democracy, has undergone significant transformations over the years. However, the noble ideals of journalism—truth, objectivity, and public service—have been compromised. The rise of “kangaroo journalism,” characterized by unethical practices and the blurring of lines between news and advertisements, poses a grave threat to our nation and its democratic fabric.

The Menace of Paid News

1. The Corruption Within
   – Corruption in the media is not new; it has deep historical roots. Yet, the recent phenomenon of “paid news” transcends individual journalists’ transgressions.
   – From planting favorable information for cash or favors to institutionalized corruption, media outlets now receive funds to publish or broadcast content in favor of specific individuals, corporations, or political parties.

2. The Blurring Boundaries
   – The distinction between news and advertisements has blurred. Paid news masquerades as objective reporting, deceiving readers and viewers.
   – When “news” becomes a commodity, the public struggles to differentiate between genuine reporting and sponsored content.

3. Election Malpractices
   – During elections, “paid news” takes a more pernicious form. Favorable reports and feature articles on political candidates flood newspapers and TV channels.
   – These disguised advertisements influence voters, eroding the purity of the democratic process.

Impact on Democracy and Society

1. Undermining Democracy
   – Paid news subverts the essence of democracy. Voters deserve accurate information to make informed choices, but when news becomes a commodity, electoral integrity suffers.

2. Biased Reporting
   – Kangaroo journalism perpetuates biased reporting. Specific interests dictate content, compromising objectivity.
   – The public’s right to unbiased information is violated, weakening democratic participation.

3. Decline in Trust
   – As media credibility wanes, trust in institutions erodes. Citizens become cynical, questioning the very foundations of democracy.
   – A free press should hold power accountable, but when it succumbs to corruption, democracy falters.

Solutions

1. Enforcing Guidelines
   – Media outlets must strictly adhere to guidelines that demarcate news from advertisements.
   – Clear disclaimers and distinct typefaces can help maintain transparency.

2. Full Disclosure
   – Candidates and political parties should disclose their financial interests in media organizations.
   – Transparency ensures that readers and viewers know the context behind positive coverage.

Conclusion

Kangaroo journalism threatens the soul of our democracy. To restore the fourth pillar’s integrity, we must champion ethical reporting, safeguard electoral processes, and uphold the public’s right to unbiased information. Only then can India’s media regain its rightful place as a beacon of truth and accountability. 🗞️🇮🇳


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Appeal to Address Fabricated Legal Cases and Protect Judicial Integrity

March 30, 2024

Shanky❤Salty

Ashish Kumar
Ramgarh, Jharkhand
March 29, 2024

The Honorable Chief Justice of India
Supreme Court of India 
New Delhi

Subject: Appeal to Address Fabricated Legal Cases and Protect Judicial Integrity

Dear Honorable Chief Justice,

I am writing to you with a profound sense of concern regarding the escalating menace of fabricated legal cases that are undermining the very foundation of our judicial system and wreaking havoc on the lives of innocent individuals. As a conscientious citizen deeply committed to upholding the principles of justice and fairness, I implore you to take immediate and decisive action to address this pressing issue.

In recent years, there has been an alarming proliferation of fabricated legal cases orchestrated by certain vested interests with political or professional agendas. These cases are built on a web of lies, manipulation, and coercion, and are relentlessly pursued with the sole intent of persecuting and defaming innocent individuals. The victims of these fabricated cases are subjected to malicious investigations, baseless accusations, and prolonged legal battles that not only drain their resources but also inflict irreparable damage to their lives and reputations.

The prevalence of fabricated legal cases is a direct assault on the principles of justice, fairness, and the rule of law. It erodes public trust in our judicial institutions and undermines the fundamental rights and liberties guaranteed by our Constitution. Moreover, it perpetuates a culture of impunity where the powerful and influential can manipulate the legal system to serve their own interests at the expense of justice and integrity.

It is imperative that we take concrete steps to address this grave threat to our judicial system and the well-being of our society. I urge you to consider the following measures:

1. Enhanced Oversight and Accountability:  Implement robust mechanisms for oversight and accountability within the judiciary to prevent the abuse of legal processes and ensure the fair and impartial adjudication of cases. This includes stringent monitoring of court proceedings, regular audits of case files, and transparent reporting of judicial decisions.

