10 HINDI BOOKS RELATING TO «उपानद»
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उपानद in the following bibliographical selection. Books relating to
उपानद and brief extracts from same to provide context of its use in Hindi literature.
1
Saṃskṛtapaṭhanapāṭhana kī anubhūta saralatama vidhi: vinā ...
... य: (८।२।३४)--झत् परे वा पदान्त में नह धातु के बर को धकारादेश हो है धकार को दकार और विकल्प से चर होकर-उवाच, उपानद, उपजा, उपाव है उपन्यास, उपानझे उपानह: है उपानहा, उपानरस्थार उपानद्धि: ।
Brahmadatta Jijñāsu, 1968
2
Vidyāpatikālīna Mithilā
यात्री यात्रा से (वं और कर्म कराय लेत छलाह ।त गंगावावयावलीहाँ ज्ञात हो:-' अष्टि छो: तीर्थ यात्री उपानद, छाता, अत आदिक व्यवहार कय सकैत आह है केवल प्रयास गोक हेतु उपयुक्ति वस्तुक ...
3
Śākaṭāyanīyaprakriyā - Page 81
अभी तत्र हैती बल इति कुण भवति । हलझतीलिडूयतीबेध:य पाणिनि-: उपाय र तत्र नाते लिए (8.) इति हाय ने जश्वाचप्त हलत्रादिना सुनोधे उपाय उपानद इति उदयन, । अदर सु हुत्यवर्वप्रायों या भी (72 1 ...
P. Narayanan Namboodiri, University of Calicut, 2003
4
Pāṇinīya vyākaraṇasāra - Volume 1
पुमान् पुमाज्यों पुमसिंन् पुमीसौ [खा सु-राम-, दृसे (चामसुब: प-रामसुर: [रसो: पुमव पुर्मासौ ' अथ हलन्त श्री/य है उपानए शब्द ( इता ) । उपल , उपानद उपाव उपानह९ उपानही पुमसि: पेस: प, (भि: भी पम: ज ...
Ram Janum Mahato, Pāṇini, 1962
5
Laghusiddhāntakaumudī: Prābhākarīhindīsaṃskr̥taṭīkā-yutā
... उपपूर्वक नह वातो: निर तस्य सवत्रिहारलीपे 'नहि वृति पूर्वपदस्य बीज 'नाव' बस्य धकारे, धकारस्य जात्वेन दकारे तस्य अवसानसंज्ञागां, विकत-पेन च-वि' [ उपानद उपाख्य, उपानहीं, उपानह: है उपज ...
Varadarāja, Prabhākara Miśra, Śaśidhara Miśra, 1983
6
Bhūmikābhāskara: Maharṣi Dayānanda viracita ... - Volume 1
"सर्वन सम्पदस्तस्य सन्तुष्टि यस्य मानक है उपानद"पावस्य ननु चर्मासंलव भू: है" जैसे पैर में जूता पहन लेनेवाले के लिए मानों सारी धरती चमड़े से ढक जाती है, वैसे ही सन्तुष्टमन व्यक्ति ...
Lakshmīdatta Dīkshita, Dayananda Sarasvati (Swami), 1989
7
Laghu-Siddhānta-kaumudī Bhaimīvyākhyā - Volume 1
उपाधि, उपानद । उपाय । उपानत्सु ।। अर्थ: य, वृत, वृष, व्याध, बर, सहा, और तत्-ये (मबनत धातु परे हों तो पूर्वपद को दीर्घ हो जाता है : ध्याख्या ई-बस-बस नहि-वृति-कि-सध-रुचि-सहि-तनि, ।७. ३ । क्यों ।
Bhīmasena Śāstrī, Varadarāja, 2005
8
R̥shabhadeva: eka pariśīlana
श्रमण नंगे पैर होते हैं पर मैं उपानद रम-गा । श्रमण जो स्वविरकतपी हैं वे श्वेतवस्त्र के धारक हैं और जिनका-पी निर्वस्त्र होते हैं, पर मैं कषाय से कलुषित हूँ, अत: काषाय वस्त्र धारण ...
9
Śuklayajurvedasaṃhitopaniṣacchatakam
अन्नदेवताभिप्राय वा । सा ह्यक्षीर्णव । उदल च स ऊर्मि: अंशुना=प्राणेन-जगत्प्राणभूतेनान्दिना सं-सबकीभूय अमृतत्व-रा-मरण-मत्वं, उपानद-र=उपव्या८रोतु है प्राणशचनान्नहच एकीभूपपवं ...
Maheśvarānandagiri (Svāmi.), N. R. Bhatt, 1964
हैं उपानद | उपाहा है प्राकुई | क्जावित्र है नीरूर | प्रतीषद६ है परीततक है वीरूतक ( इत्यादि है अनठययविकृउस्तु सकारे कपवर्गयके रा४भा८रा अनव्ययसं विसुष्टस्तु सकारमापद्यते कपवर्गकी ...