10 MARATHI BOOKS RELATING TO «उपधायक»
Discover the use of
उपधायक in the following bibliographical selection. Books relating to
उपधायक and brief extracts from same to provide context of its use in Marathi literature.
1
Advaitasiddhi-āvishkāra: advaitasiddhīce Marāṭhī bhāshantara
... ही अलंडवृति स्वीपहिनबहाश्चियक अण्ड स्वदिषयक आले तो वृलंचितावृशवृक्तिताली बहाय उपधायक आहै आणि तो वस्र विषय असलेल्या स्य निवृत्ति करते असे मानती येणार नाहर (३६) वला-इति ...
Madhusūdana Sarasvatī, Kevalānanda Sarasvatī, 1976
2
A Dictionary, English and Marathi: Compiled for the ... - पृष्ठ 291
compounds may befreely formed with द, प्रद, दाता,प्रदाता, दानी, दायक & दायी, उपधायक, प्रापक, अभावह, (as सुखद, दु:खद, फलप्रद, धनप्रद, अन्नदाता, विद्यादाता, द्रव्यप्रदाता, वस्त्र प्रदाता, ...
James Thomas Molesworth, Thomas Candy, 1847
3
Paṇḍitarājajagannāthaviracito Rasagaṅgādharaḥ - व्हॉल्यूम 3
"बीहीनवहन्ति" इसमें पुरोडाश के निर्माण रूप फल का उपधायक हेतु है वितुगोहि । इस वितुषबीहिरूप उपधायक में रहम वाला धर्म है उपयायकत्व और इस अवच-ड़ेदकरूप विशेषण की कोटि में श्रेणी में ...
Jagannātha Paṇḍitarāja, Madhusūdana Śāstrī, 1973
4
A Dictionary English and Marathi, Compiled for the ... - पृष्ठ 291
... उपधायक , प्रापक , आवह , ( as सुखद , दुःखद , फलप्रद , धनप्रद , अन्नदाता , विद्यादाता , द्रव्यप्रदाता , वस्त्रप्रदाता , मेीक्षदानी , कैवल्यदानी , भुभदायक , सैौख्यदायी , शत्युपधायक ...
James-T ..... Molesworth, Thomas Candy, 1847
5
Annamalai University Sanskrit series - पृष्ठ 88
परन्तु तृतीयाविभक्तर्थवेचले "देव पचतीयती विपयतावारितककेवर्वधिनिर्शहोय यथा संगे पाकदे: उपधायक-त्यविषवित्बोभयसेबरेप्रवया । विवाविताया: सेब-श्व-लेजी उपवायकत्वनिवेश आवश्यक ...
Annamalai University, 1932
6
Vidyāvaijayantīnibandhamālā: Dārśanikanibandhamālā
स्थायिभाव से उपहित चीतन्य अथवा चैतन्य के उपधायक स्थाविभाव रस है ऐसा विशेष रूप से आलरारिकों की सरल है, प्रथम पक्ष में रस निगुणि हैं उस गुणीका रहना संभव नह. है, अर्द्धत आन वाले ...
'उपधात्वदिति इस्थातीत्युपध: : 'कातओपसर्ग, (३-१-१३६) हाते क: । उपधायक उपध इं-जव" सिखाते । 'अनुस्थाखादि१ते तुह'णिन्तिकृयठयोर च' (भा-ट'') इत्ते न्यास: प्रमाद एव 1. अरुद्धिषदजन्तस्य मुए । ६७ ।
Śaraṇadeva, Ranjit Singh Saini, Taruvāgrahāram Gaṇapatiśāstrī, 1985
8
Mahakaviśrīharṣapraṇītaṃ Khaṇḍanakhaṇḍakhādyam:
... कर्म एवं करण दोनों के निमित्त के समावेश होने से कर्म एवं करण के एकत्व होने से क्या हानि है है उत्तर यह है कि कार्यरूप शब्दप्रमा में उपधायक ( खाका-समर्थक विषय ) प्रविष्ट शब्द को करण ...
Śrīharṣa, Navikānta Jhā, 1970
9
Bhartr̥hari viracitaḥ Vākyapadīya-Brahmakāṇḍaḥ
... का उपधायक तथा गजक है । इससे विलक्षण है रो- जैशध्यनि । यह भय वन स्वरूयोपधायक अर्थात धमक नहीं है, किन्तु अभिव्यक्ति अटि की चिरकाल व अचिरकाल तक नामक भी खार-: 1: ७७ 1. कीम : आप परन्तु ...
राजपष्टित जी के अक्षरों का अर्य गो" है : "बीहीनवहन्ति" इसमें पुरोडाश के निर्माण रूप फल का उपथायक हेतु है वितुपजाह : इस वितुषबीहिरूप उपधायक में रहम वाला धर्म है उपधायकत्व और इस ...
Jagannātha Paṇḍitarāja, 1973