2. Strengthened Legal Framework:  Advocate for legislative reforms to strengthen the legal framework and impose stricter penalties on those found guilty of fabricating false cases and manipulating judicial proceedings. This may include amendments to existing laws to provide for expedited trials and harsher punishments for perpetrators of judicial misconduct.

3. Victim Support and Protection: Establish specialized support services for victims of fabricated legal cases, including access to legal aid, counseling, and rehabilitation programs. Additionally, ensure adequate measures are in place to protect victims and their families from harassment, intimidation, and retaliation by those responsible for fabricating false cases.

4. Public Awareness and Education: Launch public awareness campaigns to educate the public, legal professionals, and law enforcement agencies about the detrimental effects of fabricated legal cases and the importance of upholding ethical standards and due process in the administration of justice. This includes disseminating information about the rights of individuals accused of crimes and the legal remedies available to them.

5. Judicial Reform and Capacity Building: Invest in judicial reform initiatives aimed at improving the efficiency, transparency, and integrity of our judicial system. This may involve training programs for judges, prosecutors, and court staff to enhance their capacity to handle complex legal cases and uphold the highest standards of professionalism and integrity.

In conclusion, the prevalence of fabricated legal cases poses a grave threat to the integrity and credibility of our judicial system. It is imperative that we take decisive action to combat this scourge and reaffirm our commitment to justice, fairness, and the rule of law. I urge you to prioritize this issue and work collaboratively with all stakeholders to implement meaningful reforms that will restore public trust and confidence in our judiciary.

Thank you for your attention to this urgent matter. I trust in your leadership and dedication to upholding the principles of justice and fairness that are the cornerstone of our democracy.

Yours sincerely,
Ashish Kumar


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आत्मा की होली: एक नई सुबह

March 24, 2024

Shanky❤Salty

होली के इस पर्व पर, खो गया असली रंग,
भूल गए सब वो कथा, प्रह्लाद की अद्भुत उमंग।

खेल रहे रंगों से, पर दिलों में है फासले,
भंग के नशे में चूर, भूले सब अपने वास्ते।

होलिका की ज्वाला में, जली थी बुराई की छाया,
पर आज की होली में, खो गया वो सच्चाई का माया।

आओ फिर से याद करें, उस भक्ति की अमर कहानी,
जहाँ सत्य की जीत हुई, बिना किसी शोर शराबे की बयानी।

छोड़ो ये नशा और शोर, लौटो उस पवित्रता की ओर,
जहाँ होली का मतलब हो, आत्मा की शुद्धता की भोर।

जब तक ना मनाएंगे, उस भक्ति की होली,
तब तक ना पाएंगे, जीवन की वो सच्ची झोली।

हो ली जो बीत गया, उसे ना दोहराना है,
आने वाले कल में, नई राह बनाना है।

बिना मोह के जीना, बिना बंधन के उड़ना,
अपने हृदय को करो आज़ाद, दुआओं में खुद को फिर से जोड़ना।

उठो, चलो, बढ़ो, आत्म-साक्षात्कार की राह पर,
उनके रंग में रंग जाओ, बनो महान, बनो अमर।


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होली और बेरोजगारी

March 23, 2024

Shanky❤Salty

होली का त्योहार है, रंगों का बहार है,
पर मेरे हाथों में, कलम का ही रंग सार है।

गलियों में गूंजे हैं, खुशियों के तराने,
पर मेरी आँखों में, बस रोजगार के अफसाने।

रंगों से खेले सब, मैं खेलूँ अपने सपनों से,
होली तो फिर होली है, जब जीवन में रंग भरों से।

दिवाली की ज्योति सी, रोशनी का इंतजार है,
बेरोजगारी की अंधेरी रात में, उम्मीद का संसार है।

जब तक नौकरी ना मिले, त्योहार भी फीके लगते हैं,
जीवन के इस मोड़ पर, सब रंग बेरंगे लगते हैं।

पर हार नहीं मानूंगी, लड़ूंगी इस जंग से,
भरूंगी रंग अपने जीवन में, अपने संघर्ष से।

होली के इस मौसम में, कलम का रंग चढ़ाऊंगी,
अपने सपनों की होली, खुद ही मनाऊंगी।

और जब रोजगार मिल जाएगा, दिवाली भी आएगी,
जीवन में फिर से खुशियों की लहर छाएगी।

तब होली भी होली होगी, दिवाली भी दिवाली होगी,
हर दिन उत्सव होगा, जब जीवन में रोशनी होगी।


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Not For Human Consumption

March 20, 2024

Shanky❤Salty

आज पूजा भंडार में देखा घी,
लिखा था – “Not for human consumption”,
दिल दहल गया यह पढ़कर,
कैसे इसे पूजा में उपयोग करें?
राम जी से संपत्ति की चाहत रखते हो,
मिलावटी घी का दीपक जलाकर,
बल-बुद्धि मांगते हो जहर का दीपक जलाकर,
सौ रुपये किलो घी मिल रहा है,
लेकिन शर्म नहीं आती उसे खरीदने में।
खुद को Amul butter चाहिए खाने में,
लेकिन राम जी के सामने जलाने के लिए,
“Not For Human Consumption” वाला घी चाहिए,
जिसने सब कुछ दिया है,
उसके सामने दीपक जलाने के लिए तुम्हारे पास अच्छा घी नहीं है।
अगर नहीं औकात है तो मत जलाओ दीपक,
लेकिन ये क्या बात हुई,
“Puja Ghee: Not For Human Consumption”,
“Not For Human Consumption” वाले घी को,
तुम सब God Consumption में उपयोग कर रहे हो।
ऐसे बुद्धि बर्बाद हो गई है लोगों की,
कि समझ नहीं आता है,
मेरे राम जी 100, 500, 1000 के घी का मूल्य नहीं देखते हैं,
देखते हैं तो वो भावना देखते हैं,
लेकिन तुम तो शर्म करो यार,
“Not For Human Consumption” को God Consumption में उपयोग करते हो।
नहीं कुछ हो तो काल्पनिक दीपक जला कर,
भगवान को कह दो कि इसे स्वीकार करो भगवान ।




हाथ जोड़ कर कहते हैं सुधर जाओ,
नहीं तो सुधार दिए जाओगे,
जब कर्मों का डंडा पड़ेगा तो।


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Heartstrings

March 3, 2024

Shanky ❤Salty

Heartstrings

In a world dominated by fleeting digital connections, the profound impact of human relationships often goes unnoticed. ‘Heartstrings’ invites you on an enlightening journey into the intricate web of connections that define our very existence.

From the earliest bonds formed with family to the complexities of friendship and romance, this book delves deep into the essence of what it means to connect, to love, and to grow together.

About the Book:

‘Heartstrings’ explores the psychology of human connections, unraveling the dynamics of parent-child relationships, the nuances of lifelong friendships, and the intricate dance of romantic partnerships. It offers insights, wisdom, and practical guidance for nurturing and understanding the relationships that shape our world.

About the Author:

Anita Vij, the proud mother of two remarkably successful sons and a devoted wife, brings her wealth of personal experiences to the pages of ‘Heartstrings’. Drawing from her own journey of navigating the twists and turns of interpersonal connections, Anita explores various forms of relationships with heartfelt reflections and practical tips.

Special Pre-Launch Offer:

For a limited time, *Heartstrings* is available for just ₹200 as a special pre-launch offer (original price ₹700). As a gesture of appreciation, the author, Anita Vij, is offering a full refund to all readers who purchase the book during this exclusive offer period.

To avail of this offer, simply purchase your copy of ‘Heartstrings’, take a screenshot of your purchase, and send it to here. Your refund will be processed promptly.

Don’t miss out on this opportunity to deepen and enrich your relationships. Grab your copy of ‘Heartstrings’ today and embark on a journey of self-discovery and connection.

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Link for Refund

Offer valid until March 4, 2024


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राम का राजनीतिकरण…!!!!

February 20, 2024

Shanky❤Salty

राम का राजनीतिकरण…!!!!

सनातन संस्कृति की तुम बात करते हो
भारत के किसानों को सड़कों पर आँदोलन करने में मजबूर तुम करते हो
सीमा विवाद को सुलझाने के बजाय तुम शहादत पर गर्व करते हो
अमीर को और अमीर करते जाओ
गरीब को और गरीब करते जाओ
संतों को झूठे आरोपों के साथ जेल में डालते जाओ
युवाओं को रोज़गार के जगह आत्महत्या पर मजबूर कर दो
बात बात पर तुम सनातन संस्कृति की बात करते जाओ
और पीठ पीछे अंतरजातीय विवाह को बढ़ावा देते जाओ
दो से दस लाख में वोट का व्यपार बढ़ाते जाओ
सत्ता के लालच में तुम अपनी औकात दिखाते जाओ
एक तरफ तुम अस्पतालों का उद्घाटन करके वा वाहवाही कमाओ
दुजे तरफ शराब के ठेकों को लाईसेंस दे के मुस्कुराते जाओ
अठारह साल के बाद मतदान का अधिकार तुमने दिया है
जोड़-तोड़ कर सरकार बनाकर तुमनें उस जनादेश का धज्जियां उड़ाया है
राम को हम लाएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे का नारा दिया था तुमनें
अध्यादेश लाने का हिम्मत ना जुटा पाया था तुमनें
राम को हम लाएं है, मंदिर वहीं हम बनाएं है कहते हो तुम
तो ज़रा बताओ मुझको, न्यायालय क्या नौटंकी करने गए थे तुम
खैर यह सब छोड़ो तुम
हिंदू मुस्लिम सिक्ख ईसाई को लड़ाओगे तुम
सत्ता की कुर्सी के लिए कुछ भी कर जाओगे तुम
तुम कहते हो विपक्ष चोर है उन्हें वोट मत दो
फिर उन्हीं चोरों को तुम खुद में मिला लेते हो
और कहते हो अबकी बार चार सौ पार
पता नहीं जी तुम कौन सा नशा करते हो
सनातन की बात तुम करते हो, राम पर अपना अधिकार जमाते हो
बात बात पर तुम देशभक्ति का, रामभक्ति का प्रमाण पत्र बाँटते हो
ना जाने क्यों तुम राम सेतु को राष्ट्रीय धरोहर घोषित करने से कतराते हो
रोजगार की बात आती है तो तुम पिछली सरकारों से तुलना करते हो
राम का राजनीति करण कर धार्मिक क्षेत्र में तुम हस्तक्षेप करते हो
संत समाज कोई आवाज़ उठाए तो तुम जेल के पीछे उन्हें धकेल देते हो
वृद्धों को न्याय दिलाने के जगह तुम वृद्धाश्रम खोलते हो
वैश्यावृत्ति को बंद कर उत्थान करने के बजाय तुम उन्हें कानुनी मान्नयता देते हो
हरकते तुम्हारी देख गिरगिट भी शर्मा जाता है
कहूँ तो क्या कहूँ मैं, लिखते हुए तो हृदय कांप उठता है हमारा
कलयुग है यह सोच कर अपनी कलम को रख देता हूँ
और मौन होकर राम में रम जाता हूँ



होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥
अस कहि लगे जपन हरिनामा। गईं सती जहँ प्रभु सुखधामा॥


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A Single Rose

February 7, 2024

Shanky❤Salty

In the garden of affection, blooms a tale untold,
Where love for parents, like roots, silently unfold.
While roses dance in hands of love’s embrace,
In every petal, gratitude for parents we should trace.

A single rose, a token, so often we neglect,
Yet in its simplicity, parental love reflects.
For every thorn they bore, shielding us from harm,
Their sacrifices echo in each rose’s charm.

In the language of roses, let’s redefine,
The love for parents, enduring and divine.
For they are the gardeners of our tender souls,
Their love, a bouquet, in life’s journey, consoles.

So on this rose day, let’s remember and confess,
The love for parents, an eternal caress.
For in their embrace, we find our truest treasure,
A bond of love, surpassing all measure.


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Whispers of Joy

February 4, 2024

Shanky❤ Salty

In little things, life’s joy resides,
Tiny treasures where happiness abides.

What’s waste for one, holds a different view,
For another, a smiling face, anew.

Life’s essence found in moments small,
In every rise, in every fall.

Cherishing joys, however slight,
In every dawn, in every night.

So let’s seek bliss in the small array,
For in life’s details, dreams hold sway.


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Dear Death, I’m Ready

February 03, 2024

Shanky❤Salty

Dear Death, I’m Ready’ is a poignant collection of 101 poems, a poetic journey penned by a resilient 25-year-old soul grappling with the shadows of depression. Through verses like ‘In the Shadows, the author weaves a tapestry of emotions, narrating the raw struggles of a young spirit facing the abyss of difficult times.

This collection serves as a testament to the strength found in vulnerability, where each poem echoes the silent battles fought within. From the depths of solitude to the flicker of hope, these verses paint a vivid portrait of resilience, inviting readers to witness the profound transformation that unfolds through the power of poetry.

Explore the pages of this evocative book, where the author’s words become a refuge for those navigating their own storms. ‘Dear Death, I’m Ready’ is not just a collection of poems; it’s a heartfelt conversation with despair, an offering of solace, and a courageous declaration of readiness to face whatever comes next.


To Read My book Click here


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Shanky is No more

January 24, 2024

Shanky❤Salty

Don’t know when that day will come,
And someone will say “Shanky is No more.”

In shadows deep, a soul entwined,
Lost in echoes, thoughts maligned.

The weight of darkness, a heavy cloak,
Silent whispers, a heart bespoke.

Through the corridors of despair,
Shanky’s spirit, burdened, unaware.

A melancholy tale unfolds,
In sorrow’s grip, a story holds.

Gone the laughter, replaced by tears,
Fading hopes, escalating fears.

No solace found in the moonlit night,
Shattered dreams, a haunting sight.

As the echoes mourn, the heart grows numb,
A requiem sung for Shanky, now succumbed.


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Is suicide the only option for me?

January 23, 2024

Shanky❤Salty

In shadows deep, where sorrows reside,
A soul in turmoil, nowhere to hide.
“Is suicide the only option for me?”
Echoes in the heart, a bleak decree.

A symphony of despair, a haunting tune,
Dark clouds hover, obscuring the moon.
Lost in the labyrinth of endless pain,
Seeking an exit, but all in vain.

Loneliness whispers, a cruel companion,
A desolate heart, a forsaken canyon.
In the depths of gloom, emotions entwine,
A shattered spirit, a fragile design.

Yet, hold on, for hope may still gleam,
A distant flicker, a chance to redeem.
Let the verses of life rewrite your rhyme,
In the darkest abyss, find strength to climb.


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कौन है राम….!!!

January 20, 2024

Shanky❤Salty

यह किताब किसी विशेष धर्म, संप्रदाय, जाति, मज़हब के लिए नहीं बल्कि पूरी मानव जाति के लिए है।
इस किताब में राम का प्रयोग एक उर्जा के तौर पर किया गया है जो हर ज़गह विद्यमान हैं।

जिसे आजकल की साईंस ने भी माना है
“गौड पार्टीकल” के रूप में।

मेरा किताब लिखने का एक ही मकसद है की जात, मजहब, धर्म, रंग, भेद,…आदि को ख़त्म कर उस एक पर ध्यान देना।

दिखते तो सब अलग अलग हैं पर हैं तो सब एक ही ना।
फ़िर यह ईर्ष्या राघ द्वेष क्यों और किससे..!!!
राजा हो या रंक असली औकात तो श्मशान में दिख ही जाती है
फ़िर जीते जी यह बाहरी दिखावा क्यों।

कुछ वास्तविकता को मैंने लिखा है जिसे लोग जान कर भी अनजान बनें हैं।
जिस्म और रूह की सत्यता को मैंने स्पष्ट रूप से लिखा है।

राम होकर राम को भजना है।

इस किताब का उद्देश्य अपने भीतर छुपी आत्मचेतना को जगाना है।
किसी भी चीज़ का नशा एक-न-एक दिन उतरना ही उतरना है।

रात को पियो तो सुबह
सुबह पियो तो रात उतर ही जाता है।
राम नाम का प्याला पी कर के तो देखो।
राम नाम का नशा कर के तो देखो वचन है मेरा आपको इससे सारी ज़िन्दगी सुधर जाती है।


To read my book click here


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Dear Death, I’m Ready

January 18, 2024

Shanky❤Salty

📚✨ Exciting News for My Lovely Readers! ✨📚

Hello dear readers! 🌟 I am thrilled to share a sneak peek into my upcoming book, “Dear Death, I’m Ready.” 📖 This poetic journey unfolds the heart-wrenching tale of a 25-year-old soul navigating through the shadows of depression, using the power of pen to express his deepest pains.

🌈✒️ Your Suggestions Matter! ✒️🌈

I invite you to be a part of this creative process. Share your valuable suggestions for the book cover and interior design. Let your creativity flow, and let’s make this book a beautiful and impactful masterpiece together! 🎨💖

Feel free to drop your suggestions in the comments below or in my email. Your input is not just welcomed; it’s cherished. Thank you for being an integral part of this journey. 🙏💕

Stay tuned for more updates, and let’s create something extraordinary! 🚀📚